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साँप - सीढी

>> Friday, September 10, 2010

 



बचपन में खेल कर 

सांप - सीढ़ी का खेल 

सीख लिया था 

ज़िंदगी का फलसफा .


खाने - दर - खाने 

चलते हुए मानो 

बस ज़िंदगी 

चलती सी ही है .


और जब आ जाती है 

सीढ़ी कोई  तो 

समझो ज़िंदगी में 

कोई खुशी हासिल हुई 


इन खुशियों के बीच 

जब डंस लेता था सांप 

तो प्रतीक था 

ज़िंदगी में कष्ट आने का .


निन्यानवे पर होता था 

सबसे बड़ा सांप 

जो इंगित करता था 

कि मंजिल पाने से पहले 

करनी होती है 

सबसे बड़ी बाधा पार .


गर नहीं कर पाए 

निन्यानवे को पार

तो वो पहुंचा देता था 

दस के आंकड़े पर .


फिर से 

सारी बाधाओं को पार कर 

खुशियों की सीढ़ी लांघते हुए 

कवायद करनी होती थी 

मंजिल पाने की .


और 

बार- बार की कोशिशें

करा  ही देती थीं

वो सौ का आंकड़ा पार .. 

इस तरह 

खेल - खेल में ही 

सीख लिया मैंने 

ज़िंदगी का व्यापार 



77 comments:

AlbelaKhatri.com 9/10/2010 6:17 PM  

gahri kavita.........

anoothi kavita !

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 9/10/2010 6:17 PM  

संगीता दी,
सचमुच जिन्न्गी साँप सीढी का खेल है... आदमी बस नम्बर के सहारे ऊपर चढता चला जाता है, सीढी के मदद से... ध्यान से देखिए इस चढाई का खेल... ऊपर वाले पायदान को हाथ लगाना पड़ता है अऊर नीचे को पैर से दबाना होता है..यही है आज के नम्बर के खेल का मंत्र..
लोग भूल जाता है कि 99 का साँप बहुत ख़तरनाक है..मगर 99 पहुँचने पर, तब तक छोटे साँप से कटवाने के बाद कम्बख़्त आदमिये जहरीला हो जाता है!!
सलिल

Sadhana Vaid 9/10/2010 6:35 PM  

बहुत बढ़िया संगीताजी ! आपके अंदर किसी भी चीज़ में सार्थकता ढूंढ लेने की असाधारण क्षमता है फिर चाहे वह सांप सीढ़ी का खेल हो या सुडोकू का ! आपकी हर रचना चमत्कृत कर देती है ! इसे पढ़ कर भी यही सोच रही हूँ कि अब आपका किस कोने से किस नए मोती को ढूँढ़ निकालेंगी ! सुन्दर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई एवँ आभार !

पी.सी.गोदियाल 9/10/2010 6:49 PM  
This comment has been removed by the author.
पी.सी.गोदियाल 9/10/2010 6:52 PM  

अगर वह सांप सीडी का खेल इंसान की उम्र पर भी लागू होता तो में तो ४5 से फिसल कर २१ पर आ जाता :) ? खैर, सुन्दर अहसासों भरी रचना के लिए आभार !

मनोज कुमार 9/10/2010 7:33 PM  

सुडोकु के बाद सांप सीढी!
ये खेल भी ना....
पर हमारी तरह कई हैं जो ज़िन्दगी भर सांप और सीढी ही में उलझे रहते हैं। ९९ वाला सांप ज़रूर डंसता है। देखते हैं कब पासा सही पड़े और ९९ के फेर में पड़े बगैर फेरा पार हो जाए।
इस बार नहीं कहूंगा .. अच्छा चित्र! हां। ये बड़ा डरावना है। खास करके वो ९९ पर जो जीभ लपलपा रहा है।

Babli 9/10/2010 7:44 PM  

सांप सीढ़ी का ये खेल बचपन में हमेशा खेला करती थी और बहुत ही मज़ेदार लगता था! आपकी कविता पढ़कर मैं बचपन के दिनों में चली गयी! ज़िन्दगी तो सांप सीढ़ी के खेल जैसा ही है जहाँ उतार चढाव लगा रहता है! बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना प्रस्तुत किया है आपने!

विवेक सिंह 9/10/2010 7:56 PM  

बहुत बढ़िया । हमने तो कभी साँप सीढ़ी का खेल खेला ही नहीं ।

Avinash Chandra 9/10/2010 7:57 PM  

बहुत शुक्रिया याद रखने का...इसे लिखने का और मुझे सबसे पहले बताने का.
ऐसा नहीं कहूँगा.
आपने इतना याद रखा ये आशीष है, तो बस प्रणाम कह वही लेता चलूँ...:)

बाकि तो मेरा कहना न कहना यूँ ही है, कविता बहुत अच्छी है :)
एक बार आज भी खेला..कुछ सीखा ही :)

रंजना 9/10/2010 8:03 PM  

वाह...क्या बात कह दी है आपने...आपकी चिंतन धरा और अभिव्यक्ति क्षमता की कायल तो मैं पहले से ही हूँ...इस रचना ने भी मन मोह लिया...
सचमुच जीवन को इस तरह यदि हम देखने लगें तो फिर कभी न तो दुःख में हताशा होगी और न सफलता में अभिमान.....

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 9/10/2010 8:25 PM  

निन्यानवे पर होता था...सबसे बड़ा सांप
जो इंगित करता था...कि मंजिल पाने से पहले
करनी होती है...सबसे बड़ी बाधा पार.....
.....खेल - खेल में ही
सीख लिया मैंने..ज़िंदगी का व्यापार...
बहुत उम्दा रचना...
सच है, जीवन का यही उतार-चढ़ाव
जीने की कला सिखा देता है... .

अनामिका की सदायें ...... 9/10/2010 8:45 PM  

वाह क्या बात है....सांप सीढ़ी बहुत खेली और जब भी सांपों ने डसा तो ऐसी कुंठा भी हुई जैसे कोई जिंदगी की बाज़ी बारने वाले हों...लेकिन इतनी गंभीरता से कभी ना लिया...न सोचा...लेकिन इतनी गहनता से सोचना भी तो बुद्धिजीवियों का काम हैं जिसमे हमारा नंबर नहीं आता..हा.हा.हा.

बहुत सुंदर रचना.

shikha varshney 9/10/2010 8:54 PM  

अरे दी ! ये निन्यानवे के सांप वाली बात तो बड़ी ही प्रेक्टिकल कही है ..वाकई मंजिल से पहले कद संघर्ष ...वहां चुके तो फिर से स्कुएर वन पर...
क्या कहूँ आप तो माहिर हो गई हो खेल खेल में जिंदगी सिखाने की :)

ललित शर्मा 9/10/2010 9:09 PM  

खेल खेल में ही आपने जिन्दगी का फ़लसफ़ा सीखा दिया।
मंजिल तक पहुंचना आसान है लेकिन मंजिल पर पहुंचना बहुत कठिन।

बहुत सुंदर संगीता जी

आभार

महेन्द्र मिश्र 9/10/2010 9:34 PM  

खेल खेल में जिंदगी का फलसफा सीख लिया .... बहुत ख़ूबसूरत रचना ....

S.M.HABIB 9/10/2010 9:50 PM  

सचमुच सांप सीढ़ी का खेल ही है जीवन. बढ़िया.

रानीविशाल 9/10/2010 10:23 PM  

इस तरह

खेल - खेल में ही

सीख लिया मैंने

ज़िंदगी का व्यापार
मान गए दी जहाँ न पहुचे रवि वहाँ पहुचे कवि ...
पहले सुडूकु और अब साँप सिड़ी कहाँ कहाँ ज़िन्दगी का सार खोज लेती है आप , मैं तो कायल हूँ
हमेशा की तरह ही एक और लाजवाब रचना
मैं अनुष्का .....नन्ही परी

Archana 9/10/2010 10:30 PM  

साँप और सीढ़ी
खेली मेरे साथ जिंदगी
निन्यानवे अब तक पार नहीं हुआ
कई बार चढ़ी
खेल अब भी शुरू है
जीतूंगी भी, मै ही
चाहे खेलना पड़े
पीढ़ी दर पीढ़ी...

मोहन वशिष्‍ठ 9991428447 9/10/2010 10:41 PM  

wah ji wah ab to saap seedhi khelne ke saath saath kavita bhi gungunane ko mil gayee behatreen


aap sabhi ko Ganesh chaturthi aur Ied ki mubarak baad

प्रवीण पाण्डेय 9/10/2010 11:12 PM  

बचपन की अनिवार्य घटना में जीवन दर्शन समझा दिया आपने।

शोभना चौरे 9/10/2010 11:16 PM  

कोई सोच भी नहीं सकता की मनोरंजन के लिए खेले गये खेल से जीवन की इतनी सुन्दर व्यखाया होगी |लाजवाब |

रचना दीक्षित 9/10/2010 11:42 PM  

वाह...क्या बात है!!!!!!!!!!!जीवन दर्शन समझा दिया आपने साँप सीढी में । लाजवाब रचना

धर्म सिंह........;;;;;.. (इक अजनबी) 9/11/2010 12:39 AM  

दी नमस्ते
बहुत ही प्यारी और सीख देने वाली रचना
पढ़ कर बहुत आनंद मिला
जीवन की सीधी और सरल व्याख्या ....
मंजिल तक पहुँचने का उतार चढ़ाव .....
.....
.......आभार

डॉ. मोनिका शर्मा 9/11/2010 1:33 AM  

खेल खेल में आप जीवन का पाठ पढ़ाती रहती हैं
सचमुच बड़ा अच्छा लगता है आपकी रचनाएँ पढ़कर

Shah Nawaz 9/11/2010 6:57 AM  

अरे वह! बेहतरीन रचना.....

रश्मि प्रभा... 9/11/2010 7:37 AM  

her ank pe darr lagta tha, per haar kahan maante the , jeet ke hi dam lete the.... agar rah gaye to ek baazi aur
bahut sahi rachna

Arvind Mishra 9/11/2010 8:37 AM  

सच ,जिन्दगी सांप सीढी ही तो है

ashish 9/11/2010 10:32 AM  

सुन्दर जीवन दर्शन , साप सीढ़ी के खेल द्वारा मानव के उत्थान पतन के गूढ़ रहस्य को परिभाषित करना , केवल आप ही कर सकती हो. साधुवाद

ओशो रजनीश 9/11/2010 10:43 AM  

गणेशचतुर्थी और ईद की मंगलमय कामनाये !

अच्छी पंक्तिया लिखी है आपने ...

इस पर अपनी राय दे :-
(काबा - मुस्लिम तीर्थ या एक रहस्य ...)
http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_11.html

वन्दना 9/11/2010 12:32 PM  

सारी ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा ये साँप सीढी का खेल ही तो है बस ज़िन्दगी इसी मे उलझती हुयी गुजर जाती है……………बहुत प्रभावशाली रचना।

अजय कुमार 9/11/2010 1:17 PM  

एकदम सटीक और सार्थक विश्लेषण ।

अजय कुमार झा 9/11/2010 2:14 PM  

सरल शब्दों में बहुत ही बेहतरीन रचना । आज तक सांप सीढी के खेल में छुपे जिंदगी के इस फ़लसफ़े इस बिल्कुल अनजान थे , आपने परिचय करवा दिया धन्यवाद ।

डा. अरुणा कपूर. 9/11/2010 2:32 PM  

सही कहा आपने...जीवन सांप- सिढी के खेल ही की तरह होता है..सुंदर प्रस्तुति....ईद एवं गणोष चतुर्थी मुबारक!॰

गिरिजा कुलश्रेष्ठ 9/11/2010 3:53 PM  

संगीता जी, साँप-सीढी के खेल की जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुति अच्छी लगी ।

Udan Tashtari 9/11/2010 7:39 PM  

पूरा फलसफ़ा है जिन्दगी है..उम्दा रचना.

anjana 9/11/2010 7:56 PM  

बहुत बढ़िया!

गणेश चतुर्थी एवं ईद की बधाई

रजनी नैय्यर मल्होत्रा 9/11/2010 9:20 PM  

kash ki ye falsafa sabko samjh aa jati to zindagi kitna aasan hota zine me..bahut hi hurt touching aapne likha hai di,,,,,,,,........

महफूज़ अली 9/12/2010 9:42 AM  

लूडो के माध्यम से ....ज़िन्दगी की गहराइयों को अभिव्यक्त करती .... यह रचना बहुत अच्छी लगी...

राजभाषा हिंदी 9/12/2010 9:44 AM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

देसिल बयना – 3"जिसका काम उसी को साजे ! कोई और करे तो डंडा बाजे !!", राजभाषा हिन्दी पर करण समस्तीपुरी की प्रस्तुति, पधारें

Shaivalika Joshi 9/12/2010 1:07 PM  

इस तरह

खेल - खेल में ही

सीख लिया मैंने

ज़िंदगी का व्यापार

Khel to maine b bahut khela par kabhi itna gahrayi se soacha nhi use

anokhi kavita

कविता रावत 9/12/2010 2:23 PM  

Saanp sheedi mein jiwan darshan dekhakar bahut achha laga....
..bahut sundar prastuti

madhav 9/12/2010 7:38 PM  

संगीताजी,वास्तव में जिसने सांप सीढ़ी के खेल में चढ़ कर गिरना सह लिया उसने ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा समझ लिया.आपकी कविता में गहरे निहितार्थ हैं.बधाई.
मैने अपने ब्लोग पर एक ताजा कविता पोस्ट की है.पढ़कर प्रतिक्रिया देने का कष्ट करें.
madhavnagda.blogspot.com

हास्यफुहार 9/12/2010 8:04 PM  

बहुत अच्छी कविता।

Madhu chaurasia, journalist 9/13/2010 4:47 AM  

वाह मैडम...बचपन की यादें ताजा कर दी आपने

Mrs. Asha Joglekar 9/13/2010 8:19 AM  

सांप सीढी सचमुच जिंदगी का खेल है । कभी खुशी कभी गम, कभी ज्यादा कभी कम ।

गजेन्द्र सिंह 9/13/2010 10:12 AM  

अच्छी पंक्तिया लिखी है आपने ....

मुस्कुराना चाहते है तो यहाँ आये :-
(क्या आपने भी कभी ऐसा प्रेमपत्र लिखा है ..)
(क्या आप के कंप्यूटर में भी ये खराबी है .... )
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com

ALOK KHARE 9/13/2010 12:04 PM  

बार- बार की कोशिशें

करा ही देती थीं

वो सौ का आंकड़ा पार ..

इस तरह

खेल - खेल में ही

सीख लिया मैंने

ज़िंदगी का व्यापार


wah di kya bat he,
Saan-sidhi ke khel bachpan me khela karte the, lekin usme jinsdgi ki sachhai bhi chhupi hoti he , ye aapne apni is rachna kemadhyam se samjha diya
ek utkirsht lekhan ke liye badhai

दिगम्बर नासवा 9/13/2010 1:01 PM  

खेल - खेल में ही
सीख लिया मैंने
ज़िंदगी का व्यापार

सच कभी कभी लगता है जिंदगी एक व्योपार ही तो है .... बस जीतने में लगे हुवे हैं सब ... पर कितना कुछ खोते जा रहे हैं कोई समझता नही ...

Dr. Ashok palmist blog 9/13/2010 2:05 PM  

संगीता दी नमस्कार, जिन्दगी का फलसफा कितनी आसानी से समझा दिया आपने। आभार! -: VISIT MY BLOGS :- Sansar ( कविता और गजल ) तथा Mind and body researches इन ब्लोगोँ को पढ़कर अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ

rashmi ravija 9/13/2010 2:09 PM  

बहुत ही प्रभावशाली रचना....सांप -सीढ़ी के खेल में पूरा जीवन-दर्शन व्यक्त कर दिया....बहुत सुन्दर

Akanksha~आकांक्षा 9/13/2010 3:22 PM  

सांप-सीढ़ी के खेल में जीवन का फलसफा भी बता दिया...उम्दा रचना..बधाई.

ajit gupta 9/13/2010 7:03 PM  

सारी बाते टिप्‍पणियों में आगयी, कुछ बचा ही नहीं। बस ऐसा ही लिखती रहें, शुभकामना है।

Virendra Singh Chauhan 9/13/2010 8:35 PM  

बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति. इसमें आपने जीवन की सच्चाई वयां कर दी.


इस नारे के साथ कि...... चलो हिन्दी अपनाएँ
आप सभी को हिन्दी दिवस पर शुभकामनाएँ

आपको बधाई और आभार .

ओशो रजनीश 9/13/2010 10:13 PM  

क्या बात है बहुत ही अच्छी पंक्तिया लिखी है .....
इन्हें पेश करने का अंदाज बहुत पसंद आया ....

एक बार पढ़कर अपनी राय दे :-
(आप कभी सोचा है कि यंत्र क्या होता है ..... ?)
http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html

Madhu chaurasia, journalist 9/14/2010 4:59 AM  

मैडम क्षमा चाहूंगी...मेरा नेट धीमा होने की वजह से मैंने आपका चर्चामंच से संबंधित कमेंट काफी देर बाद देखा...मैडम दरअसल मैं आपको ये अवगत करना चाहूंगी कि मेरी कविता 'मीडिया है कमाल' चर्चामंच पर शनिवार को शामिल की जा चुकी है...वैसे मुझे दोबारा इस कविता को चर्चामंच में शामिल किए जाने पर गर्व ही होगा...लेकिन एक बार चर्चामंच पर शामिल कविता को दोबारा शामिल किय़ा जा सकता है या नहीं मुझे इसकी जानकारी नहीं है...यदि इसे दोबारा शामिल किया जाता है तो मुझे कोई परेशानी नहीं है...बल्कि मेरा मान बढ़ेगा...इस संदेश का सिर्फ यही उद्देश्य है कि मैं आपको इससे अवगत कराना चाहती थी...मुझे आप तक संदेश पहुंचाने का कोई जरिया नहीं मिला इसलिए मैंने कमेंट के जरिए अपना संदेश आपतक पहुंचाने की कोशिश की है...

प्रतिभा सक्सेना 9/14/2010 5:14 AM  

वाह संगीता जी ,
जीवन-दर्शन व्यक्त करने में कमाल हासिल है आपको !

गजेन्द्र सिंह 9/14/2010 10:15 AM  

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....
अच्छी पंक्तिया सृजित की है आपने ........
भाषा का सवाल सत्ता के साथ बदलता है.अंग्रेज़ी के साथ सत्ता की मौजूदगी हमेशा से रही है. उसे सुनाई ही अंग्रेज़ी पड़ती है और सत्ता चलाने के लिए उसे ज़रुरत भी अंग्रेज़ी की ही पड़ती है,
हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं

एक बार इसे जरुर पढ़े, आपको पसंद आएगा :-
(प्यारी सीता, मैं यहाँ खुश हूँ, आशा है तू भी ठीक होगी .....)
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html

Akshita (Pakhi) 9/14/2010 10:54 AM  

सांप सीढ़ी का खेल तो मुझे बहुत अच्छा लगता है....सुन्दर कविता.

JHAROKHA 9/14/2010 12:25 PM  

sangeeta di samajh me nahi aa raha ki
ek sach ka aaina dikhati hui itni gaharai se ,aur kitne chintan ke baad yah behad tathy- park kavita kitani mehanat se likhi gai hogi.


और

बार- बार की कोशिशें

करा ही देती थीं

वो सौ का आंकड़ा पार ..
isi liye shyad kaha jata hai ki
himmat na hariye ,
koshish to ki jeey,
safalta aapke
,kadam chumegi.
vastav me jindgi bhi saanp -seedhi ke khel ki tarah hi hai.
bahut hi shandar abhivyakti.
poonam

हास्यफुहार 9/14/2010 6:12 PM  

बहुत अच्छी कविता।

Parul 9/14/2010 8:49 PM  

sangeeta ji...khel khel mein badi baat keh di..too gud :)

गजेन्द्र सिंह 9/15/2010 5:09 PM  

अच्छी पंक्तिया ........
अच्छी कविता ........

मेरे ब्लॉग कि संभवतया अंतिम पोस्ट, अपनी राय जरुर दे :-
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html
कृपया विजेट पोल में अपनी राय अवश्य दे ...

sheetal 9/15/2010 5:44 PM  

sach main zindagi ek saap seedhi ka khel hi to hain,
khel khel main hi zindagi main sangarsh karne ka sabak mil jaata hain.

Akshita (Pakhi) 9/16/2010 11:18 AM  

सांप-सीढ़ी पर बहुत सुन्दर कविता ...बधाई.
_____________________________
'पाखी की दुनिया' - बच्चों के ब्लॉगस की चर्चा 'हिंदुस्तान' अख़बार में भी.

दीपक 'मशाल' 9/16/2010 6:15 PM  

सच है जीवन कभी सांप-सीढ़ी तो कभी व्यापार ही है..

ज्योत्स्ना पाण्डेय 9/16/2010 7:14 PM  

संगीता जी!
बहुत ही सहजता से जीवन की उठा-पटक को सांप-सीढ़ी के माध्यम व्यक्त किया है आपने....

शुभकामनाएं...

स्वप्निल कुमार 'आतिश' 9/16/2010 8:02 PM  

mumma...apne to poore saanp seedhi ko zindagi me utar diya ....:)

lekin ...aadmi agar ninyanve se satusht ho jaye to ....:P ...hehehe... ek kahavat bhi to hai kee 99 ka chakkar khatarnaak hota hai ,,:D

bahut dhaansu nazm mumma

Suman 9/17/2010 11:52 AM  

sach kaha apne.samp sidi ka hi to khel hai jivan.......sunder kavita hai sangeeta ji........

ZEAL 9/18/2010 7:16 AM  

बार- बार की कोशिशें

करा ही देती थीं

वो सौ का आंकड़ा पार ..

इस तरह

खेल - खेल में ही

सीख लिया मैंने

ज़िंदगी का व्यापार

bahut sundar vyaakhya

.

संजय भास्कर 9/18/2010 5:21 PM  

वाह...क्या बात है........जीवन दर्शन समझा दिया आपने साँप सीढी में । लाजवाब रचना

निर्झर'नीर 9/22/2010 9:35 AM  

ni:shabd kar deti hai aapki rachnayen

hamesha

..

mridula pradhan 9/23/2010 1:49 PM  

bahot achchi baat kahi hai aapne.

Dorothy 11/03/2010 8:33 PM  

साँप - सीढी का खेल लगभग हम सभी का पसंदीदा खेल रहा है पर खेल के बहाने से जीवन की गहराईयों में डूबकर आंख चौंधियाने वाले उज्जवल मोतियों के ढेर की खूबसूरत प्रस्तुति अभिभूत कर गई. आभार.
सादर,
डोरोथी.

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