तपती रेत
>> Sunday, April 11, 2010
दर्द को पढ़ना अच्छा लगता है
दर्द को सोचना अच्छा लगता है
दर्द को मैं लिख नहीं पाती
दर्द को जीना अच्छा लगता है
सोचती है दुनिया कि -
जब तक अश्क ना बहें
तो दर्द नहीं होता है
तड़पने वाला सदा ही
अपने दर्द को रोता है
पर ये दुनिया
ये नहीं जानती कि
तपती रेत में
नमी नहीं होती
अंगारे बरसते हैं
पर छाँव नहीं होती
पानी की चाह में
भटक जाती हूँ दर - ब दर
पर लगता है जैसे मेरी
कभी प्यास नहीं बुझती
नेह का सागर भी
मेरे सामने लहराता है
पर खारा है वो भी
मुझे उसकी चाह नहीं होती
एक मीठा सा झरना
कहीं तस्सुवर में आता है
कल कल कर जैसे
तन मन को भिगो जाता है
भीगी - भीगी सी खड़ी मैं
यूँ ही सोच लिया करती हूँ
दर्द ज़माने भर का
यूँ ही पी लिया करती हूँ
दर्द से ना निज़ात मिली है
और ना कभी मिलेगी
हँस - हँस कर दर्दे - ग़म
ये ज़िन्दगी सहेगी .



























