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पुस्तक परिचय -- दर्द का चन्दन ( उषा किरण )

>> Sunday, January 1, 2023

 


डॉ० उषा किरण का उपन्यास " दर्द का चंदन " जब मेरे हाथ में आया तो इसकी साज - सज्जा देखते ही बनती थी । खूबसूरत  आवरण जिसे उषा किरण जी द्वारा ही चित्रित किया गया है, मन को मोह लेता है । पृष्ठों की गुणवत्ता उत्कृष्ट  है और छपाई भी सुंदर है । वर्तनी भी तकरीबन शुद्ध  है ।
यह उपन्यास अपने अनुज की स्मृति में उनको  समर्पित किया गया है । डॉ०उषा किरण  ने अपने वक्तव्य में इस उपन्यास के लिए लिखा है कि - 
ये हौसलों की कथा है 
निराशा पर ,आशा की 
हताशा पर आस्था की 
पराजय पर विजय की कथा है । 

दर्द  का चंदन  -  एक  ऐसा कथानक  जो एक कैंसर के मरीज़ के जीवन की हकीकत को बहुत नजदीक से देखते हुए बारीकी से बुना गया  है ।
भाई का कैंसर से जूझना चलचित्र की तरह दिखाई देता है । उस समय की मानसिक यंत्रणा झकझोर देती है ।हर समय होने वाली मनः स्थिति को शब्द चित्र में उकेर दिया है । 
 इस  उपन्यास  की नायिका ईश्वरीय शक्ति में बहुत आस्था रखती है   और दैवीय शक्तियों को भी मानतीं है । स्वप्न में बार बार पिता को देखना और इसको अपनी खराब तबियत से रिलेट करना जैसे पिता से गहराई से जुड़े रहने की भावना है । यूँ तो आज लोग काफी जागरूक हैं कैंसर के प्रति लेकिन जिस तरह से नायिका ने अपनी बीमारी के प्रति सजगता दिखाई वो बिरला ही कोई कर पाता है अन्यथा डॉक्टर के कह देने पर कि सब रिपोर्ट सही है ,निश्चिंत ही हो जाते हैं । यहाँ पर लेखिका यह संदेश दे रही हैं कि जब तक आप संतुष्ट न हों तब तक निश्चिंत न हों । इलाज से पहले ईश्वर के साथ संवाद  नायिका के  मन की दृढ़ता को दर्शाता है । 
       लेखिका ने इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया है कि कोई भी चाहे कितना ही धैर्यवान और दृढ़ इच्छा शक्ति वाला क्यों न हो उसे परिवार के हर सदस्य का साथ और मजबूत बना देता है । इस उपन्यास का कथानक  इतनी सकारात्मकता लिए हुए है कि इलाज के दौरान हुई तकलीफें कम होती महसूस होती रहीं। । इस के माध्यम से लेखिका ने , कैंसर पेशेंट के साथ लोग किस तरह का व्यवहार करते हैं और कैसा करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए सभी पर प्रकाश डाला है ।  किस तरह इस की नायिका विजेता बन कर उभरी है ,प्रेरणा लेने लायक है ।
उपन्यास का हर भाग  एक छोटी सी कविता से प्रारंभ कर लेखिका ने इसको और भी भावपूर्ण बना दिया है । मन के ही किसी कोने में आपके बुद्ध हैं तो कहीं कबीर और आपने उनको इतना आत्मसात कर लिया है कि आप दूसरों की बड़ी से बड़ी गलतियों को क्षमा कर पाती हैं   ।  कभी कभी किसी की बद्दुआएँ भी दुआएँ बन जाती हैं । कैसे कोई किसी की मृत्यु की कामना कर लेता है , जाना तो सबको  है फिर ऐसी भावना क्यों ? रेल की यात्रा  में सहयात्रियों का सहयोग और स्नेह अभिभूत कर गया  । याद आ गईं ऐसी ही 40 -50 साल पहले की यात्राएँ जिनमें सामान में एक खाने की टोकरी ज़रूर हुआ करती थी और साथ में सुराही भी ।
इस  की नायिका ने  बीमारी से ज़द्दोज़हद करते हुए आखिर भरपूर खुशी की लम्हें  अपने नाम किये और अपनी जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाया ।असल जिंदगी में भी हौसला रखने वालों की कहानी सुखद होती है  ।  लेखिका के पास शब्दों की जादूगरी का हुनर है । 
अंत में बस इतना ही कहूँगी कि किसी के लिए भी आपबीती लिखना इतना सरल नहीं है । उस दर्द से दोबारा गुज़रने की क्रिया है । लेकिन डॉ० उषा किरण का मानना है  कि दर्द से गुज़र जाना ही बी पॉज़िटिव होना है । 
आखिरकार दर्द  अब  चंदन बन महक ही गया । 
आशा है इस उपन्यास की सुगंध दूर तक फैलेगी ।

यह उपन्यास हिंदी बुक सेंटर द्वारा प्रकाशित किया गया है । सुंदर छपाई और पृष्ठों की गुणवत्ता के लिए प्रकाशक बधाई के पात्र हैं ।

 शुभकामनाओं के साथ ..

 संगीता स्वरूप ।






उपन्यास -  दर्द का चन्दन 

लेखिका - डॉ ०  उषा किरण 

ISBN - 978-93- 95310 - 00 - 0 

मूल्य -  225 /

प्रकाशक - हिंदी बुक सेंटर ,  4/ 5  - बी , आसफ अली रोड 
नयी दिल्ली -  110002 



पुस्तक मँगाने का लिंक --

https://www.flipkart.com/dard-ka-chandan/p/itm7661794969ebb?pid=RBKGHCPNBQKRZBZP&lid=LSTRBKGHCPNBQKRZBZPZJA3KH&marketplace=FLIPKART&q=dard+ka+chandan+book&store=bks&pageUID=1672341052700

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स्मृतियों में रूस ... ( शिखा वार्ष्णेय ) ..मेरी नज़र से

>> Tuesday, December 20, 2011



शिखा वार्ष्णेय ब्लॉग जगत का जाना माना नाम है पत्रकारिता में उन्होंने तालीम हासिल की है  और स्वतंत्र पत्रकार के रूप में वो लेखन कार्य से जुडी हुई हैं .. आज उनकी पुस्तक “ स्मृतियों में रूस “ पढ़ने का सुअवसर मिला .. यह पुस्तक उनके अपने उन अनुभवों पर आधारित है जो उनको अपनी पत्रकारिता की शिक्षा के दौरान मिले ..पाँच वर्ष के परास्नातक के पाठ्यक्रम को करते हुए जो कुछ उन्होंने महसूस किया और भोगा उस सबका निचोड़ इस पुस्तक में पढ़ने को मिलता है .उनकी दृष्टि से रूस के संस्मरण पढ़ना निश्चय ही रोचक है . स्कॉलरशिप के लिए चयन होने पर भारतीय माता पिता के मनोभावों की क्या दशा होती है उसको सुन्दर शैली में बाँधा है--


"आयोजन कर्ता सब करेंगे और अकेली थोड़े न जा रही है और ३० बच्चे हैं सब इसी की उम्र के होंगे.पापा बोले जा रहे थे कहने को तो यह सब वह मम्मी से कह रहे थे जो कि नाते रिश्तेदारों की बातों से परेशान थीं "

नए देश में सबसे पहले समस्या आती है भाषा की ..और इसी का खूबसूरती से वर्णन किया है जब उनको अपने बैचमेट के साथ चाय की तलब लगी ...
"हम कैफे आ गए. और शुरू हुई मुहीम वहां अटेंडेंट को चाय समझाने की .अपने हाव भाव से, कुछ अंग्रेजी को तोड़-मोड़ के, घुमा घुमा का होंट, बनाकर मुंह टेढ़े मेढे, वह महोदय हो गए शुरू. अब हमारा वह मित्र कहे टी-... टी ..., फॉर टी प्लीज. पर वह महिला समझ ही नहीं पा रही थी."
      अनेक तरह से समझाने का प्रयास करने के बाद पता चला कि रुसी में भी चाय को चाय ही कहते हैं . 
शिखा ने अपनी पुस्तक में मात्र अपने अनुभव नहीं बांटे हैं ... अनुभवों के साथ वहाँ की संस्कृति , लोगों के व्यवहार , दर्शनीय स्थल का सूक्ष्म विवरण , उस समय की रूस की आर्थिक व्यवस्था , राजनैतिक गतिविधियों  सभी पर अपने विचार प्रस्तुत किये हैं .जिससे पाठकों को रूस के बारे में अच्छी खासी जानकारी हासिल हो जाती है ..
      रुसी लोग कितने सहायक होते हैं इसकी एक झलक मिलती है जब भाषा सीखने के               लिए उन्हें वोरोनेश  भेजा गया .और जिस तरह वह एक रुसी लडकी की मदद से वो   यूनिवर्सिटी पहुँच पायीं उसका जीवंत वर्णन पढ़ने को मिलता है .
 उस समय रूस में बदलाव हो रहे थे ---और उसका असर वहाँ की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा था ..इसकी झलक भी इस पुस्तक में दिखाई देती है .


"आर्थिक तंगी का असर लोगों के काम पर उनके व्यक्तित्व पर जाहिर तौर पर पड़ रहा था नौजवान रूसियों में विदेशियों के खिलाफ मानसिकता जन्म लेने लगी थी.गहरे रंग वाले विदेशियों को मारने  पिटने की कई घटनाये सामने आने लगी थीं यहाँ तक कि कुछ हत्याओं की घटनाएँ भी सुनने में आने लगीं थीं." 

वहाँ के दर्शनीय स्थलों की जानकारी काफी प्रचुरता से दी गयी है ... इस पुस्तक में रुसी लडकियों की सुंदरता से ले कर वहाँ के खान पान पर भी विस्तृत दृष्टि डाली गयी है ..यहाँ तक की वहाँ के बाजारों के बारे में भी जानकारी मिलती है ..




शिखा ने जहाँ अपने इन संस्मरणों में पाँच साल के पाठ्यक्रम के तहत उनके साथ होने वाली घटनाओं और उनसे प्राप्त अनुभवों को लिखा है वहीं रूस के वृहद्  दर्शन भी कराये हैं ...

इस पुस्तक को पढ़ कर विदेश में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को किस किस कठिनाई से गुज़रना  पड़ता है इसका एहसास हुआ ..इतनी कम उम्र में अनजान देश और अनजान लोगों के बीच खुद को स्थापित करना , आने वाली हर कठिनाई का सामना करना ,भावुक क्षणों में भी दूसरों के सामने कमज़ोर न पड़ना  , गलत को स्वीकार न करना और हर हाल में सकारात्मक सोच ले कर आगे बढ़ना . ये कुछ लेखिका की विशेषताएँ हैं जिनका खुलासा ये पुस्तक करती है .  पुस्तक पढते हुए मैं विवश हो गयी यह सोचने पर कि कैसे वो वक्त निकाला होगा जब खाने को भी कुछ नहीं मिला और न ही रहने की जगह .प्लैटफार्म पर रहते हुए तीन  दिन बिताने वो भी बिना किसी संगी साथी के ..इन हालातों से गुज़रते हुए और फिर सब कुछ सामान्य करते हुए कैसा लगा  होगा ये बस  महसूस ही किया जा सकता है ..
हांलांकि यह कहा जा सकता है कि पुस्तक की  भाषा साहित्यिक न हो कर आम बोल – चाल की भाषा है .. पर मेरी दृष्टि में यही इसकी विशेषता है ... पुस्तक की भाषा में मौलिकता है और यह शिखा की मौलिक शैली ही  है जो पुस्तक के हर पृष्ठ को रोचक बनाये हुए है ..भाषा सरल और प्रवाहमयी है जो पाठक को अंत तक  बांधे रखती है कई जगह चुटीली भाषा का भी प्रयोग है जो गंभीर  परेशानी में भी हास्य का पुट दे जाती है --
 "अब उसने भी किसी तरह हमारे शब्द कोष में से ढूँढ ढूँढ कर हमसे पूछा कि कहाँ जाना है. हमने बताया. अब उसे भी हमारे उच्चारण  पर शक हुआ. इसी  तरह कुछ देर शब्दकोष  के साथ हम दोनों कुश्ती करते रहे अंत में हमारा दिमाग चला और हमने फटाक  से अपना यूनिवर्सिटी  का नियुक्ति पत्र उसे दिखाया."
.हाँलांकि इस पुस्तक के कुछ अंश हम शिखा के ब्लॉग स्पंदन पर पढ़ चुके हैं लेकिन उसके अतिरिक्त भी काफी कुछ बचा था जो इस पुस्तक के ज़रिये हम तक पहुंचा है
पुस्तक में दिए गए रूस के दर्शनीय स्थलों के  चित्र पुस्तक को और खूबसूरती प्रदान कर रहे हैं . कुल मिला कर रोचक अंदाज़ में रूस के बारे में जानना हो तो यह पुस्तक अवश्य पढ़ें ..


पुस्तक -- स्मृतियों में रूस 
लेखिका - शिखा वार्ष्णेय 
प्रकाशक - डायमंड पब्लिकेशन 
मूल्य  -- 300 /रूपये

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New Delhi-110020 , India
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