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हिंदी में बिंदी और चन्द्र बिंदु की महिमा.....

>> Monday, January 18, 2010





ब्लॉग जगत में मैंने कुछ समय पहले ही प्रवेश किया है...अभी तक बस अपने भावों को कविता के रूप में लिख कर ही मैंने ब्लॉग पर पोस्ट किया....लेकिन व्लोग्वानी पढने से जाना कि ये एक अच्छा साधन है जहाँ सामाजिक, राजनैतिक ,धार्मिक विषयों से जुड़ा जा सकता है वहीँ इसके द्वारा हम अपनी भाषा हिंदी का भी परिमार्जन कर सकते हैं ..यही सोच आज मैं ये विषय ले कर आई हूँ.... हाँलांकि इसके बारे में सभी ने स्कूल में पढ़ा होगा ,लेकिन पढने के बाद भी बहुत सी बातें दिमाग से निकल जाती हैं..आज उनको ही तरोताजा करने का प्रयास कर रही हूँ . आशा है कि आप इसे पसंद करेंगे.



हिंदी में स्वर को कई आधार पर विभाजित किया गया है .


आज हम चर्चा कर रहे हैं उच्चारण के आधार पर स्वर के भेद की.


उच्चारण के आधार पर स्वर को दो भागों में विभक्त किया जाता है .


१ अनुनासिका


२ निरनुनासिका


निरनुनासिका स्वर वे हैं जिनकी ध्वनि केवल मुख से निकलती है .


अनुनासिका स्वर में ध्वनि मुख के साथ साथ नासिका द्वार से भी निकलती है .अत:


अनुनासिका को प्रकट करने के लिए शिरो रेखा के ऊपर बिंदु या चन्द्र बिंदु का प्रयोग करते हैं . शब्द के ऊपर लगायी जाने वाली रेखा को शिरोरेखा कहते हैं .


बिंदु या चंद्रबिंदु को हिंदी में क्रमश: अनुस्वार और अनुनासिका कहा जाता है .


अनुस्वार और अनुनासिका में अंतर -----


१- अनुनासिका स्वर है जबकि अनुस्वार मूलत: व्यंजन .


२- अनुनासिका ( चंद्रबिंदु ) को परिवर्तित नहीं किया जा सकता जबकि अनुस्वार को वर्ण में बदला जा सकता है .


३- अनुनासिका का प्रयोग केवल उन शब्दों में ही किया जा सकता है जिनकी मात्राएँ शिरोरेखा से ऊपर न लगीं हों. जैसे अ , आ , उ ऊ ,


उदाहरण के रूप में --- हँस , चाँद , पूँछ


४ शिरोरेखा से ऊपर लगी मात्राओं वाले शब्दों में अनुनासिका के स्थान पर अनुस्वार अर्थात बिंदु का प्रयोग ही होता है. जैसे ---- गोंद , कोंपल , जबकि अनुस्वार हर तरह की मात्राओं वाले शब्दों पर लगाया जा सकता है.

 
आज का मुख्य चर्चा का विषय है कि जब अनुस्वार को व्यंजन मानते हैं तो इसे वर्ण में किन नियमों के अंतर्गत परिवर्तित किया जाता है....इसके लिए सबसे पहले हमें सभी व्यंजनों को वर्गानुसार जानना होगा.......


(क वर्ग ) क , ख ,ग ,घ ,ड.


(च वर्ग ) च , छ, ज ,झ , ञ


(ट वर्ग ) ट , ठ , ड ,ढ ण


(त वर्ग) त ,थ ,द , ध ,न


(प वर्ग ) प , फ ,ब , भ म

 
य , र .ल .व


श , ष , स ,ह










अब आप कोई भी अनुस्वार लगा शब्द देखें.....जैसे ..गंगा , कंबल , झंडा , मंजूषा , धंधा


यहाँ अनुस्वार को वर्ण में बदलने का नियम है कि जिस अक्षर के ऊपर अनुस्वार लगा है उससे अगला अक्षर देखें ....जैसे गंगा ...इसमें अनुस्वार से अगला अक्षर गा है...ये ग वर्ण क वर्ग में आता है इसलिए यहाँ अनुस्वार क वर्ग के पंचमाक्षर अर्थात ड़ में बदला  जायेगा.. ये उदहारण हिंदी टाइपिंग में नहीं आ रहा है...दूसरा शब्द लेते हैं. जैसे कंबल –

यहाँ अनुस्वार के बाद ब अक्षर है जो प वर्ग का है ..ब वर्ग का पंचमाक्षर म है इसलिए ये अनुस्वार म वर्ण में बदला जाता है


कंबल..... कम्बल


झंडा ..---- झण्डा


मंजूषा --- मञ्जूषा


धंधा --- धन्धा



ध्यान देने योग्य बात ----


१ अनुस्वार के बाद यदि य , र .ल .व
श ष , स ,ह वर्ण आते हैं यानि कि ये किसी वर्ग में सम्मिलित नहीं हैं तो अनुस्वार को बिंदु के रूप में ही प्रयोग किया जाता है .. तब उसे किसी वर्ण में नहीं बदला जाता...जैसे संयम ...यहाँ अनुस्वार के बाद य अक्षर है जो किसी वर्ग के अंतर्गत नहीं आता इसलिए यहाँ बिंदु ही लगेगा.


२- जब किसी वर्ग के पंचमाक्षर एक साथ हों तो वहाँ पंचमाक्षर का ही प्रयोग किया जाता है. वहाँ अनुस्वार नहीं लगता . जैसे सम्मान , चम्मच ,उन्नति , जन्म  आदि.


४- कभी कभी जल्दबाजी में या लापरवाही के चलते हम अनुस्वार जहाँ आना चाहिए नहीं लगाते ,तब शब्द के अर्थ बदल जाते हैं – उदहारण देखिये –


चिंता -------- चिता


गोंद ----------- गोद


गंदा-------------- गदा ....आदि




आशा है कि आज अनुस्वार ( बिंदु ) और अनुनासिका ( चंद्रबिंदु ) के विषय पर आपका पुन: परिचय हो गया होगा.


आपकी प्रतिक्रियाएं ही इसकी सफलता को इंगित करेंगी. धन्यवाद





























19 comments:

संगीता पुरी 1/18/2010 1:01 PM  

अच्‍छी पोस्‍ट .. हिन्‍दी टाइपिंग में चंद्र विंदु का अभी तक कोई स्‍कोप मुझे नजर नहीं आया .. इसलिए उसकी जगह विंदू को टाइप करना पडता है .. जो सही नहीं हैं .. रेमिंगटन कीबोर्ड पर चंद्र विंदू को कहां से टाइप किया जा सकता है ??

Mohammed Umar Kairanvi 1/18/2010 2:00 PM  

आपने बिन्‍दुओं पर अच्‍छी जानकारी दी इसकी आवश्‍यकता थी, ऐसे ही जानना चाहता हूँ हिन्‍दी में 'क्‍या और किया' का प्रयोग कैसे किया जाए,धन्‍यवाद

रश्मि प्रभा... 1/18/2010 2:01 PM  

gr8 shuruaat sangeeta ji........iski jankaari har ek ke liye zaruri hai

shikha varshney 1/18/2010 2:52 PM  

दी अब क्या कहूँ ..ऐसा लग रहा है कि स्कूल में हिंदी की क्लास में बैठी हूँ और एक अध्यापिका बहुत ही तन्मयता से कुछ व्याकरण समझा रही है....बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने जरुर बहुत उपयोगी सिद्ध होगी सबके लिए

दिगम्बर नासवा 1/18/2010 3:51 PM  

बहुत अच्छा किया आपने जो इतनी बारीकी से इस अंतर को समझाया .......... वर्षों बाद धीरे धीरे ये बातें भूलने लगती हैं ..... दुबारा पढ़ कर ताज़ा हो जाती हैं .......... शुक्रिया ........

rashmi ravija 1/18/2010 5:02 PM  

बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी...हम तो बस इस्तेमाल कर लेते हैं...आपने इसके प्रयोग की समुचित जानकारी दी है...अगर उसे ध्यान में रखें तो कभी गलती नहीं होगी.

Apanatva 1/18/2010 5:42 PM  

aaj fir school kee yad dilane ke liye dhanyvad........... :)
vyakran kee vajah se hee hindi me aage rah pate the........
yade tazee ho aaee hai......

अनामिका की सदाये...... 1/18/2010 6:43 PM  

संगीता जी शिखा जी की तरह मुझे भी आज मुझे दूसरी और तीसरी कक्षा की याद आ गयी. पर मुझे याद नहीं पड़ता की हमारी अध्यापिका जी ने इतनी बारीकि से हमें पढाया या समझाया होगा. बहुत कृतार्थ हुई में आज आपकी इस ज्ञानवर्धक जानकारी से. आगे भी इंतज़ार रहेगा. बहुत बहुत शुक्रिया.

'अदा' 1/18/2010 6:49 PM  

संगीता दी,
बहुत अच्छी जानकारी आपने दी है...
कुछ और भी नियम हैं :

इसी तरह एकारान्त क्रिया में अनुस्वार लगता है और उकारान्त में चन्द्रबिन्दु....जैसे :
लिखें, करें, चलें.......लिखूँ, करूँ, चलूँ

अकारान्त स्त्रीलिंग संज्ञा के बहुबचन में अनुस्वार लगता है ..जैसे
रातें

लेकिन स्त्रीलिंग संज्ञा के आकारान्त और इकारान्त / ईकारान्त के बहुवचन में चन्द्रबिन्दु लगता है ...जैसे
लताएँ, लड़कियाँ, नदियाँ , टोपियाँ

कुछ और शब्द हैं जिनमें सिर्फ चन्द्रबिन्दु का ही प्रयोग होता है अनुस्वार का नहीं ...जैसे..
हँसना, हँसी, फँसना, चाँद , साँस, साँप, बाँह, आँच, काँच, माँग, गाँव, आँव , पाँव साँच, आँख, ऊँगली , ऊँट, काँटा, चाँटा, राँगा

आशा है इससे विमर्श में कुछ योगदान हुआ होगा...
बहुत जानकारीपूर्ण आलेख...

sangeeta swarup 1/18/2010 7:07 PM  

अदा जी ,

आपका आभार .

आपने महतवपूर्ण जानकारी दी है. मैंने इस विषय को दुरूह होने से बचाने के लिए ही इकारान्त और आकारांत शब्दों का प्रयोग नहीं किया था...लेकिन आपने जो जानकारी दी है वो बहुत महत्तवपूर्ण है.
मैंने थोडा सरल भाषा में स्पष्ट किया था कि शिरोरेखा से ऊपर लगने वाली मात्राओं के साथ चंद्रबिंदु का प्रयोग नहीं किया जाता..

आपकी दी हुई जानकारी सराहनीय है.....

बहुत बहुत शुक्रिया

sangeeta swarup 1/18/2010 7:08 PM  

आप सभी को मेरा धन्यवाद जिन्होंने इस पोस्ट को पढ़ा और सराहा ..और अदा जी ने इसे और सारगर्भित बनाया .

शुक्रिया

महफूज़ अली 1/18/2010 7:50 PM  

बहुत महान पोस्ट.... इस सारगर्भित और जानकारीपूर्ण पोस्ट के लिए आभार.....

मनोज कुमार 1/18/2010 8:59 PM  

जो हम भूल रहें हैं उन्हें फिर से ताज़ा करवाने के लिए आपका शुक्रिया। एक अनूठा प्रयास। वंदनीय।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 1/18/2010 10:21 PM  

बहुत सुब्दर जानकारी.
हम भी हिंदी के छात्र हैं इस कारण से हिंदी के प्रति अधिक जागरूक रहते हैं.
आजकल कंप्यूटर के कारण हिंदी को बहुत संकट है. आपका प्रयास सराहनीय है, बधाई.

निर्मला कपिला 1/19/2010 12:28 PM  

संगीता जी बहुत ही अच्छी पोस्ट है हम तो कितने सालों से सब कुछ भूल गयी मगर आपने सब कुछ दोबारा याद दिला दिया। बहुत कुछ सीखने को मिला है। ये प्रयास जारी रखिये सब को इस की जरूरत है धन्यवाद्

सुलभ 'सतरंगी' 1/20/2010 12:06 PM  

अच्छी पोस्ट है. रिविजन भी हो गया.

अजित वडनेरकर 1/21/2010 12:32 PM  

बढ़िया। मीडिया ने सबसे ज्यादा भाषा को बिगाड़ा है। विभाजन के भाव के संदर्भ में बँटी को बंटी लिखना हास्यास्पद है। मगर अखबारों में चंद्रबिन्दु गायब हो गया सो हम जैसे पत्रकारों की भाषा से भी इसका लोप हो गया। फिर भी जहां आवश्यक हो, अर्धचंद्र और चंद्रबिन्दु का प्रयोग जरूर होना चाहिए।

मनोज कुमार 3/20/2011 3:33 PM  

हैप्पी होली।

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