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धर्मराज युधिष्ठिर

>> Sunday, February 21, 2021


युधिष्ठिर , 
तुम नहीं रहे  कभी भी 
मेरी जिज्ञासा के पात्र 
रहे तुम केवल 
पांडवों में से एक मात्र । 
तुम्हारे पूरे जीवन मे 
बस एक ही प्रसंग 
याद आता है 
जहाँ तुम्हारे होने का 
महत्त्व दर्शाता है । 

यक्ष प्रश्नों के उत्तर दे 
अपने भाइयों को 
जीवन दान दिया था 
बाकी तो तुमने हमेशा
उनका हर अधिकार हरा था । 
पासों की बिसात पर 
तुमने कौन सा रूप
दिखाया था 
एक एक कर 
सारे भाइयों को 
दाँव पर लगाया था 
यहाँ तक कि खुद के साथ 
द्रोपदी भी हार गए थे 
जीतने की धुन में 
एक एक को जैसे मार गए थे
भरी सभा में चीर हरण पर 
तुम्हें शर्म नहीं आयी 
भाइयों की क्रोधाग्नि पर भी 
तुमने ही रोक लगाई ।

द्रोपदी के मन में भी 
कभी सम्मानित न हुए होंगे 
उसके मन में तो हमेशा ही 
कुछ तीक्ष्ण प्रश्न रहे होंगे  
यूँ तो तुम 
कहलाये धर्मराज 
लेकिन एक बात बताओ आज 
जब तुम स्वयं को 
हार चुके थे 
जुए के दाँव पर 
फिर क्या अधिकार बचा था 
तुम्हारा  द्रौपदी पर  ? 

खैर, 
 तुमसे करूँ भी तो 
क्या करूँ प्रश्न 
क्योंकि हर बार की तरह 
बीच में धर्म का पाठ पढ़ा दोगे 
और तर्क कुतर्क से 
खुद को सही बता दोगे ।
ऐसे  लोगों के लिए 
कहते हैं आज कल के लोग 
"जस्ट इग्नोर "
मैं भी नही चाहती 
तुमसे पूछना कुछ और । 

















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पिघलती बर्फ

>> Tuesday, February 16, 2021

बसन्त आगमन का दिन ही 
चुन लिया था मैंने
बासंती जीवन के लिए .
पर  बसंत !  
तुम तो न आये ।

ऐसा नहीं कि 
मौसम नहीं बदले 
ऐसा भी नहीं कि 
फूल नहीं खिले 
वक़्त बदला 
ऋतु बदली 
पर बसन्त !
तुम तो न आये । 

सजाए थे ख्वाब रंगीन 
इन सूनी आँखों में 
भरे थे रंग अगिनत 
अपने ही खयालों में 
कुछ हुए पूरे 
कुछ रहे अधूरे 
पर बसन्त !
तुम तो न आये ।

बसन्त तुम आओ 
या फिर न आओ 
जब भी खिली होगी सरसों 
नज़रें दूर तलक जाएंगी 
और तुम मुझे हमेशा 
पाओगे अपने इन्तज़ार में ,
बस बसन्त ! 
एक बार तुम आओ । 

*****************

अचानक
ज़रा सी आहट हुई
खोला जो दरीचा
सामने बसन्त खड़ा था 
बोला - लो मैं आ गया 
मेरी आँखों में 
पढ़ कर शिकायत 
उसने कहा 
मैं तो कब से 
थपथपा रहा था दरवाजा 
हर बार ही 
निराश हो लौट जाता था 
तुमने जो ढक रखा था 
खुद को मौन की बर्फ से 
मैं भी तो प्रतीक्षा में था कि
कब ये बर्फ पिघले 
और 
मैं कर सकूँ खत्म
तुम्हारे चिर इन्तज़ार को ।
और मैं - 
किंकर्तव्य विमूढ़ सी 
कर रही थी स्वागत 
खिलखिलाते बसन्त का । 



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मौन की साधना

>> Sunday, February 14, 2021



मौन की तलाश में 


मैं मौन हूँ ,


ढूँढती रहती हूँ मै


मौन को अपने अन्दर
लेकिन उठता रहता है 
मन में एक बवंडर 
साँस की ताल पर 
बाँधती हूँ मौन की लय 
ज़िन्दगी के तार कर देते 
सारी सोच का विलय 
बन्द आंखों से फिर 
एक भीड़ नज़र आती है 
और मेरी नज़र खुद को ही 
ढूँढती रह जाती है ।
थक हार फिर से मैं 
साँस की सरगम पकड़ती हूँ
शांत मन से फिर मौन का 
अनुसरण  करती हूँ । 
थोड़ी देर मौन मेरे साथ 
वक़्त बिताता है कि,
कोलाहल का रेला 
फिर से चला आता है ।
बस इसी जद्दोजहद में 
बीत रही है ज़िन्दगी 
मौन को साधना ही 
बन गयी  है बंदगी । 







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पुस्तक परिचय --- ताना बाना - कवयित्री ( डॉ0 उषा किरण )

>> Wednesday, October 7, 2020


 

यूँ तो उषा जी की ताना बाना पर बहुत समृद्ध पाठकों और लेखकों की प्रतिक्रिया आ चुकी है फिर भी हर पाठक का अपना अलग दृष्टिकोण होता है इसलिए मैं भी एक सामान्य पाठक की हैसियत से इस पुस्तक और इस पुस्तक की लेखिका पर अपने विचार रखना चाहूँगी ।

  हिंदी साहित्य के आसमान में उषा किरण एक ऐसा नाम जो उषा की किरण की तरह ही दैदीप्यमान हो रहा है । यूँ तो हर क्षेत्र में ही अपने अपने मठ और मठाधीश हुआ करते हैं जो नए लोगों को बामुश्किल आगे बढ़ने में सहायक होते हैं लेकिन जो इन सबकी परवाह न कर अपनी पगडंडी पकड़ अपना रास्ता बनाता चले वो निश्चित ही अपनी मंज़िल पर पहुँचने में सक्षम होता है । और यह निश्चय डॉ ० उषा किरण के व्यक्तित्व में झलकता है । डॉक्टर उषा किरण  गद्य और काव्य लेखन, दोनो में ही सिद्धहस्त है ।कहानियाँ ऐसे बुनती हैं कि लगता है कि घटनाएँ सब आंखों के सामने घटित हो रही हैं ।लेकिन इस समय केवल इनके काव्य संग्रह  ताना -  बाना पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं । यह पुस्तक मुझे उषा जी के हाथों प्रेम सहित भेंट में मिली ।  यह संग्रह इतने खूबसूरत कलेवर में है कि कुछ देर तो मैं पुस्तक के सौंदर्य को ही देखती रह गयी । इस पुस्तक को इस रूप में प्रस्तुत करने में जिन लोगों का सहयोग मिला वह सब बधाई के पात्र हैं ।यह काव्य संग्रह शिवना प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है । शिवना प्रकाशन को बधाई ।
इस पुस्तक में केवल काव्य ही संग्रहित नहीं वरन चित्र  भी समाहित है । हर रचना के साथ उन भावों को समेटे उसके लिए एक चित्र देख यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि डॉक्टर उषा किरण  में  बेहतरीन  कवयित्री और उम्दा चित्रकार का संगम है । जैसे जैसे उनका ताना बाना पढ़ती गयी उनके भावों की अभिव्यक्ति से अभिभूत होती गयी । हर रचना में जैसे सहज सरल भाषा में अपने भावों को ज्यों का त्यों उड़ेल दिया गया हो । उनकी  कविताएँ उनके आस पास के लोगों , उनकी स्मृतियों ,समाज में घटित घटनाओं , व्यवस्थाओं पर आधारित हैं । 

      इस काव्य संग्रह में हर तरह की कविता का समावेश है । कुछ क्षणिकाएँ हैं जो जीवन दर्शन को कहती प्रतीत होती हैं -
हमारी बातों की उँगलियाँ 
देखो न
बुनती हैं कितने वितान 
*********
सोच की सलाइयों को 
आदत है बुनने की 
रुकती ही नहीं ।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह अहसास होता है कि कवयित्री  अपने परिवार और हर रिश्ते के प्रति सहज सरल निष्ठावान हैं ।अपनी काव्य यात्रा में उन्होंने हर रिश्ते को संजो लिया है । इनकी रचनाओं की ख़ासियत है कि जैसा जिसके लिए मन से महसूस किया वैसा ही कागज़ पर अंकित कर दिया । 
माँ के लिए लिखती हैं - 
सारे दिन खटपट करतीं
लस्त पस्त हो 
जब झुंझला जातीं
तब.....
तुम कहतीं - एक दिन 
ऐसे ही मर जाऊँगी ... 

आज स्वयं माँ बन वही सब याद कर रही हैं । उनकी कविताओं में हर रिश्ता अपनी झलक दिखला रहा है । उनकी स्मृतियों में सब सिमटा  हुआ है  । मुझे उनकी लिखी कविता "राखी" विशेष आकर्षित करती है  जिसमें उस भाई से निवेदन कर रही हैं जो इस संसार से विदा ले चुका है ।अपने दर्द को छिपा दुनियादारी निबाह कर अपने मन की बात कही है ,---

मना कर उत्सव पर्व 
लौट गए हैं सब 
अपने अपने घर .....
......
तारों की छांव में 
विशाल गगन तले
खड़ी हूँ बाहें फैलाये.....
......
अपनी कलाई बढ़ाओ तो 
भैया । 

इस पुस्तक के माध्यम से जान पाते हैं कि उनके लिए हर रिश्ता बहुत अज़ीज़ है ।फिर चाहे वो पिता को हो या पति का , बच्चों का हो या फिर दोस्ती का । लेकिन जब बात स्वयं की हो तो  अपना ही परिचय दूसरों से मांगती हैं । क्यों कि उनके अंदर तो एक धमाचौकड़ी करती बच्ची भी है तो ख्वाब बुनती युवती भी । 
उनकी सोच के ताने बाने हर समय और हर जगह चलते रहते हैं । पर्यटन के लिए एतिहासिक स्थलों पर वहाँ की इमारतों से भी संवाद स्थापित कर लेती हैं - 

सुनी हैं कान लगा कर 
उन सर्द, तप्त दीवारों पे
दफन हुईं वे
पथरीली धड़कने .... 

जहाँ उनका हृदय कोमल भावनाओं से भरा हुआ है वहाँ कहीं अत्याचार या किसी का शोषण उनको आक्रोशित भी कर देता है ।बाह्य जगत में होने वाले सामाजिक सरोकार से भी सहज ही जुड़ जातीं हैं । ऐसी ही कुछ कविताएँ  स्त्री के प्रति किये गए अत्याचार के विरुद्ध बिगुल फूँकने का काम कर रही हैं --

औरत ! सुनो, बात समझो 
इससे पहले कि बहती पीड़ाओं के कुंड में डूब जाओ 
इससे पहले कि सीने जी आग राख कर दे तुम्हें
पहला पत्थर तो उठाना होगा तुमको ही ...
**********
 जो अत्याचार सह चुप रहतीं हैं उन औरतों को व्यंग्यात्मक शैली में लताड़ा भी है -

चुप रहो 
खामोश रहो 
सभ्य औरतें , चुप रहती हैं । 
********** 
उन स्त्रियों पर करारा प्रहार है जो पुत्रों द्वारा किये गए कुकर्मों पर पर्दा डालती हैं --

क्यों नहीं दी पहली सज़ा तब 
जब दहलीज़ के भीतर 
दी थी औरत को पहली गाली ? 
.............उठो गांधारी 
अपनी आँखों से 
अब तो पट्टी खोलो ।
*********

इस काव्य -  संग्रह की एक बात विशेष रूप से प्रभावित करती है कि डॉ 0 उषा किरण कहीं भी निराशा से ग्रसित नहीं हैं । सकारात्मकता ही उनकी ऊर्जा है । "मुक्ति " कविता में सच ही मुक्ति का मार्ग खोज लिया है । हिसाब किताब का हर पन्ना फाड़ मुक्त हो जाना चाहती हैं ।  तो दूसरी ओर स्वयं के  हर बंधन को  हर तरह से काट दिया है और उन्मुक्त हो ज़िन्दगी जी रही हैं -
इन दिनों 
बहुत बिगड़ गयी हूँ मैं 
अलगनी से उतारे 
कपड़ों के बीच
खेलने लग जाती हूँ घंटों 
कैंडी क्रश ...
झांकते रहते हैं ठाकुर जी 
पूजा घर से 
स्नान - भोग के लिए ...

इतनी जीवंत कविता पढ़ पाठक भी ऊर्जावान हो उठता है और बरबस ही उसके  चेहरे पर एक स्मित की रेखा खिंच जाती है ।  कहीं खिली धूप से बात करती हैं  तो कहीं  एक टुकड़ा आसमाँ अपनी पिटारी में रख लेना चाहती हैं । यूँ तो बहुत सी कविताओं को यहाँ उध्दृत किया जा सकता है लेकिन पाठक स्वयं ही कविताओं को पढ़ अनुभव करें और पुस्तक का आनंद लें । 
ताना -  बाना अलग अलग अनुभव का पिटारा है । जिसमें कवयित्री ने शब्दों को ताना है और अपने भावों के बाने से कविताओं को बुना है । पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक सहजता से लेखिका के भावों के साथ बहता चला जाता है ।साथ ही हर कविता के साथ जो रेखांकन है उसमें खो जाता है । 
कुल मिला कर यह काव्य संग्रह संग्रहणीय है । डॉक्टर उषा किरण को मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ । उनके द्वारा लिखी और पुस्तकों का  इंतज़ार रहेगा । 



 



   
ताना - बाना 
डॉ0 उषा किरण 
ISBN : 978-93-87310-71-1
मूल्य - ₹ - 450/
शिवना प्रकाशन ।







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पुस्तक परिचय --  " देशी चश्मे से लंदन डायरी " लेखिका - शिखा वार्ष्णेय 

>> Saturday, September 21, 2019

 " देशी चश्में से लंदन डायरी  " ये पुस्तक  और इस पुस्तक की लेखिका शिखा वार्ष्णेय किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं । शिखा वार्ष्णेय ने ब्लॉग जगत में  भी  अच्छा खासा नाम कमाया है । जहाँ तक मैं जानती हूं इनको कविताओं से बेहद लगाव है और घुम्मकड़ी की शौकीन हैं तो जहां भी  जाती है वहाँ का विस्तृत व्योरा अपने लेखन में उतार देती हैं । इस पुस्तक से पहले इनकी दो पुस्तकें आ चुकी हैं एक काव्य संग्रह " मन के प्रतिबिम्ब " और दूसरी यात्रा वृतांत के रूप में " स्मृतियों में रूस " । 

    देशी चश्मे से लंदन डायरी किताब किस विधा के अंतर्गत आती है ये तो मैं  नहीं बता पाऊंगी लेकिन इसमें वो सारे लेख संकलित हैं जो लेखिका ने बीते समय में समाचार पत्र के एक कॉलम " लंदन डायरी " के लिए लिखे थे  ।  उस समय अलग अलग समय में लेखों को पढ़ना एक अलग अनुभव था आज उन लेखों का संकलित रूप पुस्तक के रूप में पढ़ना भिन्न  अनुभव दे रहा है ।

   यूँ तो लेखिका लंदन वासी हैं , लेकिन भारतीय मूल की होने के कारण इन लेखों में लंदन की बात होते हुए भी कहीं न कहीं नज़रिया भारतीय ही  रहा और इसी कारण इस किताब का शीर्षक  " देशी चश्मे से लंदन डायरी " सटीक  लगता है ।

      इस किताब में कुल 63 लेख शामिल हैं । इन लेखों के माध्यम से लेखिका ने लंदन की व्यवस्था , रहन - सहन , संस्कृति , मौसम आदि की झलक दिखलाई है ।  इन लेखों को पढ़ते हुए आश्चर्य होता है कि कैसे दैनिक जीवन में होने वाली छोटी छोटी बातों को  लेखिका  आत्मसात करते हुए महत्त्वपूर्ण जानकारी देती चलती है और साथ ही एक जागरूक और ज़िम्मेदार नागरिक की तरह मन में उठने वाले प्रश्न  या संशय भी  सामने रखती हैं । हर लेख एक अलग विषय लिए पाठक के सामने प्रस्तुत होता है । 

     प्रत्येक लेख में जो भी विषय चुना गया है उसे यूँ ही सहज सपाट नहीं लिख दिया गया है , वरन बहुत ही मर्यादित व्यंग्य भाषा का प्रयोग किया है । कई लेख ऐसे हैं जिनमे बिल्कुल अंत में ही पता चल पाया कि आखिर लेखिका की कलम चली किस विषय पर है । जैसे " हिंदी गीतों का दौर " । पुराने हिंदी फिल्मी गीतों के बोलों की तरफ जब वहां बच्चों का ध्यान जाता है और वो उन गानों को पसंद करते हैं तो लेखिका के मन में प्रश्न उठता है कि ऐसे सुमधुर गीत अब क्यों नहीं ।और जोड़ देती हैं इस बात से कि हिंदी के प्रोत्साहन के लिए जो लंदन में प्रयास होते हैं उसमें वहां के बच्चे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं । हिंदी का सम्मान करते हैं तो ऐसा सम्मान अपने देश भारत में क्यों नहीं ।

       " पुरानी साख और गौरव पूर्ण इतिहास " लिखते हुए राजे रजवाड़ों से आज के समय को जोड़ते हुए मंदी की मार सहता इंग्लैंड और उस पर वहाँ की रानी की हीरक जयंती  को मनाना कहीं  न कहीं लेखिका को कचोटता है । इस लेख में उनके मन की छटपटाहट साफ दिखाई देती है ।अपने मन में उठने वाले भावों को चुटीले व्यंग्य के साथ इंगित किया है -  "  माँएं  अपने नवजात बच्चों को लिए रानी के दुर्लभ दर्शनों के लिए घंटों सड़क पर खड़ी इंतज़ार कर रहीं थीं ......... बच्चों को कार से एक हिलता हाथ दिखाई दिया और कुछ बड़े बच्चों को चेहरे की एक झलक भी मिल गयी , बस हो गया जनता का रानी का गौरवपूर्ण दर्शन समारोह ।"  जनता पर अतिरिक्त कर का बोझ डाल इस तरह के दिखावे को लेखिका उचित नही मानती ।

       इन लेखों के माध्यम से वहां की अनेक व्यवस्थाओं के बारे में नई जानकारी मिलती है ।भले ही वहां की आर्थिक नीतियां हों , शैक्षिक नीतियां हो , वहां मनाए जाने वाले त्योहार हों या फिर सामाजिक कार्य हों । फोस्टर केयर की क्या व्यस्था होती है और इनसे क्या लाभ और हानि हो सकती है इसकी जानकारी " घर बन पाते हैं फोस्टर केयर "  में मिलती है । भारत में तो नानी- दादी  ही बच्चों की देखभाल कर लेती हैं लेकिन वहां नानी की उम्र ज्यादा हो गयी तो उनसे बच्चे को लेकर फोस्टर केयर में डाल दिया गया ।   

     " अनुभव का शहर " से जानकारी मिलती है कि बच्चों को आगे  आने  वाले जीवन में अस्पताल, बैंक , पोस्ट ऑफिस , पुलिस स्टेशन  आदि में किस तरह काम होता है इस सबका अनुभव कराने के लिए सिटी किडज़ानिया नाम का प्ले स्टोर खोला है । लेखिका की दृष्टि में यह एक बहुत सकारात्मक पहल  है जहां बच्चे ज़िन्दगी की सच्चाई से रु ब रु होते हैं ।

    " अंकों के खेल " में भारत में आज दसवीं और बारहवीं कक्षा में जो 100 % लाने की होड़ है और न आने पर अवसाद में आत्महत्या कर लेने की प्रवृति । लेकिन इंग्लैंड में बच्चे की जैसी क्षमता हो उसी तरह उसको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता है । बहुत अहम मुद्दे पर शिखा की लेखनी चली है ।

    सांस्कृतिक दृष्टि से देखा जाए तो कई लेखों में विभिन्न त्योहारों का ज़िक्र किया है । मई दिवस , थेम्स के तट से , लंदन में एशियाई त्योहार ,क्रिसमस तब और अब आदि में वहाँ किस तरह सारे त्योहारों का आनंद लिया जाता है बहुत सुंदरता से और विस्तृत वर्णन किया है ।

    यूँ तो हर लेख ही अच्छी जानकारी से युक्त है लेकिन कुछ लेख खास आकर्षित करते हैं जैसे " पुस्तकालय ऐसे भी ", स्कूल बस का महत्त्व " , समान पाठ्यक्रम , अपराधों को रोकने की पहल , हार्न  संस्कृति , चुनावी प्रक्रिया आदि । हार्न संस्कृति  में बिना वजह के शोर पर व्यंग्य है तो  इसके प्रारम्भिक इतिहास पर भी लेखिका की अपनी ही खोज है जो बहुत रोचक बन पड़ी है ।ऐसे ही चुनावी प्रक्रिया ऐसा लेख है जिसमें भारत और इंग्लैंड के चुनावों की तुलना की गई है ।इस तुलना का सच ही आनंद लेना है तो स्वयं ही इन लेखों को पढ़ना पड़ेगा ।
         यहां भी बाबा लेख से इंगित कर दिया कि भारत में ही बाबा लोगों का प्रचलन नहीं है वहाँ भी ऐसे बाबा पाए जाते हैं ।  

    शिखा के लेखों को पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है कि वो अप्रत्यक्ष रूप से उन लोगों से प्रश्न कर रही हैं जो विदेशों की प्रशंसा में  अपने देश भारत की निंदा करना शुरू कर देते हैं । यह विचार "लोमड़ी का आतंक " पढ़ते हुए आया । वहाँ पर लोमड़ी को एक हानिरहित जीव माना जाता है इसलिए उससे निपटने की कोई व्यवस्था नहीं है । लेकिन लेखिका की नज़रों में लोमड़ी का कितना आतंक है वो आप लेख पढ़ कर ही जान पाएंगे । लेख के अंत में एक मासूम से प्रश्न कि भारत में बेचारे गाय , बैलों का क्या कसूर जो सड़क पर यूँ ही आवारा घूमते हैं ।इसका तात्पर्य यह नही कि वो इसको सही बता रही हैं बस एक जिज्ञासा मात्र है उन लोगों से जो गाय ,बैलों के सड़क पर घूमने के कारण देश की निंदा करते हैं । 

  कुल मिला कर ये सारे लेख  केवल इंग्लैंड के लिए ही नहीं बल्कि भारत के लिए भी एक नया दृष्टिकोण देते हैं । यह पुस्तक इंग्लैंड के बारे में घर बैठे काफी जानकारी देती है ।  इन लेखों को पढ़ते हुए लगता है कि लेखिका का दिल भारत में  बसा  है या ये ज़्यादा सही होगा कहना कि भारत शिखा के दिल में बसता  है ।

  भाषा सहज और सरल है , चुटीली व्यंग्यात्मक भाषा से सारे ही लेख रोचक बन पड़े हैं । कहीं भी भाषा की दुरूहता नहीं दिखती । किसी भी लेख में  नीरसता महसूस नहीं होती ।पुस्तक का आकार प्रकार भी  आकर्षित करने वाला है । छपाई भी स्पष्ट है । इसके लिए प्रकाशक बधाई के पात्र हैं । पुस्तक का कवर पेज भी मनमोहक बन पड़ा है । कलाकार शीतल माहेश्वरी को हार्दिक बधाई । कहीं  कहीं वर्तनी की अशुद्धि  खटकती है । एक ही सुझाव है कि सम्पादन पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए था । 

      शिखा को इस पुस्तक के लिए  मैं  हार्दिक बधाई देती हूँ और आने वाले समय में और पुस्तकें प्रकाशित हों ऐसी कामना करती हूं ।

     पाठकों से निवेदन है कि पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें  यानि पहले ये पुस्तक पढ़ें फिर मेरे लिखे पर विश्वास करें । 

      

पुस्तक का नाम -- देशी चश्मे से लंदन डायरी 

लेखिका            -  शिखा वार्ष्णेय 

प्रकाशक           - समय साक्ष्य

सम्पर्क              - 01352658894
                         mailssdun@gmail.com 


ISBN  No  ----- 978-93-88165-18-1

मूल्य               -    ₹ 200/

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