चेहरे बदल के मिलता है
13 years ago
रेतीली आंखों में
जज़्ब हो जाती है
सारी नमी , जो
अश्कों के धारे से
बनती है ।
धुंधलाती हैं आँखे
और लगता है यूँ कि
हवा ने ओढ़ी है
शायद कोहरे की चादर ,
ऐसे में मुझे
न जाने क्यों
बेसबब याद आती है बारिश ,
जिसमें घुल जाती हैं
अश्क की बूंदे
जिन्हें लोग अक्सर
बारिश में भीगी
खुशी समझते हैं।
देखी थी मैंने एक वेब सीरीज़
शिखा वार्ष्णेय द्वारा लिखी पुस्तक " पाँव के पंख " मिलते ही सबसे पहले उसकी फोटो खींच कर शिखा को भेजी कि तुम्हारे पाँव के पंख मेरे पास पहुँच चुके हैं । और उसके बाद मेरी पहली प्रतिक्रिया थी किताब को सूँघना । न जाने क्यों मुझे हर किताब की एक अलग खुशबू महसूस होती है । वैसे भी आज कल लोग ब्लॉग पर , फेसबुक पर या अलग अलग वेबसाइट पर काफी पढ़ लेते हैं , लेकिन फिर भी जो बात हाथ में पुस्तक ले कर पढ़ने में है वो कम्प्यूटर या फोन में पढ़ने में नहीं ।
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