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तपती रेत

>> Sunday, April 11, 2010




दर्द  को पढ़ना अच्छा लगता है 
दर्द  को सोचना  अच्छा लगता है 
दर्द को मैं लिख नहीं पाती 
दर्द को जीना  अच्छा लगता है 
सोचती है दुनिया कि -
जब तक अश्क ना बहें  
तो दर्द नहीं होता है 
तड़पने  वाला सदा  ही 
अपने दर्द को रोता है 
पर ये दुनिया 
ये नहीं जानती कि 
तपती रेत में 
नमी नहीं होती 
अंगारे बरसते हैं
पर छाँव  नहीं होती 
पानी की चाह  में 
भटक जाती हूँ दर - ब दर 
पर लगता है जैसे मेरी 
कभी प्यास नहीं बुझती 
नेह का सागर भी 
मेरे सामने लहराता है 
पर खारा  है वो भी 
मुझे उसकी चाह नहीं होती 
एक मीठा सा झरना 
कहीं तस्सुवर  में आता है 
कल कल कर जैसे 
तन मन को  भिगो जाता है 
भीगी - भीगी सी खड़ी मैं 
यूँ  ही सोच लिया करती हूँ 
दर्द ज़माने भर का 
यूँ ही  पी लिया करती हूँ 
दर्द  से ना निज़ात मिली है 
और ना कभी  मिलेगी 
हँस - हँस  कर दर्दे - ग़म
ये ज़िन्दगी  सहेगी .


17 comments:

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 4/11/2010 11:31 AM  

विषपान कर ही तो शिवजी नीलकंठ कहलाये,
सह लो दर्द तो ख़ुशी भी पल पल पग सहलाये

सुन्दर रचना है ! अभिनन्दन ! जीवन के तपती रेत पर भी एकदिन प्राणदायी बारिश आती है, और तब, क्षणिक ही सही पर फूल खिलते हैं !

अनामिका की सदाये...... 4/11/2010 11:49 AM  

आज जानी आपकी रचना की गहराई में जाकर कि तड़पने और रोने में कितना फर्क है...और तड़पने वाला कितना ज्यादा दर्द से गुज़रता है..जबकि रोने वाला तो बस तब तक ही कि जब तक वो रो नहीं पाता.इसलिए एक सुझाव है कि इतना दर्द में भटकने से तो बहतर है रो कर उस दर्द को राहत दी जाये.
बहुत अच्छी रचना. और आप ही इतनी अच्छी रचनाये लिख सकती है जो सीधा दिल में उतर जाती है. एक बार फिर बधाई.

Apanatva 4/11/2010 1:05 PM  

mujhe us pal ka besabre se intzar hai jab taptee ret dard ko bhap banna uda degee aur fir dua hai ki aapkee jholee me duniya bhar kee khushiya bhar jae...............

वन्दना 4/11/2010 5:09 PM  

दर्द का बहुत ही मार्मिक चित्रण्…………………दर्द तो होता ही महसूसने के लिये है…………………………अत्यंत गंभीर ।

रश्मि प्रभा... 4/11/2010 6:30 PM  

सोचते पढ़ते गुनते दर्द कलम में उतर आता है, पता भी नहीं चलता और दर्द का फलसफा दिल तक उतर आता है

Shekhar kumawat 4/11/2010 10:03 PM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति
bahut khub

http://kavyawani.blogspot.com/

shekhar kumawat

RBharol 4/11/2010 10:04 PM  

बहुत सुन्दर कविता.

स्वप्निल कुमार 'आतिश' 4/12/2010 1:31 AM  

Bahut sundar dard hai mumma...kavita ka ant bada achha hai..gulzar saab ne ek bar kaheen likha tha..'dard se pehchan milti hai' aap kahti hain 'dard ko jeena achha lagta hai' kisi ne kaha hai 'dard me bhi kuch baat hai'...hehe..main bada bhagta hun dard se..ab nahi bhagunga..

rashmi ravija 4/12/2010 11:55 AM  

दर्द को मैं लिख नहीं पाती
दर्द को जीना अच्छा लगता है
ओह पर आपने तो दर्द के हर रूप को बयान कर दिया...पर सच है दर्द को जीने से लिखना कहीं आसान है...बहुत ही गहरी अभिव्यक्ति..

Babli 4/12/2010 3:45 PM  

तपती रेत में
नमी नहीं होती
अंगारे बरसते हैं
पर छाँव नहीं होती
पानी की चाह में
भटक जाती हूँ दर - ब दर
पर लगता है जैसे मेरी
कभी प्यास नहीं बुझती ..
वाह वाह! बेहद ख़ूबसूरत पंक्तियाँ! बिल्कुल सही कहा है आपने! बहुत बढ़िया लगा! इस शानदार रचना के लिए बधाई!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 4/12/2010 4:34 PM  

चित्रगीत बहुत ही बढ़िया है!

दिगम्बर नासवा 4/12/2010 6:04 PM  

दर्द के कितने आयाम हैं ... आँखो से नीर बहाना ही दर्द नही .. गहरी और बहुत कुछ कहती रचना ...

रावेंद्रकुमार रवि 4/12/2010 10:55 PM  

बहुत बढ़िया कविता!

संजय भास्कर 4/13/2010 8:12 AM  

हर बार की तरह नए शब्दों और प्रयागों के माध्यम से एक और शानदार रचना - हार्दिक बधाई और धन्यवाद्.

अभिलाषा 4/13/2010 10:20 AM  

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती संगीता स्वरुप जी की कविता 'पीले फूल" ! आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

Manoj Bharti 4/14/2010 3:06 PM  

सुंदर कविता

दर्द को बहुत खूबसूरत शब्द दिए हैं आपने

Avinash Chandra 4/18/2010 1:52 PM  

kya kahun....?
shabd nahi mil rahe...
bas andar tak ris gaya har shabd

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