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कुछ कम तो न था ...

>> Tuesday, January 10, 2023

 


जो नहीं  मिला ज़िन्दगी में, उसका कुछ ग़म तो न था । 
पर मिला जितना भी ज़िन्दगी में, वो भी कुछ कम तो न था 

 पानी की चाहत में  हम, जो घूमे  सहरा - सहरा 
दिखा सराब  तो हममें भी सब्र कुछ कम तो न था ।

बह गया आँख से पानी, रिस गए दिल के छाले 
यूँ  शिद्दत से छुपाए थे, मेरा ज़र्फ़ कुछ कम तो न था । 

वज़ूद में मेरे  न जाने अब, क्या क्या घुल गया है 
 यूँ तो ख्वाहिशों का रंग भी ज़र्द कुछ कम तो न था ।

तपिश थी आंखों में और सुलग रहा था  सीना मेरा 
अरमानों का कोयला भी" गीत " ,सर्द  कुछ  कम तो न था ।






28 comments:

Meena Bhardwaj 1/10/2023 11:10 PM  

लाज़वाब और बेहतरीन अशआरों से सजी हृदयस्पर्शी ग़ज़ल रची है आपकी लेखनी ने। हर शेर अपने आप में गहन भाव लिए हुए..,।सादर सस्नेह वन्दे आदरणीया दीदी!

Anita 1/11/2023 10:40 AM  

बेहद खूबसूरत अंदाज़ में दिल से निकले हुए जज़्बातों को आपने अपनी ग़ज़ल में शब्द दिए हैं।
ख़्वाहिशों का क्या बढ़ती जाती बेलों की तरह
तेरा करम हम पर ऐ खुदा कभी कम तो न था।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 1/11/2023 11:13 AM  

प्रिय मीना ,
बहुत शुक्रिया इस रचना तक पहुँचने के लिए ।

अनिता जी ,
आपका एक शेर पूरी ग़ज़ल पर भारी है ।
आभार ।

Usha Kiran,  1/11/2023 11:17 AM  

वाह…बहुत सुन्दर 👏👏👏

मुदिता 1/11/2023 11:42 AM  

अरे ग़ज़ब ….हर शेर आपके ज़र्फ़ और सब्र की कहानी कह रहा है

कुछ मेरी भी

कुव्वतें बहुत थी लेकिन , पाँव थे ज़मीन पर
परवाज़ को मेरे पंखों की ,अर्श कुछ कम तो ना था 🥰

रश्मि प्रभा... 1/11/2023 12:03 PM  

जो मिलता है, हम अक्सर उसे भूल जाते हैं, जबकि यह सच है कि दर्द और सुख दोनों मिले

shikha varshney 1/11/2023 2:11 PM  

कितनी खूबसूरत ग़ज़ल है। दर्द बहुत है लेकिन इसमें जीने का जज़्बा भी कुछ कम तो न था।

Sweta sinha 1/11/2023 3:30 PM  

दर्द, अश्क़,ग़म की बूँदाबादी कुछ सूखी गीली ज़िंदगी
मुस्कुराए भी तो दिल में अब्र कुछ कम तो न था
-----
जी दी,
दिल में गहरी उतरती गज़ल... हर शेर बार बार पढ़ने का मन हो रहा।
बहुत सुंदर,शानदार।
सप्रेम।

Kamini Sinha 1/11/2023 6:15 PM  

सादर नमस्कार ,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार (12-1-23} को "कुछ कम तो न था ..."(चर्चा अंक 4634) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
------------
कामिनी सिन्हा

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 1/11/2023 6:33 PM  

पानी की चाहत में हम, जो घूमे सहरा - सहरा
दिखा सराब तो हममें भी सब्र कुछ कम तो न था ।

बह गया आँख से पानी, रिस गए दिल के छाले
यूँ शिद्दत से छुपाए थे, मेरा ज़र्फ़ कुछ कम तो न था ।

लाजवाब 🙏

वाणी गीत 1/11/2023 7:05 PM  

जो मिला वह भी कम ना था!
वाह!

जिज्ञासा सिंह 1/12/2023 12:56 AM  

पड़ते हैं, मिट जाते हैं छालों का क्या?
अपनी दुनिया अंगारों पे ख़ूब सजी,
जब निकलीं आहें छालों की चिलकन से,
गांव, शहर, घर, गली दुंदुभी खूब बाजी !

हर एक शेर अपने आप में मुकम्मल है,
बिलकुल अपनी सी, बहुत उम्दा गजल दीदी ।

Sudha Devrani 1/12/2023 8:19 AM  


जो नहीं मिला ज़िन्दगी में, उसका कुछ ग़म तो न था ।
पर मिला जितना भी ज़िन्दगी में, वो भी कुछ कम तो न था
बस यही एक भाव सब्र करना सिखाता है । संतुष्टि से भरता है मन को।नहीं तो जीवन बस जंग के सिवाय कुछ और नहीं।
जीवन के अनुभवों से प्रेरित बहुत ही लाजवाब गजल
वाह!!!!

विभा रानी श्रीवास्तव 1/12/2023 9:37 AM  

वाह
बहुत सुंदर रचना

गिरिजा कुलश्रेष्ठ 1/12/2023 11:34 AM  

वाह, ख्वाहिशों का रंग भी जर्द कुछ कम तो न था.. बहुत खूब.

दिगम्बर नासवा,  1/12/2023 2:47 PM  

बहुत गहराई लिए हर शेर .. जो मिला कुछ कम तो नहीं था …
लाजवाब …

संगीता स्वरुप ( गीत ) 1/12/2023 4:36 PM  

आप सभी पाठक वृन्द का हार्दिक आभार ।
@मुदिता ....
बेहतरीन शेर लिखा है ....
श्वेता ....... लाजवाब शेर ।
जिज्ञासा ..... आंसू सब कुछ कह देते हैं ....
सुधा ..... खुद को सब्र करना सिखाना ही पड़ता है ।

संध्या शर्मा 1/12/2023 8:55 PM  

बहुत सुंदर लिखा है आपने। जब सुख अपने हैं तो दुख भी स्वीकारने होंगे...

Prakash Sah 1/12/2023 11:43 PM  

"पर मिला जितना भी ज़िन्दगी में, वो भी कुछ कम तो न था "

बहुत बढ़िया।

yashoda Agrawal 1/13/2023 2:43 PM  

तपिश थी आंखों में और
सुलग रहा था सीना मेरा
अरमानों का कोयला भी"
गीत " ,सर्द कुछ कम तो न था ।
बेहतरीन
सादर नमन

Anonymous,  1/13/2023 9:03 PM  

बहुत सुंदर भाव!

रेखा श्रीवास्तव

Rupa Singh 1/14/2023 5:14 PM  


तपिश थी आंखों में और सुलग रहा था सीना मेरा

वाह!! लाजवाब रचना

Tarun / तरुण / தருண் 1/18/2023 2:17 PM  

आदरणीया संगीता स्वरुप जी ! प्रणाम !
सुन्दर गजल के लिए अभिनन्दन !
रचना को आशीर्वाद देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार !
प्रतिक्रया में विलम्ब हेतु क्षमा चाहूंगा !
आपको व समस्त "पांच लिंको का आनन्द " मंच को मकर सक्रांति एवं उत्तरायण की हार्दिक शुभकामनाएँ !
जय श्री राम !
ईश्वर आपके प्रयास क पूर्णता एवं श्रेष्ठता प्रदान करे , शुभकामनाएं !

Anonymous,  1/25/2023 8:43 AM  

बहुत ही खूबसूरत रचना

Anonymous,  2/02/2023 7:39 PM  

बहुत खूब

Bharti Das 3/13/2023 9:58 PM  

बहुत खूबसूरत रचना

संजय भास्‍कर 4/30/2023 2:06 PM  

बहुत खूबसूरत रचना

Admin 12/29/2025 5:16 PM  

यह ग़ज़ल बहुत सादगी से ज़िंदगी की पूरी कहानी कह देती है। जो नहीं मिला उसका ग़म भी है और जो मिला उसकी क़द्र भी, यही संतुलन इसे खास बनाता है। दर्द, सब्र और ख़ामोशी को आपने बहुत सहज शब्दों में पिरोया है। पढ़ते हुए लगा जैसे शायर खुद से ही बात कर रहा हो और पाठक उस बातचीत का हिस्सा बन गया हो।

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