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सुनामी की बाहों में .....

>> Monday, October 11, 2010

आँखों के समंदर में
ये कैसा तूफां है
खींच ले जाता है
साहिल से
मेरी हर ख्वाहिश को ,

दम तोड़ देती है
हर चाहत
जूझ कर खुद ही
सागर की लहरों के
हर थपेडे को सह कर ।

जज्ब कर लेता है
सिन्धु
अपनी ही गहराई में
देखे - अनदेखे
मेरे हर ख़्वाबों को ।

होती है सिहरन
बस भीगी सी रेत से
और ये रेत भी भीगी है
मेरे अश्कों की धारों से।

शुष्क है मन और
अब आँखें भी खुश्क हैं
न ख्वाहिश है कोई मन में
न ख्वाब आँखों में है।

कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में.






60 comments:

Anonymous,  10/11/2010 6:10 PM  

संगीता जी, बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ... सपनो के महल यूँ ही बिखरते रहते हैं, लेकिन हमें बनाते रहना chahiye....

मेरे ब्लॉग पर इस बार

एक और आईडिया....

Apanatva 10/11/2010 6:14 PM  

udas kar chodane walee rachana.....

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 10/11/2010 6:17 PM  

आँखों के समंदर में...ये कैसा तूफां है
खींच ले जाता है...साहिल से...मेरी हर ख्वाहिश को ,

शुष्क है मन और..अब आँखें भी खुश्क हैं
.......कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी...
कि समां गया...सुनामी की बाहों में...
बेहतरीन....लाजवाब रचनाओं में से एक.

Udan Tashtari 10/11/2010 6:18 PM  

कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में.

-ओह!!

लाजबाब!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 10/11/2010 6:22 PM  

होती है सिहरन
बस भीगी सी रेत से
और ये रेत भी भीगी है
मेरे अश्कों की धारों से।
--
कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में.
-----
-----
कमाल की अभिव्यक्ति है!
सीधे मन पर प्रभाव डालती है!
--
यूँ तो पूरी रचना ही बहुत बढ़िया है
मगर मुझे इन अन्तरों ने खासा प्रभावित किया है!

shikha varshney 10/11/2010 6:32 PM  

अब सुनामी ....कुछ भी मत छोडना दी ! पीछे ही पड़ गई हो ख़्वाबों के ..कुछ नहीं हुआ है ख़्वाबों को कहीं नहीं गए हैं वो सलामत रहेंगे हमेशा और साकार भी होंगे ...ओह भाषण ज्यादा हो गया
वैसे कविता वाकई जबर्दस्त्त है.एकदम सुनामी जैसी तूफानी.

ashish 10/11/2010 6:33 PM  

इतनी वेदना को जज्ब करना और फिर उसे कलाम में ढालना. कमाल है मोहतरमा . हम तो सुनामी की नई परिभाषा पर लट्टू हो गए.

संजय भास्‍कर 10/11/2010 6:37 PM  

कविता वाकई जबर्दस्त्त है.

संजय भास्‍कर 10/11/2010 6:38 PM  

आदरणीय संगीता स्वरुप जी
नमस्कार !

कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

वीरेंद्र सिंह 10/11/2010 6:38 PM  

अब मैं क्या लिखूँ?
इतनी बढ़िया रचना बन जायेगी ..
शायद आपको भी अहसास न रहा हो ...
मुझे तो सभी पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी .

kshama 10/11/2010 6:39 PM  

कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में.
Gazab tasveeron ke saath mel khati rachana! Wah!

समयचक्र 10/11/2010 6:40 PM  

आँखों के समंदर में
ये कैसा तूफां है
खींच ले जाता है
साहिल से
मेरी हर ख्वाहिश को,
बहुत सुन्दर रचना ....आभार

मनोज कुमार 10/11/2010 6:44 PM  

कविता पाठके के मन को छू लेती है और कवयित्री की सामर्थ्‍य और कलात्‍मक शक्ति से परिचय कराती है। नितांत व्‍यक्तिगत अनुभव कैसे समष्टिगत हो जाता है इसे हम आपकी इस कविता में देख सकते हैं।

rashmi ravija 10/11/2010 6:50 PM  

शुष्क है मन और
अब आँखें भी खुश्क हैं
न ख्वाहिश है कोई मन में
न ख्वाब आँखों में है।

पीड़ा घनीभूत हो जाए तो ऐसा ही लगता है...
अत्यंत मार्मिक रचना

रश्मि प्रभा... 10/11/2010 7:23 PM  

आँखों के समंदर में
ये कैसा तूफां है
खींच ले जाता है
साहिल से
मेरी हर ख्वाहिश को ,
ye kya baat hai aapki kalam me indino ??????????

सम्वेदना के स्वर 10/11/2010 7:34 PM  

संगीता दी,
दुष्यंत जी ने कहा था
एक जंगल है तेरी आँखों में,
मैं कहीं राह भूल जाता हूँ.
और आज आपने एक पूरा समंदर उँड़ेल दिया. एक एक शब्द अंतर्मन की सच्ची अभिव्यक्ति करता है!

राजेश उत्‍साही 10/11/2010 7:37 PM  

समय की सुनामी से कौन बचा है।

Arvind Mishra 10/11/2010 7:47 PM  

भाव प्रवण कविता

उस्ताद जी 10/11/2010 7:53 PM  

3/10

अच्छा प्रयास

Kailash Sharma 10/11/2010 7:58 PM  

होती है सिहरन
बस भीगी सी रेत से
और ये रेत भी भीगी है
मेरे अश्कों की धारों से।

लाज़वाब...वेदना की इतनी ह्रदयस्पर्शी अभिव्यक्ति ! बहुत सुन्दर...आभार..

Kailash Sharma 10/11/2010 7:58 PM  

होती है सिहरन
बस भीगी सी रेत से
और ये रेत भी भीगी है
मेरे अश्कों की धारों से।

लाज़वाब...वेदना की इतनी ह्रदयस्पर्शी अभिव्यक्ति ! बहुत सुन्दर...आभार..

सुज्ञ 10/11/2010 8:12 PM  

दीदी,

कैसे बांध लेती है,उन्मुक्त भावों को शब्दों में?

कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में.

Kunwar Kusumesh 10/11/2010 8:52 PM  

मैडम,
आपके सुझाव पर अमल करते हुए वर्ड वेरिफिकेशन को नो कर दिया है .
एक बात और मैडम,
किसी का follower बनने में मेरी फोटो वहां नहीं पहुँचती है .इसे कैसे ठीक करें?
कृपया गाईड करें.कृपा होगी.

कुँवर कुसुमेश

डॉ. मोनिका शर्मा 10/11/2010 9:08 PM  

कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में.

बहुत ही उम्दा... कमाल की पंक्तियाँ हैं....आभार

DR.ASHOK KUMAR 10/11/2010 9:39 PM  

आपकी कविता का प्रत्येक शब्द अर्न्तमन की परत दर परत खोलता हुआ प्रतीत होता हैँ। बहतरीन अभिव्यक्ति के लिए बहुत बहुत आभार! -: VISIT MY BLOG :- मेरे ब्लोग पर पढ़िये इस बार....... जाने किस बात की सजा देती हो?........गजल।

प्रवीण पाण्डेय 10/11/2010 10:03 PM  

भावों का सुगढ़ प्रगटन।

अनामिका की सदायें ...... 10/11/2010 10:47 PM  

सारे के सारे एहसासों को लहरों और समुद्र के बिम्बो के सहयोग से सजा सुंदर रचना का रूप दिया है. और अंत में ज्वालामुखी ने अपना कमाल दिखा दिया.

प्रभावशाली चित्रण .

बधाई.

deepti sharma 10/11/2010 11:24 PM  

कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में.



बहुत ही मार्मिक रचना

सोचकर आँखों मे आंशु आ गये

Anjana Dayal de Prewitt (Gudia) 10/12/2010 6:45 AM  

आँखों के समंदर में
ये कैसा तूफां है
खींच ले जाता है
साहिल से
मेरी हर ख्वाहिश को ...

आपकी मुस्कराहट आपके ग़म छिपाती है और आपकी कवितायें सब बयान कर देतीं हैं.... हमेशा की तरह बहुत सुंदर रचना! सादर

seema gupta 10/12/2010 8:29 AM  

होती है सिहरन
बस भीगी सी रेत से
और ये रेत भी भीगी है
मेरे अश्कों की धारों से।
सुन्दर रचना यूँ लगा एक दर्द की इक लकीर गुजर गयी....

regards

Anonymous,  10/12/2010 8:31 AM  

bohot bohor sundar...hamesha hi ki tarha. u rock dadi.... ;)

वाणी गीत 10/12/2010 8:53 AM  

सपनों का महल सुनामी की बाँहों में ..
कितना दर्द छिपा है इन पंक्तियों ...
सफीने पर जो कश्तियाँ डूब जाया करती हैं ...
वो भी क्या साहिल की तमन्ना किया करती हैं ...!

Akanksha Yadav 10/12/2010 9:25 AM  

कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में.

...मन को स्पंदित करती हैं ये पंक्तियाँ..उम्दा कविता..बधाई.

अरुणेश मिश्र 10/12/2010 9:57 AM  

जीवन संघर्ष की कलात्मक अभिव्यक्ति ।

उपेन्द्र नाथ 10/12/2010 11:12 AM  

बहुत सुन्दर कविता...

हास्यफुहार 10/12/2010 12:34 PM  

आप बहुत बढिया लिखती हैं। मन में ई सब आता तो है, पर लिख नहीं पाते, पर ऐसएहीं सुना ज़रूर देते हैं!

हास्यफुहार 10/12/2010 12:45 PM  

अपकी यह पोस्ट अच्छी लगी।
हज़ामत पर टिप्पणी के लिए आभार!

vandan gupta 10/12/2010 12:55 PM  

शुष्क है मन और
अब आँखें भी खुश्क हैं
न ख्वाहिश है कोई मन में
न ख्वाब आँखों में है।

सपनो के धराशायी होने का दर्द उभर कर आया है……………बेहद मार्मिक चित्रण किया है…………एक वक्त ऐसा भी आता है जब हर ख्वाहिश दम तोड देती है इस व्यथा को बहुत सुन्दरता से उकेरा है।

दिगम्बर नासवा 10/12/2010 3:22 PM  

सपनों और ख्वाहिशों के टूटने का दर्द .... बहा ले जाता है सब कुछ ....
गहरे एहसास से बुनी रचना ...

अनुपमा पाठक 10/12/2010 3:59 PM  

sundar rachna!
न ख्वाहिश है कोई मन में
न ख्वाब आँखों में है।
in panktiyon ka dard bhed jata hai....
sapno ka dharashayi hone ki vyatha ubhar aayi hai!
sadhi hui kalam ki sundar abhvyakti!!
regards,

Urmi 10/12/2010 6:30 PM  

बेहद ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना! आपकी लेखनी को सलाम!

राजभाषा हिंदी 10/12/2010 6:46 PM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है!
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

Sadhana Vaid 10/12/2010 7:23 PM  

बहुत दिनों के बाद कोई इतनी प्रभावशाली रचना पढी है ! आँखें नम कर गयी और ना जाने मन के कितने सोये हुए दर्दों को जगा गयी ! बहुत हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति !

Shaivalika Joshi 10/12/2010 9:20 PM  

कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में.

Dil ko Chhu gayi aapki ye panktiyaan

Khare A 10/13/2010 12:00 PM  

behad khoobsurat aur ehsaason se purn aapki ye kavita

badhai, sapne dekhna hi chahiye / jivan tabhi chalta he


badhai

मनोज कुमार 10/13/2010 12:58 PM  

बहुत अच्छा लगा इसे फिर से पढना

बिनु विश्‍वास भगति नहिं, तेहि बिनु द्रवहिं न राम।
राम कृपा बिनु सपनेहुं, जीवन लह विश्राम ।।

जयकृष्ण राय तुषार 10/13/2010 3:46 PM  

bahut sundar kavita ke liye bahut bahut badhai

Unknown 10/13/2010 5:05 PM  

होती है सिहरन
बस भीगी सी रेत से
और ये रेत भी भीगी है
मेरे अश्कों की धारों से।

ati sundar shabdon ka sangam!

Dorothy 10/13/2010 11:29 PM  

"कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में."
बेहद मर्मस्पर्शी रचना.
आभार.
सादर डोरोथी.

उम्मतें 10/14/2010 4:56 PM  

कमबख्त ख्वाबों को भी नुकसान पंहुचाती है :) अच्छी कविता !

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 10/15/2010 12:08 PM  

आँखों के समंदर में
ये कैसा तूफां है
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"कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में."
.. behad sundar likha hai Sangeeta ji.....

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 10/15/2010 12:08 PM  

आँखों के समंदर में
ये कैसा तूफां है
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"कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में."
.. behad sundar likha hai Sangeeta ji.....

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 10/15/2010 12:08 PM  

आँखों के समंदर में
ये कैसा तूफां है
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"कोशिश थी मेरी कि
बच जाए महल सपनों का
पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी
कि समां गया
सुनामी की बाहों में."
.. behad sundar likha hai Sangeeta ji.....

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 10/15/2010 2:45 PM  

बहुत सुन्दर दी. बधाई.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 10/16/2010 5:34 PM  

दम तोड़ देती है
हर चाहत
जूझ कर खुद ही
सागर की लहरों के
हर थपेडे को सह कर ।

बेहद भावपूर्ण !

sandhyagupta 10/16/2010 11:29 PM  

दशहरा की ढेर सारी शुभकामनाएँ!!

रचना दीक्षित 10/17/2010 8:55 PM  

शुष्क है मन और
अब आँखें भी खुश्क हैं
न ख्वाहिश है कोई मन में
न ख्वाब आँखों में है।

अच्छी भावपूर्ण कविता !

रंजना 10/22/2010 4:20 PM  

भावपूर्ण,मर्मस्पर्शी अतिसुन्दर रचना...

प्रिया 11/15/2010 8:25 PM  

kaafi dino baat blogs padhe...bahut kam aisa mila jisne dil ko chua ho...na jaane kyon aapki ye rachna mood ke according fit baithi....kai baar padha....apni si lagi :-)

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