copyright. Powered by Blogger.
Showing posts with label kavita sahitya( sarwadhikar surakshit ). Show all posts
Showing posts with label kavita sahitya( sarwadhikar surakshit ). Show all posts

तपती रेत

>> Sunday, April 11, 2010




दर्द  को पढ़ना अच्छा लगता है 
दर्द  को सोचना  अच्छा लगता है 
दर्द को मैं लिख नहीं पाती 
दर्द को जीना  अच्छा लगता है 
सोचती है दुनिया कि -
जब तक अश्क ना बहें  
तो दर्द नहीं होता है 
तड़पने  वाला सदा  ही 
अपने दर्द को रोता है 
पर ये दुनिया 
ये नहीं जानती कि 
तपती रेत में 
नमी नहीं होती 
अंगारे बरसते हैं
पर छाँव  नहीं होती 
पानी की चाह  में 
भटक जाती हूँ दर - ब दर 
पर लगता है जैसे मेरी 
कभी प्यास नहीं बुझती 
नेह का सागर भी 
मेरे सामने लहराता है 
पर खारा  है वो भी 
मुझे उसकी चाह नहीं होती 
एक मीठा सा झरना 
कहीं तस्सुवर  में आता है 
कल कल कर जैसे 
तन मन को  भिगो जाता है 
भीगी - भीगी सी खड़ी मैं 
यूँ  ही सोच लिया करती हूँ 
दर्द ज़माने भर का 
यूँ ही  पी लिया करती हूँ 
दर्द  से ना निज़ात मिली है 
और ना कभी  मिलेगी 
हँस - हँस  कर दर्दे - ग़म
ये ज़िन्दगी  सहेगी .


Read more...

एक मुलाक़ात ...शहीद की आत्मा से

>> Tuesday, March 23, 2010



कल रात



एक विचित्र बात हो गयी


स्वप्न में भगत सिंह की


आत्मा से


मेरी मुलाकात हो गयी




ज़र- ज़र थी बहुत


पीड़ित थी वेदना से


लहू लुहान थी वो


अपनों की प्रताड़ना से


विस्मित सी बस मैं


देखे जा रही थी


उस आत्मा ने मुझ पर


जैसे दृष्टि जमा दी थी


बोली हौले से -


ऐ मेरे भारतवासी


चाहती हूँ बांटना मैं


अपनी थोड़ी सी उदासी


भूलो तुम शहीदों को तो


कोई बात नहीं है


रखो वतन की याद


बस हमारे लिए


यही बहुत है .


आज़ादी के लिए


जांबाजों ने


ना जाने कितने


आन्दोलन चलाये


पर आज ना जाने देश में


कहाँ से इतने "वाद "


उभर आए


कहीं आतंकवाद है तो


कहीं नक्सलवाद


क्या इन सबके साथ ही


करते हैं आज़ादी को याद ?


गर हो शत्रु बाहर का तो


उससे लड़ा जा सकता है


जब भेदी हो घर का


तो लंका भी ढहा सकता है


ये सुन मेरे मन पर


छा गयी स्तब्धता की स्थिति


पूछा मैंने कि


क्या कर सकता है


कोई अदना सा कवि ?




बोली वो सहज कि -

तेरे पास तो है


वह हथियार जो


तख़्त राजाओं के


पलट सकता है


तेरी कलम में


वो  ताकत है


जो सरकार


बदल सकता है


बस अपने गीतों में


ज़रा नया जोश लाओ


इसकी धार में


थोड़ी रवानी मिलाओ


ऐसे गीत रचो


जो हर जुबान गाये


एक एक गीत तुम्हारा


नया इतिहास रच जाये...




हतप्रभ सी हो मैं


सब सुन रही थी


मेरी आत्मा जैसे


मुझ को ही


कचोट रही थी


क्या सच में ही


हमने अपना कोई


धर्म निभाया है ?


या बस स्वयं से


स्वयं को भरमाया है?


http://charchamanch.blogspot.com/search?updated-max=2010-03-24T22%3A00%3A00%2B05%3A30&max-results=1



Read more...

बाज़ी दर बाज़ी

>> Thursday, March 18, 2010



जिंदगी की बिसात पर



रिश्तों की बाज़ी


लगी होती है


हर रिश्ता


अपनी अहमियत लिए


होता है खड़ा


आमने सामने .


कोई प्यादा तो


कोई वजीर


सब चलते रहते हैं


अपनी चालें


आड़ी - तिरछी


एक दूसरे को


शह और मात


देने की होड़ में


और जब


मिल जाती है


किसी रिश्ते को मात


तो मन


भर जाता है


अवसाद से


और रह जाती है


मात्र एक घुटन .


फिर


घुटन से


उबरने के लिए


बिछ जाती है


नयी बाज़ी


एक नया रिश्ता लिए


ज़िन्दगी की बिसात पर .



Read more...

भ्रामक सच..

>> Tuesday, March 16, 2010


सच है कि

सर्द रातों में
गुदगुदे बिस्तर पर
लिहाफ़ की गर्मी में
बहुत सुकून भरी
                                      नींद आती है .



और सच ये भी है कि
सारी रात अलाव के पास
मात्र एक चीथड़े में
हाथ तापते हुए
वो सर्द रात
किसी के द्वारा
गुज़ारी जाती है.




सच है कि -
अनगिनत पकवानों को
सामने देख
क्षुग्धा है कि
मर सी जाती है




और सच ये भी है कि
कहीं - कहीं , कभी - कभी
कचरे से बीन कर
कुछ खाते हुए
भूख मिटाई  जाती है .


ये सब सोचते हुए
स्वयं के लिए
एक वितृष्णा सी जागती है
कि-




हमारी निगाह में
ऐसे सारे सच
मात्र एक घटना क्रम हैं
और खुद की ज़रा सी
पीड़ा का
हमे कितना बड़ा भ्रम है .
कोई भी उसमें खुश नही रहता
जितना उसे मिला है
हर शख्स को भगवान से
क्यों शिकवा - गिला है .


काश-
हम हर सच का सही
आंकलन कर पाते
तो अपनी भ्रामक पीड़ा से
खुद को बचा पाते..

Read more...

खामोशियाँ

>> Thursday, March 11, 2010

खामोशियाँ



जब बोलती हैं


ज़ेहन का

वर्क  -  दर- वर्क


खोलती हैं


होठ हिलते नहीं हैं


मगर


मन ही मन


ना जाने कितने


राज़ खोलती हैं






आँखों में


उतर आते हैं


कितने ही सैलाब


जब खामोश लब


बोलते हैं


लफ्ज़ जुबां से


निकलते नहीं


फिर भी


तास्सुरात


चेहरे के


बोलते हैं .






आज मेरे तुम्हारे

दरमियान

पसरी है

सन्नाटे की चादर


जिस पर


मेरी खामोशी ने


लिख दी है


एक इबारत .






इबारत की खामोशी को


खामोश ही रहने दो


मुझे आज खुद से


खुद को कुछ कहने दो







Read more...

महिला दिवस पर एक दृष्टिकोण ये भी....

>> Monday, March 8, 2010

ये  रचना मेरी छोटी बहन  मुदिता  ने आज महिला दिवस पर मुझे भेजी थी ...इसे मैं आप सभी के साथ बाँटना चाहती  हूँ....
आप इस रचना को इस ब्लॉग पर भी पढ़ सकते हैं --

http://roohshine-lovenlight.blogspot.com/2010/03/blog-post_07.html

नारी दिवस के परिपेक्ष्य में अक्सर अभिव्यक्ति की अतिवादी विचारधारा देखने को मिलती है ..नारी को हमेशा एक सहज मानुष ना समझ कर एक रहस्यमय पहेली माना गया है..हमारे साहित्यकारों ने भी नारी की प्रशंसा या अवमानना में अतिवादी दृष्टिकोण अपनाया है..
कुछ उदहारण..
"त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम
देवो न जानाति कुतो मनुष्य: "
"न नारी स्वातन्त्र्यमर्हती !"
और एक अति ..
"यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता !!!"

या तो उसे इतना तुच्छ मानना कि उसकी तुलना तुलसीदास जी ने ढोर गंवार शूद्र और पशु से करी या पूजनीय ,देवी स्वरूप, ..उसको एक सहज इंसान क्यूँ समझा नहीं जाता .. पौराणिक संस्कृति में राधा -कृष्ण जैसा सखा भाव देखने को मिलता है..उन दोनों में कोई श्रेष्ठ या हीन नहीं था ..कृष्ण श्रेष्ठतम पुरुष होते हुए भी कभी ये प्रतिपादित करते नज़र नहीं आये कि वो नारी जाति से श्रेष्ठ हैं. उनके लिए हर गोपी उनकी सखी थी, उनके सामने नारी अपने भावों की सहज अभिव्यक्ति करने में सक्षम थी .परन्तु अपनी स्वार्थ साधना के लिए पुरुष उनका उदहारण देते हुए कभी नजर नहीं आते.. मनुस्मृति से उद्धृत या तुसलीदास जी के कहे हुए दोहों से नारी को ये एहसास दिलाते हैं कि जब इतने बड़े ज्ञानी नारी के लिए ऐसा कह गए हैं तो सत्य ही होगा ..


आज ऐसे ही एक दोहे को आधार बना कर एक रचना प्रस्तुत कर रही हूँ ..आशा है प्रयास को पसंद किया जाएगा
****************************************

रामचरित मानस में रावण मंदोदरी से कहता है-

नारी सुभाऊ सत्य सब कहहिं
अवगुन आठ सदा उर रहहिं
संशय,अनृत ,चपलता,माया
भय,अविवेक,अशौच,अदाया !


***********************************
पुरुष प्रधान समाज ने जिन मान्यताओं को नारी के लिए प्रतिपादित किया उनके लिए ये भावाभिव्यक्ति..

किया भ्रमित
नारी को तूने
अवगुण दिए
गिनाय
आठ भाव
ये सहज रूप में
हर मानुस ही पाय ..


१) संशय-
दमित वासना
करने पूरी
राह रहे निर्द्वंद
कह संशय
अवगुण है तेरा
दिया नारी को
द्वन्द ..


२)अनृत (झूठ)-
नहीं दिया
विश्वास उसे जो
कह पाए
वह सत्य
डरी दबी सकुची
नारी का
अवगुण बना
असत्य ...


३) चपलता-
रहे सहज चंचला
यदि तरुणी
उच्छंऋखल  वह
कहलाती
सपना बन
रह गयी चपलता
जो बचपन की
थी थाती ..


४) माया-
कहा सभी ने
माया उसको
बन गयी
एक पहेली
कभी ना समझा
कभी ना जाना
निज की
एक सहेली......


५)भय-
भय तुझको
अस्तित्व का
अपने
कर जाता है
छोटा
बता बता
भय अवगुण
उसमें
निर्भय क्या
तू होता.......??


६) अविवेक-
कर उपेक्षा
विवेक की उसके
दिया हीन एहसास
काट सके ना
बात को तेरी
रहा यही प्रयास


७) अशौच -
सहज खिले
नारीत्व को तू ने
दिया
अशौच का नाम
जगजाहिर कर
निजता उसकी
उचित किया
क्या काम .....??


८) अदया -
अदया
उसका अवगुण
कह कर
खुद को
झुठला बैठा
दया भाव
नारी से ज्यादा
कौन हृदय में
पैठा.....??




इन भावों का
कर अनुरोपण
बाँधा नारी को ऐसे
छोड़ के इनको
जीना उसको
पाप लगे है जैसे.....


सिंचित कर
स्नेह सहज से
जीवन की
फुलवारी को
तुच्छ-श्रेष्ठ का
भाव नहीं
बस
समझ संगिनी
नारी को ...

 
मुदिता गर्ग
http://roohshine-lovenlight.blogspot.com/2010/03/blog-post_07.html



http://charchamanch.blogspot.com/2010/03/blog-post_5252.html

Read more...

अवचेतन मन की चेतना

>> Friday, March 5, 2010


मन के
अवचेतन में
कुछ चेतन सा
चलता रहता है
एक आग लगी हो

सीने में
और मन
धधकता रहता है
सोचों से परे कोई
चिंगारी
भड़कती रहती है
खुद के
वजूद की तलाश में
एक आग
सुलगती रहती है
टूट टूट कर
बिखर गयी
और हर कण
कण में समा गया

फिर भी
कोई मुझ पर
बेगैरत की तोहमत
लगा गया
अब मैं
तपती रेत बनी
खुद को
झुलसाती रहती हूँ
शबनम की बूंदों को भी
धुआँ बनाती रहती हूँ
कुछ था
जो मन में
दरक गया
पल - पल का
एहसास गया
अब खाली हाथ
खड़ी हूँ मैं
वक़्त हाथ से
निकल गया |

Read more...

आखिर बुरा क्या है ?

>> Tuesday, March 2, 2010




मन के दरख्त पर



जमा ली हैं


ख्वाहिशों ने अपनी जड़ें


और जा रही हैं


फलती फूलती


अमर बेल की तरह


उत्तरोत्तर .




रसविहीन दरख्त


मौन है


बना हुआ पंगु सा


जब होगा एहसास


हकीकत का


तो हो जाएँगी


सारी बेलें


धूल धूसरित .




मन ने सोचा कि


ख्वाहिशों की ख्वाहिश


पलने दो


अंत में तो


मिटटी ही नसीब है


कुछ पल खुश होने में


आखिर बुरा क्या है ?


 
 
 

Read more...

टुकड़े टुकड़े ख्वाब

>> Monday, February 22, 2010



गर्भ -गृह से



आँखों की खिड़की खोल


पलकों की ओट से


मेरे ख़्वाबों ने


धीरे से बाहर झाँका


कोहरे की गहन चादर से


सब कुछ ढका हुआ था .






धीरे धीरे


हकीक़त के ताप ने


कम कर दी


गहनता कोहरे की


और


ख़्वाबों ने डर के मारे


बंद कर लीं अपनी आँखे .






क्यों कि -


उन्हें दिखाई दे गयीं थी


एक नवजात कन्या शिशु


जो कचरे के डिब्बे में


निर्वस्त्र सर्दी से ठिठुर


दम तोड़ चुकी थी
 
 

Read more...

चरैवेति - चरैवेति ( निरंतर चलना )

>> Tuesday, February 16, 2010


मैं जलधि

मरुस्थल का
खारेपन के साथ
मुझमे रेत भी
शामिल है
उड़ चलूँ मैं
आँधियों के साथ
ये फन मुझे
हासिल है .


मुट्ठी में बंद कर
बांधने की करो कोशिश
तो रेत की तरह ही
मुट्ठी से फिसल जाती हूँ
अतृप्त सी हैं इच्छाएं
और है गरल कंठ में
तृप्त होने के भाव का
स्वांग सा रचाती हूँ .


मिल कर मुझसे सब
कुछ भ्रमित से हो जाते हैं
भूल जाते हैं सत्य को कि
गुल के साथ खार भी आते हैं...
उम्मीदों के चमन में लोग
ख्वाहिशों के फूल खिलाते हैं
नाउम्मीदी  के कांटे फिर
विषैले दंश ही चुभाते हैं .


न है मेरी कोई मंजिल
और न ही कोई राह है
मैं बस निरंतर
चलती चली जाती हूँ
लक्ष्यविहीन से पथ पर
बस अग्रसित हो जाती हूँ....

Read more...

फिर कैसे मल्लहार सुनाऊं

>> Friday, February 12, 2010


अंसुअन की स्याही सूख गयी मैं कलम कहाँ डुबाऊं



अपनी मन की व्यथा कथा मैं किन शब्दों में कह जाऊं




प्रतिपल घटता जीवन जैसे कैसे मैं ठांव लगाऊं


चलता जीवन बहता दरिया , कैसे मैं बाँध बनाऊं




सोच भंवर के चलते जाते कैसे मैं पार हो पाऊं


तेज़ है धारा कश्ती उलटी ,कैसे पतवार चलाऊं




अनवरत बढती इच्छाओं पर कैसे प्रतिबन्ध लगाऊं


लोगों की मरती अभिलाषाओं पर कैसे मैं मुस्काऊं .




आंधी से एक दीप हैं लडता , कैसे मैं इसे बचाऊं


रिश्तो के झूठे बंधन हैं , कैसे जीवन चक्र चलाऊं




कंठ गरल से रुंधा हुआ है, कैसे अब मैं गाऊं


सूखा छाया है मन पर , फिर कैसे मल्लहार सुनाऊं



http://chitthacharcha.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%9C%20%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0?updated-max=2010-02-20T06%3A00%3A00%2B05%3A30&max-results=20







Read more...

अकुलाहट

>> Wednesday, February 10, 2010


आकुल से मन की

व्याकुल सी भाषा है
छंद लिखूं कोई तो
वो भी तो आधा है




प्रखर है सोच, पर
वेग ज़रा ज्यादा है
बह जाता आवेश
लिखने में बाधा है




अवरुद्ध हुए भाव
बस स्वार्थ ही साधा है
संतुष्टि मिले कहाँ
मन पर बोझ ही लादा है .




आकुल से मन की
व्याकुल सी भाषा है
बह जाता आवेग
लिखने में बाधा है ....

Read more...

सागर किनारे

>> Tuesday, February 9, 2010




सागर किनारे मैं



जब भी आई


हर लहर में दिखी


तेरी ही छवि समायी


लहरों के स्पर्श से


तेरी ही याद आई


हर जगह देता है


तेरा ही अक्स दिखाई


सीली सी रेत पर


तेरे नक़्शे- पा दिखते हैं


उन पर चल मेरे


कदम तुझ तक पहुंचते हैं


ख़्वाबों की दुनिया


बड़ी हंसीं लगती है


ख्याल जैसे मेरे


तुझ तक पहुंचते हैं


अचानक से उठती है


एक उद्वेग भरी लहर


मिटा देती है सारे निशां


और रह जाती हूँ मैं सिहर


सूनी सूनी सी आँखों से


कुछ आता नहीं नज़र


एक कतरा अश्क का


बन जाता है ज़हर


ना तुझको मेरी खबर


ना मुझको तेरी खबर


ये ख्वाहिशों का सैलाब


बन जाता है कहर

Read more...

नर - नारी संवाद ..

>> Saturday, February 6, 2010


नर ---


हे प्रिय ,


मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ


तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूँ


तुम कहो तो चाँद तारों से


तुम्हारी झोली भी भर सकता हूँ ।


बस तुम मेरी ये प्यास बुझाओ


मेरे दग्ध होठों को


शीतल कर जाओ


मैं तुममे समां जाऊं


तुम मुझमें सिमट जाओ।




नारी -----------


दावा करते हो कि


तुम मुझे प्यार करते हो


लेकिन क्या कभी


मेरा मन  भी  पढते हो ?


मेरी ज़रूरत को आज तक


समझ नही पाये


और चाँद तारों की बात करते हो ।


तुमने सदैव अपना स्वार्थ साधा है


जब भी मुझे अपनी बाँहों में बांधा है


तुम कहते हो कि मुझमें समाते हो


पर क्या कभी मेरा मन भी छू पाते हो ?


तुमने  हमेशा बस अपनी खुशी चाही


तुम्हें मालूम नही कि


मुझ पर क्या गुज़री है


गर चाहते हो सच ही मुझे पाना


तो तन से पहले मन का पाना ज़रूरी है ।


जिस दिन तुम मेरा मन पा जाओगे


सारे एहसास अपने आप सिमट आयेंगे


न तुमको कुछ कहने की ज़रूरत होगी


और न ही मुझे कोई शब्द मिल पायेंगे।


फिर न तुम्हारे सुर में प्रार्थना का पुट होगा


और न ही मेरा मन यूँ आहत होगा


समर्पण ही मेरा पर्याय होगा


मौन ही मेरा स्वीकार्य होगा ....

Read more...

विडम्बना

>> Wednesday, February 3, 2010




अक्सर -


सुबह सड़क पर


नन्हें बच्चों को देखती हूँ ,






कुछ सजे - संवरे


बस्ता उठाये


बस के इंतज़ार में


माँ का हाथ थामे हुए


स्कूल जाने के लिए


उत्साहित से , प्यारे से ,


लगता है


देश का भविष्य बनने को


आतुर हैं ।

और कुछ नन्हे बच्चे


नंगे पैर , नंगे बदन


आंखों में मायूसी लिए


चहरे पर उदासी लिए


एक बड़ा सा झोला थामें


कचरे के डिब्बे के पास


चक्कर काटते हुए


कुछ बीनते हुए


कुछ चुनते हुए


एक दिन की


रोटी के जुगाड़ के लिए


अपना भविष्य


दांव पर लगाते हुए


हर पल व्याकुल हैं ,


आकुल हैं.

Read more...

ज़िंदगी, मात्र कल्पना नही होती है.

>> Saturday, January 30, 2010


ज़िंदगी, मात्र कल्पना नही होती है.



मानती हूँ कि-


कल्पना की ज़िंदगी से बेहतर


कोई ज़िंदगी नही होती है,


जहाँ हर पल


अपने ख्वाबों के अनुसार


ढाल लिया जाता है


हर सवाल,


जी लेते हैं हर पल


अपने ही ढंग से


मन में नही रहता


फिर कोई मलाल


पर फिर भी


ज़िंदगी,


मात्र कल्पना नही होती है.






ना जाने कितने तूफान


मन में पले होते हैं


ना जाने कितने सैलाब


दिल में भरे होते हैं


सबको बांधना भी


कुछ आसान नही होता है


इनको रोकना भी कभी - कभी


नामुमकिन सा होता है.


पर धैर्य वो बाँध है कि


आई बाढ़ भी सिमट जाती है


ज़िंदगी की कल्पना में


फिर हक़ीकत ही नज़र आती है


गमों का सैलाब भी


थमता सा नज़र आता है


ज्वार - भाटे का समुद्र से तो


हर पल का नाता है,






धीरज ही है जो इंसान को


जीना सिखाता है


कल्पना में ही सही


पर विस्तृत आकाश में


विचरण करता है


पर जब यथार्थ के कठोर धरातल से


कल्पना टकराती है


लगता है कि जैसे


ज़िंदगी, चूर - चूर हो जाती है


क्यों कि--ज़िंदगी


ज़िंदगी,


मात्र कल्पना नही होती है.

Read more...

हमारी वाणी

www.hamarivani.com

About This Blog

आगंतुक


ip address

  © Blogger template Snowy Winter by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP