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जुगुप्सा की प्यास

>> Sunday, October 17, 2010



नमक के बिना 
स्वाद नहीं आता 

खाने में ,
और 
जिंदगी में भी
नमक 
होना ही चाहिए 
दोस्त भी 
घुल जाते हैं 
पानी में 
नमक की तरह 
और भूल जाते हैं 
कि कभी 
रहता था उनका 
अलग वजूद .

पर अग्निकण जब 
वाष्पित कर देते हैं 
पानी को 
तो रह जाता है 
मात्र नमक 
रुक्षता लिए हुए ,

बढ़ जाती है तब
जुगुप्सा की प्यास 
नहीं  दिखता  फिर 
कोई आस - पास 
न कोई स्नेह धार 
फूटती है 
न ही कोई शीतल 
झरना  बहता है   
अपने - अपने 
अहम के दावानल में 
फिर इंसान 
स्वयं ही 
स्वयं को झोंकता है .

चाहते हो गर 
अग्नि से बचना 
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर 
काबू पाओ 
मिल जायेंगे फिर 
मीठे झरने 
बस तुम 
चिंगारी को 
मत हवा दिखाओ ...



81 comments:

ashish 10/17/2010 6:40 PM  

आप भावनाओ को उद्घृत करने के लिए प्रयुक्त बिम्बों से चमत्कृत कर देती हो . मानवीय संबंधो की रासायनिक क्रिया के माध्यम से संतृप्त विलयन वाली अभिव्यक्ति .

मनोज कुमार 10/17/2010 6:40 PM  

संयत कवित्‍व से भरपूर कविता में आपका व्‍यापक सरोकार निश्चित रूप से मूल्‍यवान है। काव्‍यभाषा सहज है। इनमें कल्पना की उड़ान भर नहीं है बल्कि जीवन के पहलुओं को देखने और दिखाने की जद्दोजहद भी है।

shikha varshney 10/17/2010 6:51 PM  

जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ
मिल जायेंगे फिर
मीठे झरने
बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ
बस यही सार है ..काश समझ जाये हर कोई तो कोई भी रिश्ता न टूटे.
बेहतरीन रचना दी ! एक एक पहलु को सलीके से समझती हुई.

Kailash Sharma 10/17/2010 7:12 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ
मिल जायेंगे फिर
मीठे झरने
बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ ...

संबंधों के बिखराव और बचाव का बहुत ही सुन्दर रासायनिक विश्लेषण और उपचार..बहुत ही सुन्दर विम्बों का प्रयोग...बधाई..

Unknown 10/17/2010 7:15 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ
yathaarth rachaa-basaa hai har panktimein, badhaai!

Udan Tashtari 10/17/2010 7:29 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ

-पते की बात....बहुत बढ़िया. :)

राज भाटिय़ा 10/17/2010 7:40 PM  

एक सुंदर संदेश देती आप की यह सुंदर कविता, धन्यवाद
विजयादशमी की बहुत बहुत बधाई

Anonymous,  10/17/2010 7:44 PM  

bahut hi khubsurti se likha hai aapne..
achhi lagii rachna...

अजित गुप्ता का कोना 10/17/2010 7:48 PM  

मित्रता को केन्द्रित करके अच्‍छी रचना दी है। सही मायने में मित्र वही होते हैं जो एक दूसरे के मन के पूरक होते हैं, उनकी भावनाएं एक होती हैं तभी तो वे पानी में नमक की तरह घुल जाते हैं और पृथक वजूद में दृष्टिगत नहीं होते। लेकिन हमारी सांसारिक इच्‍छाएं कहाँ रहने देती हैं किसी मित्र को केवल मित्र? अच्‍छी कविता है। बधाई।

प्रतिभा सक्सेना 10/17/2010 8:08 PM  

मानवीय संबंधों का बहुत सुन्दर विश्लेषण.संगीता ,जी भाव और भाषा दोनों पर अच्छी पकड़ है आपकी .

उस्ताद जी 10/17/2010 8:12 PM  

5/10


रचना में उत्कृष्ट भाव हैं, नयापन है, प्रयोग है.
पोस्ट आम पाठक के लिए नहीं है.

प्रवीण पाण्डेय 10/17/2010 8:17 PM  

बड़ी सुन्दर सलाह है आपकी।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 10/17/2010 8:39 PM  

मिल जायेंगे फिर
मीठे झरने
बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ ...
--
आपकी रचना सत्य ही बोलती है!
--
असत्य पर सत्य की विजय के पावन पर्व
विजयादशमी की आपको और आपके परिवार को
बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

रचना दीक्षित 10/17/2010 8:57 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ
बहुत कुछ कह दिया आपने तो नामक के बहाने

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 10/17/2010 9:29 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ
मिल जायेंगे फिर
मीठे झरने
बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ ...

bahut sundar... Namak aur dost.. aur unki katha aik taraajo me rakh kar bahut sundar dhang se aapne kuch kaam ki baate bata dee..

Sadhana Vaid 10/17/2010 9:30 PM  

बहुत खूबसूरत रचना संगीता जी ! बस इन्ही मीठे झरनों की तलाश में कभी कभी सारा जीवन बीत जाता है और मीठे पानी की प्यास लिये अधर तृषित ही रह जाते हैं ! अति सुन्दर !

ZEAL 10/17/2010 9:51 PM  

.

तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ
मिल जायेंगे फिर
मीठे झरने
बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ ...

हमेशा की तरह एक बेहद प्रभावी अभिव्यक्ति --आभार
.

Unknown 10/17/2010 9:59 PM  

sandesh deti aapki yah panktiyan...
Adbhut Rachna ..

VIKAS PANDEY

www.vicharokadarpan.blogspot.com

डॉ. मोनिका शर्मा 10/17/2010 10:10 PM  

सुंदर सलाह और सार्थक सन्देश देती रचना ..... दशहरे की शुभकामनाएं

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 10/17/2010 10:35 PM  

बढ़ जाती है तब
जुगुप्सा की प्यास
नहीं दिखता फिर
कोई आस - पास
न कोई स्नेह धार
फूटती है
न ही कोई शीतल
झरना बहता है
अपने - अपने
अहम के दावानल में
फिर इंसान
स्वयं ही
स्वयं को झोंकता है...
हमेशा की तरह...बहुत उम्दा रचना.
विजयदशमी पर्व की शुभकामनाएं

M VERMA 10/17/2010 10:43 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ

बहुत सुन्दर .. सद्विचार
गहरा अर्थ

Dorothy 10/17/2010 11:08 PM  

जब तक हम एक दूसरे में पानी और नमक बन घुले मिले रहते हैं तो जिंदगी में भी स्वाद बना रहता है. पर जब परिस्थितियों की आंच अगर हमें अपने चरित्र को ही नकार देने के लिए विवश कर देती है तो जिंदगी भी अपना स्वाद खो देती है. आपसी संबंधो की एक कड़ी, मित्रता के अंतर्संबंधों की सच्चाई को उजागर करती, एक दूसरे के लिए दावानल की जगह शीतल झरना बने रहने का संदेश देती, एक बेहद भाव प्रवण रचना जो बड़ी खूबसूरती से मन में एक अमिट छाप छोड़ जाती है. आभार.
सादर
डोरोथी.

S.M.Masoom 10/17/2010 11:35 PM  

Bahut sunder.
चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ

कुमार संतोष 10/17/2010 11:42 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ

बहुत सुन्दर रचना
बहुत कुछ सिखाती है !

Anonymous,  10/17/2010 11:46 PM  

संगीता जी मेरे ब्लॉग पर भी पधारें..

ज़िन्दगी अधूरी है तुम्हारे बिना.. ....

Mumukshh Ki Rachanain 10/18/2010 7:05 AM  

बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ .

वह क्या बात है............कितनी सहज़ता से अपनी ही क्या हम सब की बात कह गयीं....
हार्दिक बधाई.........

चन्द्र मोहन गुप्त

उम्मतें 10/18/2010 7:50 AM  

मुझे तो यहां दो कवितायें दिखाई दीं वो भी एकदम अलग अलग !

१.नमक के बिना ...नमक रुक्षता लिए हुए !

२.बढ़ जाती है ...मत हवा दिखाओ !

इन दोनों कविताओं को 'बढ़ जाती है के' साथ 'तब' लगा कर जोड़ा गया है यहां 'जब' का प्रयोग करते ही दोनों कविताएं अलग अलग हो जायेंगी वैसे भी दोनों हिस्से एक दूसरे से अलग अलग तो हैं ही !

मेरे ख्याल से अग्नि कणों से वाष्पित हो नमक रह जाने और नमक के फिर से पानी में घुल जाने का चक्र निरंतर और प्राकृतिक है तथा इसमें जुगुप्सा को घुसाना अनावश्यक /अप्राकृतिक है ! इसलिए पहली कविता यहीं पर पूर्ण हुई !

दूसरी कविता जुगुप्सा की प्यास बढनें से शुरू होकर एक सन्देश पर खत्म होती तो इसमें बेचारा नमक और उसकी रुक्षता कहाँ से आ गयी ?

मैंने जो कहा वो मेरा व्यक्तिगत ख्याल है बाकी कवि आप हैं ,कविता आपकी है उससे जैसा चाहें सुलूक करें आपका अधिकार है !

जमें नहीं तो टिप्पणी डिलीट कर दीजियेगा !

राजभाषा हिंदी 10/18/2010 8:06 AM  

अद्भुत! रचनाओं के द्वारा संदेश हो तो सबका भला है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
बेटी .......प्यारी सी धुन

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 10/18/2010 8:14 AM  

कविता अच्छी है संगीता जी !
विजय दशमी की शुभकामनायें !

Anonymous,  10/18/2010 8:33 AM  

so totally right dadi...bohot bohot acchi kavita hai
luv u dadi

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 10/18/2010 8:47 AM  

शुभ प्रभात दी,
हरियाली के लिए नमी जरुरी है... रिश्तों के लिए भी...
कोई सम्बन्ध स्पष्ट नहीं दिखता पर पता नहीं क्यूँ आपकी रचना पढ़कर गुलज़ार साहब की यह नज़्म याद आ गयी...
"मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे...
अक्सर देखा है कि ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया
या ख़त्म हुआ,
फिर से बाँध के या
सिरा कोई जोड़ के उसमें,
आगे बुनने लगते हो,
लेकिन तेरे इस ताने में
इक भी गाँठ गिरह बुन्तर की
देखा नहीं सकता है कोई...
मैंने भी बुनना चाह था
इक ताना रिश्तों का
लेकिन उसकी सारी गांठे
साफ़ नज़र आती हैं, मेरे यार जुलाहे...
मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे... "
बढ़िया कविता के लिए और विजयोत्सव की बधाई.

vandan gupta 10/18/2010 9:37 AM  

मानवीये संबन्धो का गहन विश्लेषण्……………यही तो रिश्तों की भाषा है जो कोई समझ ना पाता है।

Arvind Mishra 10/18/2010 10:53 AM  

जुगुप्सा खुद ही एक प्यास हैं !

संजय भास्‍कर 10/18/2010 11:50 AM  

बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ
हमेशा की तरह एक बेहद प्रभावी अभिव्यक्ति --आभार

Anonymous,  10/18/2010 12:14 PM  

जुगुप्सा ही रिश्तों को बिगाड़ती है.अपवित्र करती है.सही कहा आपने.

Taarkeshwar Giri 10/18/2010 1:17 PM  

Main to Padhte hi Namkeen Ho gaya.

Khare A 10/18/2010 2:44 PM  

kavita salty context me hain. but sweet he,

bahut achhe se aapne samjhaya he

badhai

रेखा श्रीवास्तव 10/18/2010 3:09 PM  

जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ
मिल जायेंगे फिर
मीठे झरने
बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ ...

कविता में बड़े सुन्दर भावों को समेट कर रखा है , गर ये समझ ही आ जाये तो फिर कुछ और ही रूप हो इस दुनियाँ का और मानव का.

ashish 10/18/2010 3:23 PM  

मै अपनी अल्प बुद्धि से इतना कहना चाहूँगा की कविता में अगर दो या दो से ज्यादा भावो को प्रकट करने के लिए किसी जब या तब प्रयोग है तो बुरा क्या है . कहने को तो ये भी कहा जा सकता है की नमक ही क्यू , शक्कर क्यू नहीं ? कम से कम वहा रुक्षता तो नहीं मिठास महसूस होती दोस्ती की . और हा शायद ये भी कहा जा सकता है कि वाष्पीकरण के लिए single या multiple evaporators प्रयोग किये गए ये भी नहीं है कविता में .

अनुपमा पाठक 10/18/2010 4:29 PM  

prabhavi bhaav vyakt hue hain!
regards,

अमित 10/18/2010 4:37 PM  

अच्छा सन्देश! अच्छे विचार !
सराहनीय !

अमित 10/18/2010 4:37 PM  

अच्छा सन्देश! अच्छे विचार !
सराहनीय !

Anonymous,  10/18/2010 4:40 PM  

इस बार मेरे नए ब्लॉग पर हैं सुनहरी यादें...
एक छोटा सा प्रयास है उम्मीद है आप जरूर बढ़ावा देंगे...
कृपया जरूर आएँ...

सुनहरी यादें ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) 10/18/2010 4:43 PM  

सभी पाठकों का आभार ..

अरविन्द जी ,
जुगुप्सा का अर्थ निंदा है ..अब आप इसे प्यास भी कह सकते हैं ..

अलि जी ,
आपकी सोच अपनी जगह दुरुस्त हो सकती है ...लेकिन बहुत बार अपनी बात कहने के लिए दो चीज़ों की तुलना की जाती है ..
यहाँ भी कुछ ऐसा ही है ..मित्रता में कभी कभी इतना घुल जाते हैं जैसे पानी में नमक ...और यदि मित्र से अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं
तो इतने अग्निबाण चलते हैं कि मित्रता मात्र रुक्षता लिए नमक कि तरह हो जाती है ..सारा पानी यानी प्रेम बाष्प बन कर उड़ जाता है ..
उससे भी मन नहीं भरता तो निंदा करके प्यास बुझाने का असफल प्रयत्न किया जाता है ..निंदा भी तो उसी की करी जाती है जिसके बारे में आप सब जानते हों ..
फिर यह भी नहीं दिखाई देता कि आप किससे निंदा कर रहे हैं ..मैंने इस परिस्थिति को जोड़ने का प्रयत्न किया है ...बाकी तो पाठक के ऊपर है कि वो किस तरह रचना को लेते हैं ...आपने इस रचना पर अपने विचार दिए ..आपका आभार ..

समयचक्र 10/18/2010 5:29 PM  

नमक के बिना
स्वाद नहीं आता


खाने में ,
और
जिंदगी में भी
नमक
होना ही चाहिए
दोस्त भी
घुल जाते हैं
पानी में
नमक की तरह

बहुत ही सुन्दर बढ़िया रचना .... आभार

महेन्‍द्र वर्मा 10/18/2010 5:43 PM  

मिल जाएंगे
फिर मीठे झरने
बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ...

यथार्थ को रेखांकित करती एक भावमयी रचना।

rashmi ravija 10/18/2010 5:48 PM  

अग्निकण जब
वाष्पित कर देते हैं
पानी को
तो रह जाता है
मात्र नमक
रुक्षता लिए हुए ,

जीवन का एक सच यह भी है.....बहुत पते कि बात कह दी है, कविता के माध्यम से

Avinash Chandra 10/18/2010 6:53 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ

सब समझ जाते तो... :)

बहुत ख़ूबसूरत नज़्म, शब्द :)
बड़े दिन बाड़ा आया मैं तो देर से पढ़ पाया...

Ravi Shankar 10/18/2010 7:51 PM  

बहुत अच्छी कविता, दी ! बहुत कुछ दिया सोचने और गुनने के लिये।
नमन!

अनामिका की सदायें ...... 10/18/2010 8:36 PM  

जहाँ तक मैं समझी हूँ जुगुप्सा का अर्थ नफरत/ घृणा है और इसी अर्थ को ध्यान में रख कर इस रचना को पढ़ा और समझा है.


चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ
मिल जायेंगे फिर
मीठे झरने
बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ

जीवन की और दोस्ती की सफलता का मन्त्र देती एक सुंदर रचना का सृजन किया है आपने. इस मार्गदर्शन के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.

Chaitanyaa Sharma 10/19/2010 12:23 AM  

वाह दोस्ती पर अच्छा लिखा आपने....

दशहरे की शुभकामनाएं...

deepti sharma 10/19/2010 1:07 AM  

aap bahut achha likhti hai
bahut achhi rachna
hamesa ki tarah

Apanatva 10/19/2010 5:03 AM  

sangeeta bahut sunder sandesh detee ye rachana mujhe bahuuuuuuuuut pasand aaee.........
aur chingaree ko hava dena to aag lagane walee baat hogayee...........

laajawab lekhan .

वाणी गीत 10/19/2010 7:14 AM  

अपने- अपने अहम् के दावानल में
जल जाते हैं स्नेह के तंतु ...
बहुत सुन्दर सार्थक कविता ..
आभार ...!

अजय कुमार 10/19/2010 7:17 AM  

आपसी संबंध और सामंजस्य पर सार्थक रचना ।

सुज्ञ 10/19/2010 12:25 PM  

दीदी,

सार्थक,
अहम के दावानल में
फिर इंसान
स्वयं ही
स्वयं को झोंकता है .

सदा 10/19/2010 12:35 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ ।


बहुत ही सुन्‍दर एवं भावमय प्रस्‍तुति ।

राजेश उत्‍साही 10/19/2010 7:22 PM  

हर हाल में नमक जरूरी है।

Akanksha Yadav 10/20/2010 3:40 PM  

खूबसूरत बिम्बों के माध्यम से कविता और भी रोचक बन जाती है...बधाई.

ghughutibasuti 10/20/2010 5:35 PM  

बहुत सुन्दर संदेश दिया है।
घुघूती बासूती

Urmi 10/20/2010 6:23 PM  

बहुत ख़ूबसूरत और लाजवाब रचना! आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है!

सूर्यकान्त गुप्ता 10/21/2010 7:29 AM  

कविता मन की भावनाओं को किस कदर अलन्कृत कर देती है, यह देखने को मिलता है। बहुत ही सुन्दर एवम मार्मिक प्रस्तुति……आभार।

Anonymous,  10/21/2010 10:03 AM  

kahan ho dadi....long time...

गौरव शर्मा "भारतीय" 10/21/2010 1:18 PM  

वाह बेहद सुन्दर भावाभिव्यक्ति..........
सार्थक एवं प्रभावी पोस्ट के लिए बधाई स्वीकार करें.....

Anonymous,  10/21/2010 1:24 PM  

अहम के दावानल में
फिर इंसान
स्वयं ही
स्वयं को झोंकता है .
बहुत सुन्दर रचना ... बधाई

Anjana Dayal de Prewitt (Gudia) 10/21/2010 3:48 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ
मिल जायेंगे फिर
मीठे झरने
बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ ...

hamesh ki tarah gehri aur sunder baat... saadar!

दिपाली "आब" 10/22/2010 1:02 PM  

oh my god masi jaan
kya baat hai, kya image banai hai.. Brilliant

रंजना 10/22/2010 4:18 PM  

कितनी सुन्दर बात कही आपने...
बस मुग्ध कर लिया आपकी इस रचना के भाल और कला पक्ष ने...

सुज्ञ 10/22/2010 5:25 PM  

दीदी,

मेरे 'घर' पर एक प्रसंसा दृष्टि…।
http://shrut-sugya.blogspot.com/2010/10/blog-post_21.html

हरकीरत ' हीर' 10/22/2010 9:48 PM  

बहुत सुंदर ....
जीवन का सन्देश देती है आपकी रचना संगीता जी ......

Shabad shabad 10/24/2010 3:14 AM  

बहुत सुन्दर भाव....
काश हम यह समझ पाते..
कभी भी रिश्तों में दरार न आती ।

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar 10/25/2010 4:40 PM  

नमक...यानी ‘लवण’। ...और ‘लवण’ ज़रूरी है जीवन में ‘लावण्य’ के लिए!
संगीता जी...आपकी यह रचना काफी पसंद आयी।

..लेकिन क्षमा करें, मैं एक जगह पर अटक गया हूँ- ‘जुगुप्सा की प्यास’ पर। जुगुप्सा का अर्थ(जैसा कि मैं समझता हूँ)है-
किसी घृणास्पद वस्तु को देखकर उससे संबंध न रखने की मनोभावना। ऐसे में,मैं आपका आशय और अभिप्राय नहीं निकाल पा रहा हूँ। बेहतर हो कि आप कुछ प्रकाश डालें।

आशा है, इसे सही परिप्रेक्ष्य में लेंगी! मेरा उद्देश्य आपको या किसी को पीड़ा पहुँचाना नहीं है।

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar 10/25/2010 5:10 PM  

अब आपको कष्ट करने की ज़रूरत नहीं है... मैंने स्वयं ही समझने में भूल की थी। सब कुछ तो यहाँ पर स्पष्ट है..जी! इस पंक्तियों से कि-

"जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ"

दरअस्ल Confusion यहाँ पर हुआ था मुझे-
"बढ़ जाती है तब
जुगुप्सा की प्यास"

यदि आपको कोई पीड़ा हुई हो,उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 10/25/2010 5:14 PM  

जितेन्द्र जी,
आपने मेरी रचना में इतनी रूचि दिखाई ...आभारी हूँ ...आपने केवल जीवन के लावण्य तक की बात कही है.... मैंने मित्रता को भी लिखा है ...और जब दोस्ती से पानी रुपी प्रेम और विश्वास ख़त्म हो जाता है तो बस खारापन बचा रह जाता है ...जिससे मन में दोस्त के प्रति निंदा या घृणा की भावना आ जाती है ...और तब वह अपनी दोस्ती को भूल हर जगह निंदा करता रहता है ...मेरा कहने का अर्थ केवल इतना ही है कि भले ही आपकी दोस्ती ख़त्म हो जाये पर दोस्त कि निंदा करना उचित नहीं है ..कभी तो अच्छे दोस्त रहे ही थे न....

जयकृष्ण राय तुषार 10/26/2010 4:36 PM  

bahut sundar badhai sangeetaji karva chauth ki shubhkamnayen

दिगम्बर नासवा 10/26/2010 5:49 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ
मिल जायेंगे फिर
मीठे झरने
बस तुम
चिंगारी को
मत हवा दिखाओ ..

कवि की ये विशेषता है जो वो कहना चाहता है कुछ ही शब्दों में कह देता है .... सरलता से बहुत गहरी बात कही है आपने ...

mridula pradhan 10/26/2010 10:33 PM  

padhkar bahut achcha laga.hamesha ki tarah.

अशोक कुमार मिश्र 10/27/2010 10:25 PM  

चाहते हो गर
अग्नि से बचना
तो ,
जुगुप्सा की प्यास पर
काबू पाओ........

बहुत अच्छी रचना भावों को पकड़ा है आपने .....
तराशा है .......
धन्यवाद.......
http://nithallekimazlis.blogspot.com/

उपेन्द्र नाथ 10/27/2010 11:59 PM  

sangeeta ji

bahoot hi sunder tarike se aapne bhavo ko ukera hai............ very nive

वीरेंद्र सिंह 10/28/2010 5:28 PM  

हर बार की तरह मैंने आपकी इस कविता को भी ध्यान से पढ़ा.
इस कविता के माध्यम से दिया गया आपका सन्देश बहुत अच्छा है.

joshi kavirai 11/07/2010 6:41 PM  

तुलसी ने भी कहा है
'नमक के बिना कैसा व्यंजन'
आपने उसे भिन्न सन्दर्भ में प्रयोग किया है | अच्छा है | रमेश जोशी

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