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सितारों वाली चादर

>> Sunday, January 30, 2011



चीर कर 
खामोशी की चादर,
मन का सन्नाटा ,
आ खड़ा होता  है 
मेरे सामने ,
शब्द ,
जो बिखरे पड़े थे 
हो जाते हैं 
एकत्र 
और मच जाता है 
कोलाहल .
इस शोर में भी  
ख़ामोशी जैसे 
चादर में लिपटी हुई 
अपने वजूद को 
बनाये रखना चाहती है 
भले ही चादर 
क्यों न हो गयी हो 
क्षत - विक्षत
मेरे ख्यालों  का 
जुलाहा  
फिर से उसका 
एक धागा पकड़ 
बुन देता  है 
एक नयी चादर ,
ऐ मेरे जुलाहे 
चादर बुननी हैं तो 
बुन ,
पर बुनाई में 
कहीं तो 
खुशी के सितारे भी 
जड़ दे ...
देखने वालों के लिए 
ऐसे भ्रम का होना 
ज़रूरी है .




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उजला आसमां ( काव्य - संग्रह )

>> Tuesday, January 18, 2011


पिछले अप्रैल माह की एक शाम थी... यूँ ही बैठी अपने ब्लॉग की कविताएँ उलट पलट कर रही थी .कि पीछे से बेटे ने आकर कहा -  अरे इतना शौक है कविता लिखने का , अब तो एक संकलन आ ही जाना चाहिए .पता करो बाकी मैं संभाल लूँगा .... बस  ...जैसे किसी ने दिल के किसी कोने में पनपती कामना को शब्द दे दिए हों.. सपनो को जैसे सीढ़ी मिल गई थी .कुछ मित्रों से जिक्र किया तो उन्होंने भी विचार को हवा देना शुरू कर दिया .और आनन् फानन में पंकज सुबीर जी ने मेरे सपनो की  जीती जागती तस्वीर पेश कर दी.जिसके लिए मैं उनकी तहे दिल से आभारी हूँ .

मेरा पहला काव्य संकलन "उजला आसमाँ  " प्रकाशित हो कर आ गया है , जिसकी भूमिका लिखी है.....सीहोर के यशस्वी कवि तथा साहित्यकार रमेश हठीला जी  ने...  बंजारे गीत पुस्तक के माध्यम से राष्ट्रीय साहित्यिक परिदृश्य पर अपनी पहचान छोड़ने वाले श्री हठीला इकसठ वर्ष के थे जिनका लम्बी बीमारी के बाद.... हैदराबाद के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. " उजला आसमाँ  " के लिए ये आशीर्वचन उन्होंने अस्पताल में ही लिखे थे |

(भूमिका के कुछ अंश.)


संगीताजी की कविताओं के माध्यम से उनकी काव्य यात्रा को जानने का अवसर मिला . संगीता जी की ये कविताएँ उस नए युग की कविताएँ हैं जहाँ पर   ऐसे समय में जब  इंटरनेट  की कविताओं को बहुत महत्त्व नहीं दिया जा रहा है , उस समय में  संगीता जी की कविताएँ साहित्य के प्रतिमानों पर खरी उतरती हुयी मानो इस बात का मुखर विरोध कर रही हैं कि इंटरनेट पर गंभीर साहित्य नहीं लिखा जा रहा है | ये सारी ही कविताएँ किसी भी साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित होने वाली कविताओं से किसी भी रूप में कम नहीं हैं |

 इसके अलावा जो बात संगीता जी कि कविताओं में  प्रमुख रूप से दिखाई देती है वो है सरोकारों के प्रति  सजगता | वे साहित्य के सरोकारों को बिल्कुल भी भूली नहीं हैं , ये बात उनकी कविताओं में पता चलती है | जैसे भ्रूण हत्या पर संगीता जी कि कविता  की ये पंक्तियाँ मन को एकबारगी झकझोर जाती है 
इस बार भी परीक्षण में / कन्या भ्रूण ही आ गया है / इसीलिए बाबा ने मेरी मौत पर / हस्ताक्षर कर दिया है |

संगीता जी की एक और कविता बहुत गहरे अध्ययन की मांग करती है और यह कविता है   सच बताना गांधारी  | इस कविता में  कवयित्री अपने सर्वश्रेष्ठ को शब्दों में फूँकने में सफल रहीं हैं | पूरी कविता गांधारी को कटघरे में खड़ा करने का एक ऐसा प्रयास है जो कि पूरी तरह से सफल रहा है | कवयित्री ने गांधारी के माध्यम से जो प्रश्न उठाये हैं वे आज भी सामयिक हैं | गांधारी के चरित्र को आधार बना कर संगीता जी ने कई बहुत अच्छे प्रयोग कविता में किये हैं | और ये कविता मानों एक दस्तावेज की तरह आरोप पत्र दाखिल करती हुई गुज़रती है 
जब लडखडाते धृतराष्ट्र तो / तुम उनका संबल बनातीं / पर तुमने तो हो कर विमुख / अपने कर्तव्यों को त्याग दिया |
संगीता जी की कविताओं में नारी के स्वाभिमान के प्रति एक प्रकार की अतिरिक्त चेतना भरी हुयी साफ़ दिखाई देती है | ये कविताएँ नारी का अधिकार किसी से मांग नहीं रही हैं बल्कि नारी को ही जगा कर कह रही हैं 

और फिर ऐसे समाज की / रचना होगी / जिसमें नर और नारी की / अलग अलग नहीं / बल्कि सम्मलित संरचना / निखर कर आएगी |
संगीताजी की कविताओं में कुछ ऐसा विशिष्ट है जो उनकी कविताओं को आम कविताओं से अलग करता है | ये कविताएँ अपने समय का सही प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करती हैं | उनके काव्य- संग्रह  का शीर्षक  उजला आसमां  आकाश को पाने की कोशिश में समूची नारी जाति की ओर से एक कदम की तरह है | ये कदम सफल हो , मेरी शुभकामनायें |
- रमेश  हठीला

उनके ये  शब्द मेरे लिए जीवन भर की  अमूल्य पूंजी हैं .


..
निरन्तर लिखने की प्रक्रिया को बढ़ावा देने का श्रेय मेरे उन सब पाठकों को जाता है जिन्होंने अंतरजाल पर अपनी नियमित प्रतिक्रिया दे कर प्रोत्साहित किया ..मैं अपने अन्तर जाल के सभी साथियों और पाठकों के प्रति शुक्रगुज़ार हूँ. 

और अब यह संकलन आपके आशीर्वाद के लिए प्रस्तुत है .इस ब्लॉग जगत ने मेरे अन्दर के रचनाकार को नए आयाम दिए हैं उसे सुनहरे पंख दिए हैं जिसके परिणाम स्वरुप मेरे सपनो की एक माला आज मेरी हथेली पर है और उसे निहारते हुए मैं आप सभी का हृदय से  आभार व्यक्त करती हूँ .
बहुत बहुत शुक्रिया आप सभी के उत्साह वर्धन का ,शुभ वचनों का.... 


      



शिवना प्रकाशन
पी सी लैब, सम्राट काम्पलेक्स बेसमेंट
बस स्टैंड सीहोर --466001 (म प्र)




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उदासी की धुंध

>> Tuesday, January 11, 2011



छिटकी थी चाँदनी
मेरे आँगन में,
और चमका था
एक सितारा
मेरे आसमान पर,
चौंधिया दिया था
उसने अपनी चमक से,
आतुर था जैसे
आगोश में मेरे
आने को .
दिया था सहारा
मैंने अपनी हथेली से,
और रख लिया था
अपनी तर्जनी पर उसे,
लेकिन
चंचल था बहुत वो
गज़ब का,
छुड़ा कर अंगुली मेरी
गुम हो गया
ना जाने कहाँ ?
चमक भी छुपा ली है
उसने अपनी,
चाँद को भी अब
वो दिखता नहीं है,
मेरी आँखों में भी
भर गया है धुआँ सा,
अब वो किसी को भी
नज़र आता नहीं है ....
चाँदनी भी आँगन की
सिमट गयी है,
चादर एक उदासी की
बिछ गयी है,
कोशिश कर रही हूँ
पार देखने की
कोशिश है इस
चादर को झटकने की ...

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पीड़ा गत वर्ष की

>> Thursday, December 30, 2010


गत वर्ष जाते -जाते 
नव वर्ष के कान में
अपनी पीड़ा यूँ कह गया 
कि आज तुम्हारा 
स्वागत हो रहा है 
तो इतराओ मत 
मैं भी पिछले साल 
यूँ ही इतराया था 
और खुद को यूँ 
भरमाया था. 
पर भूल गया था
कि बीता वक़्त 
कभी लौट कर नही आता 
तुम भी आज खूब
जश्न मना लो
क्यों कि जो 
आज तुम्हारा है 
वो कल तुम्हारा नही होगा 
आज जहाँ मैं खड़ा हूँ 
कल तुम वहाँ होंगे 
और जहाँ आज तुम हो 
वहाँ कल कोई और होगा . 





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गुमनाम .........

>> Friday, December 24, 2010


बैठी थीं दो स्त्रियां 
कानन कुञ्ज में 
गुमसुम सी 
नि:मग्न हुई 
अचानक एक 
बोल उठी ,
मांडवी ! ज़रा कहो तो ,
तुम  आपबीती .
निर्विकार भाव से 
बोली मांडवी कि 
क्या कहूँ और 
कौन सुनेगा हमें 
कौन पहचानता है 
बोलो न श्रुतिकीर्ति? 
हाँ  सच है - 
हम सीता  की भगिनियाँ
भरत, शत्रुघ्न की भार्या 
कहाँ- कहीं बोलो कभी 
हमारा नाम आया ? 
सीता का त्याग और 
भातृ - प्रेम लक्ष्मण का 
बस यही सबको 
नज़र आया .
उर्मिला का 
विरह वर्णन भी 
साकेत में वर्णित है 
इसी लिए 
उसका भी नाम
थोड़ा चर्चित है ..
हमारे नामों को 
कौन पहचानता है ?

श्रुतिकीर्ति की बात सुन 
मांडवी अपनी सोच में 
गुम हो गयी 
जिया था जो जीवन 
बस उसकी यादों में 
खो गयी ..
जब आये थे भरत 
ननिहाल से तो 
उनका विलाप याद आया 
राम को वापस लाने का 
मिलाप याद आया .
लौटे थे भाई की 
पादुकाएं ले कर 
और त्याग दिया था 
राजमहल को 
एक कुटी बना कर .
सीता को वनवास में भी 
पति संग सुख मिला था 
मुझे तो राजमहल में रह 
वनवास मिला था ..
जो अन्याय हुआ मेरे साथ 
क्या वो 
जग जाहिर भी हुआ है?
मुझे तो लगता है कि
हमारा नाम 
अपनी पहचान भी 
खो गया है..
यह कहते सुनते  वो 
स्त्री छायाएं  न जाने 
कहाँ गुम हो गयीं 
और मेरे सामने एक 
प्रश्नचिंह  छोड़ गयीं ..
क्या सच ही 
इनका त्याग 
कोई त्याग नहीं था 
या फिर रामायण में 
इनका कोई महत्त्व नहीं था ???    

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