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छायादार वृक्ष

>> Tuesday, November 23, 2010




ज़िंदगी की राह में 

ऐसा तो नहीं कि
एकांत है -
इच्छाओं की गाड़ियां
स्वार्थ का धुआँ उड़ाती
निकलती जाती हैं सरपट 

आस-पास के लोंग 
एक भीड़ के मानिंद 
भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता 
भीड़ कोई रिश्ता नहीं देती 
भीड़ में कोई अपना नहीं लगता 
और एकांत न होते हुए भी 
अकेलापन पसर जाता है 
ज़िंदगी की राह में ..

किनारे पर खड़े 
छायादार वृक्ष भी 
अपनी उपस्थिति तो 
दर्ज़ कराते हैं 
पर साबित होते हैं बस 
मील के पत्थर की तरह .

मैं भी तो बस 
किनारे पर खड़ा 
एक छायादार वृक्ष ही हूँ ......



75 comments:

Rajesh Kumar 'Nachiketa' 11/23/2010 11:47 AM  

जीवन की राह में मिला एक छायादार वृक्ष अपने में कई कहानिया समेत के रखता है. जरूरत है उससे वो कहानिया पूछने की...
हर किसी के जिंदगी में ऐसी वृक्षों की जरूरत है....
सफ़र में जो पेड़ दीखते हैं उनमे से वो पेड़ ज्यादा देर तक दीखते हैं जो दूर होते हैं और घुमते हुए से प्रतीत होते हैं....
चेतन जगत में जड़ चीजों की अच्छी प्रस्तुति....
राजेश

दिगम्बर नासवा 11/23/2010 11:50 AM  

insaan sab kuch ho jata है par meel का patthar ban na hi mushkil hota है ... chaaya dena सबसे mushkil kaam है .. gahre jajbaat हैं is रचना mein ...

Sadhana Vaid 11/23/2010 11:53 AM  

नवीन बिम्बों के साथ गहन चिंतन को समेटती एक बहुत ही सार्थक और सशक्त रचना ! स्वयं का एक छायादार वृक्ष की तरह होना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है ! बधाई !

Sadhana Vaid 11/23/2010 11:53 AM  

नवीन बिम्बों के साथ गहन चिंतन को समेटती एक बहुत ही सार्थक और सशक्त रचना ! स्वयं का एक छायादार वृक्ष की तरह होना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है ! बधाई !

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 11/23/2010 11:55 AM  

वृक्ष को प्रतीक बनाकर बहुत अच्छी रचना हुई है संगीता जी.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 11/23/2010 11:55 AM  

manviy sambandhon evam samvednaon ki jadta ka chitrankan kartiaapki rachna sarahniy hai.
hardik shubhkamna.

रश्मि प्रभा... 11/23/2010 12:11 PM  

जब परिस्थितियाँ आग उगलती हैं तो यही छायादार वृक्ष
जीने का , चलने का आधार बनते हैं
भीड़ से बौखलाया मन
इसी छाया में कुछ कह पाता है

राजेश उत्‍साही 11/23/2010 12:13 PM  

मील का पत्‍थर होना भी कम महत्‍वपूर्ण नहीं है।

ashish 11/23/2010 12:16 PM  

आप केवल एक छायादार वृक्ष ही नहीं फलदार वृक्ष भी हो . आप ऐसे बिम्बों को कहा से महसूस करती है और कलम बद्ध करती है , हमे तो इर्ष्या होने लगती है . अति सुन्दर अभिव्यक्ति

Dr. Ashok palmist blog 11/23/2010 12:42 PM  

काफी गहरा चिन्तन हैँ। छायादार , फलदार और मील का पत्थर होना तो खुशनसीबी हैँ दी। बहुत- बहुत शुभकामनायेँ!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 11/23/2010 12:51 PM  

जीवन के आपा धापी में अक्सर छूट जाते हैं वो मुकाम जहाँ हमें मिलता है सुकून ...

बहुत सुन्दर रचना !

डॉ॰ मोनिका शर्मा 11/23/2010 12:52 PM  

छायादार वृक्ष के बिम्ब से प्रस्तुत बेहतरीन पंक्तियाँ.... उम्दा रचना

वन्दना 11/23/2010 1:20 PM  

मैं भी तो बस
किनारे पर खड़ा
एक छायादार वृक्ष ही हूँ ......
छायादार वृक्ष के माध्यम से बेहद गहन और सघन बात कह दी …………काश सभी छायादार वृक्ष बन पायें……………सुन्दर और सार्थक रचना।

ajit gupta 11/23/2010 1:30 PM  

आज के भौतिकता वादी और आर्थिक युग में ऐसे ही लगता है कि भीड़ में अकेले हैं। स्‍वयं का दूर खड़ा एक पेड़ ही पाते हैं। छायादार पेड़। क्‍योंकि ह‍म सबको देना चाहते हैं, अपनी छांव से दुनिया में शीतलता लाना चाहते हैं। बस राहगीर छाया में कुछ देर सुस्‍ताता है और चल देता है। यही उपलब्धि है उस पेड की। बहुत ही सार्थक रचना। बधाई।

प्रवीण पाण्डेय 11/23/2010 1:38 PM  

छायादार वृक्ष होने का सन्तोष अपरिमित है।

Dorothy 11/23/2010 1:54 PM  

छायादार पेड़ के बिंब के द्वारा जिंदगी के तपते रेगिस्तानों में "ओएसिस" की मौजूदगी को दर्शाया गया है और छायादार पेड़ में तब्दील होना अपने आप में एक बहुत बड़ी आशीष. ऐसी बातों के माध्यम से जिदगी को समझने का नया परिपेक्ष्य देती एक असाधारण प्रस्तुति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

डा. अरुणा कपूर. 11/23/2010 2:02 PM  

भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
भीड़ कोई रिश्ता नहीं देती
भीड़ में कोई अपना नहीं लगता
और एकांत न होते हुए भी
अकेलापन पसर जाता है
ज़िंदगी की राह में ..

ati suMdar kalapanaa...bahut badhhiyaa!

Majaal 11/23/2010 2:28 PM  

बड़ी हरियाली ली हुई रचना....

shikha varshney 11/23/2010 2:42 PM  

दी! आज के आपाधापी युग में एक छायादार वृक्ष बनाने की चाह ही अगर हो तो वही बहुत है,वर्ना आजकल तो लगता है कि फल वाले वृक्ष भी अपना फल नहीं देना चाहते .
बहुत ही गहरी अभिव्यक्ति.

रेखा श्रीवास्तव 11/23/2010 3:33 PM  

भीड़ निकलती है और गुजर जाती है वहाँ कोई किसी को नहीं जानता और उनकी अपनी कोई पहचान होती है लेकिन एक छायादार पेड़ - उसकी अपनी पहचान होती है , मील का पत्थर भी अपनी एक पहचान रखता है. बिना पहचान भीड़ मेंगुम हो जाने से पेड़ और पत्थर बन कर किसी को छाया या दिशा देना अधिक सार्थक है.
बहुत गंभीर बात कही आपने.

उस्ताद जी 11/23/2010 4:01 PM  

5.5/10

रचना पढना सुखद है.
भीड़ में है आदमी कि आदमी में भीड़ है.
इसी भीड़ से बचने और एक अदद छाँव की चाह में अक्सर जिन्दगी निकल जाती है.

Anjana (Gudia) 11/23/2010 4:57 PM  

bahut sunder rachna.... ruk kar aatmchintan karne ko uksati rachna.

दिपाली "आब" 11/23/2010 5:20 PM  

yahi bahut hai masi.. Ek chayadaar vriksh hona apne mein ek uplabdhi hai. Sundar rachna badhai

सुज्ञ 11/23/2010 5:30 PM  

सुन्दर,
कल्पवृक्ष सम!!

रंजना 11/23/2010 5:58 PM  

वाह...क्या बात कह दी !!!

मन में उतर गयी रचना...

मर्मस्पर्शी बहुत बहुत सुन्दर रचना...

Priyankaabhilaashi 11/23/2010 8:51 PM  

गंभीरता और सादगी..ऐसा बेजोड़ मिलन..आपके आँगन में ही मिलता है..!!

सादर नमन..!!

अनामिका की सदायें ...... 11/23/2010 8:51 PM  

भीड़ में कोई अपना नहीं लगता
और एकांत न होते हुए भी
अकेलापन पसर जाता है
ज़िंदगी की राह में ..

जिन्दगी की कश्मोकाश को दर्शाने के लिए सुंदर शब्दों का प्रयोग कर एक सशक्त रचना का सृजन किया है.

छायादार वृक्ष भी ......
पर साबित होते हैं बस
मील के पत्थर की तरह .

मैं भी तो बस .....एक छायादार वृक्ष ही हूँ ...

लेकिन अंततः जिंदगी कैसे भी उतार चढ़ाव में चलती हो है तो औरों के लिए एक छायादार वृक्ष ही ना...ये क्या कम है जिंदगी की सफलता के लिए? एक मील का पत्थर बन पाना ही जिंदगी में पूर्णता को पा लेना है...और यही निचोड़ है.

बहुत ही सशक्त रचना.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 11/23/2010 9:45 PM  

एक बुज़ुर्ग हमारे समाज में एक छायादार वृक्ष की ही तरह हैं.. जो अनुभव की छाया देते हैं!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 11/23/2010 10:11 PM  

मैं भी तो बस
किनारे पर खड़ा
एक छायादार वृक्ष ही हूँ ......
--
बहुत सही!
आज छायादार वृक्ष को सभी दरकिनार करने में लगे हुए हैं!

मनोज कुमार 11/23/2010 11:18 PM  

छायादार वृक्ष और मील का पत्थर ... इसके साथ बस क्यों!
यह तो बहुत बड़ी उपलब्धि है।

monali 11/23/2010 11:53 PM  

Sahi kaha Manoj ji ne.. at least in dis world whr every relation is based on "GIVE N TAKE"... u r givin sunthin widout expectin anything in returns..vaakai bahut badi uplabdhi h aapki.. badhai ho :)

Babli 11/24/2010 6:40 AM  

बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने वृक्ष को प्रतिक बनाकर! लाजवाब पंक्तियाँ! बेहतरीन प्रस्तुती!

प्रतिभा सक्सेना 11/24/2010 7:32 AM  

छायादार वृक्ष होना अपने आप में एक उपलब्धि है .औरों को विश्राम प्रदान करना हरेक के बस की बात नहीं .
मनोहारी रचना !

saanjh 11/24/2010 9:26 AM  

भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
भीड़ कोई रिश्ता नहीं देती
भीड़ में कोई अपना नहीं लगता
brilliant....tooo good dadi...kya khoob likha hai aapne, bohot bohot khoobsurat....


किनारे पर खड़े
छायादार वृक्ष भी
अपनी उपस्थिति तो
दर्ज़ कराते हैं
पर साबित होते हैं बस
मील के पत्थर की तरह .
so true, and sooo touching...



मैं भी तो बस
किनारे पर खड़ा
एक छायादार वृक्ष ही हूँ ......

killer...!!! ye punch to bas solid hai...too good !!!

वाणी गीत 11/24/2010 9:26 AM  

पथिक आते हैं , सुस्ताते हैं फिर अपनी राह पर चल पड़ते हैं ..
छायादार वृक्ष तनहा उदास रह जाता है...
इंसान और वृक्ष दोनों की ही पीड़ा की शानदार अभिव्यक्ति ...
आभार !

वाणी गीत 11/24/2010 9:27 AM  

पथिक आते हैं , सुस्ताते हैं फिर अपनी राह पर चल पड़ते हैं ..
छायादार वृक्ष तनहा उदास रह जाता है...
इंसान और वृक्ष दोनों की ही पीड़ा की शानदार अभिव्यक्ति ...
आभार !

रानीविशाल 11/24/2010 10:29 AM  

भीड़ में तनहाई का खूब बखान है सुन्दर बिम्ब के माध्यम से गहन प्रस्तुति .............आभार

well wisher 11/24/2010 11:47 AM  

पेड़ था साया था घर था आबाद
उठीं दीवारें पेड़ गिर जाने के बाद .

well wisher 11/24/2010 11:48 AM  

Nice पोस्ट .
चाँद है जेरे कदम और सूरज खिलौना हो गया
हां , मगर इन्सान का किरदार बौना हो गया .

ZEAL 11/24/2010 12:01 PM  

हम एक छायादार वृक्ष बन सकें , यही काफी है । -अच्छी प्रस्तुति !

अनुपमा पाठक 11/24/2010 2:36 PM  

छायादार वृक्ष कई घटनाक्रमों का साक्षी है...
सुन्दर रचना!

sada 11/24/2010 4:55 PM  

मैं भी तो बस
किनारे पर खड़ा
एक छायादार वृक्ष ही हूँ ...

बहुत ही सुन्‍दर एवं गहन भावों को समेटे यह छायादार वृक्ष ....।

निर्मला कपिला 11/24/2010 7:27 PM  

इच्छाओं की गाड़ियां
स्वार्थ का धुआँ उड़ाती
निकलती जाती हैं सरपट
बहुत अच्छी लगी ये पँक्तियाँ। ज़िन्दगी रेल गाडी की तरह ही भागी जाती है लेकिन आदमी फिर भी तन्हा है। छायादार वृक्ष बनना भी आज के युग मे एक तप के समान है। आभार।

mahendra verma 11/24/2010 10:33 PM  

भीड़ में कोई अपना नहीं लगता
और एकांत न होते हुए भी
अकेलापन पसर जाता है
ज़िंदगी की राह में

एक मनोवैज्ञानिक सत्य को उद्घाटित करती पंक्तियां।
...बहुत प्रभावशाली कविता।

क्षितिजा .... 11/25/2010 12:07 AM  

गहरे जज़्बात में डूबी रचना .... बहुत सुंदर प्रस्तुति ...

डॉ. नूतन - नीति 11/25/2010 1:12 AM  

बहुत सुन्दर रचना.. मै एक छायादार वृक्ष हूँ मील के पत्थर की तरह ..और आसपास के भीड़ जिसका कोई चेहरा नहीं.......वाह उम्दा ..

Mukesh Kumar Sinha 11/25/2010 12:30 PM  

मैं भी तो बस
किनारे पर खड़ा
एक छायादार वृक्ष ही हूँ ......

aapke issi khasiyat k ham mureed hain.......aap ek dum seedhe saadhe sabdo me bahut kuch kah dete ho......!!

simply superb!!
mujhe iss blog ka pata hi nahi tha Di!!

Dr (Miss) Sharad Singh 11/25/2010 12:54 PM  

काश, इंसान भी वृक्षों की भांति सदा सहिष्णु बने रह पाते। बहुत भावपूर्ण रचना है। बधाई।

sumit das 11/25/2010 1:32 PM  

किनारे पर खड़े
छायादार वृक्ष भी
अपनी उपस्थिति तो
दर्ज़ कराते हैं
पर साबित होते हैं बस
मील के पत्थर की तरह .


bahut sukhad rachna hai

POOJA... 11/25/2010 9:11 PM  

मन को छु लिया रचना ने...

S.M.HABIB 11/25/2010 10:37 PM  

खुबसूरत रचना... साधुवाद और नमन.

प्रतिभा सक्सेना 11/26/2010 9:26 AM  

छायादार वृक्ष होना ,अपने आप में एक उपलब्धि है.पर छाया क्या स्वयं के लिए है ?

Vijay Kumar Sappatti 11/26/2010 11:07 AM  

bahut acchi abhivyakti ji

kavita me bahut kuch aisa hai jo socne par majboor kar deta hai .

vijay
kavitao ke man se ...
pls visit my blog - poemsofvijay.blogspot.com

JHAROKHA 11/26/2010 1:15 PM  

sangeeta ji
behad hi gahan bhao liye hue apne aap
me ek sashakt avam prabhao-purn prastuti------

आस-पास के लोंग
एक भीड़ के मानिंद
भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
भीड़ कोई रिश्ता नहीं देती
भीड़ में कोई अपना नहीं लगता
और एकांत न होते हुए भी
अकेलापन पसर जाता है
ज़िंदगी की राह में ..
poonam

कुमार राधारमण 11/26/2010 4:43 PM  

जीवन-क्रम अविरल चलायमान रहता है। अंत में,उसी की निशानी रह जाती है,जो भीड़ से इतर अपनी पहचान बनाते हैं-खजूर-सी नहीं,छाएदार वृक्ष-सी।

"अभियान भारतीय" 11/26/2010 7:51 PM  

बेहद प्रभावी एवं भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकार करें |

Dr Varsha Singh 11/27/2010 12:13 AM  

इच्छाओं की गाड़ियां
स्वार्थ का धुआँ उड़ाती
निकलती जाती हैं सरपट ....सुन्दर बिम्बों वाली बहुत प्रभावशाली कविता है।

zindagi-uniquewoman.blogspot.com 11/27/2010 4:34 PM  

bahut hi ache shabado me bahvpur rachana pesh ki hai aapne...bhadai

हरकीरत ' हीर' 11/27/2010 6:50 PM  

किनारे पे खड़े हो छाया देते रहना ....बड़ों का यही तो स्नेह है .....!!

M VERMA 11/27/2010 7:26 PM  

मैं भी तो बस
किनारे पर खड़ा
एक छायादार वृक्ष ही हूँ ......

वृक्ष किनारे पर भी खड़ा होगा तो पथिक आ ही जाते हैं.

सार्थक और खूबसूरत रचना

rashmi ravija 11/27/2010 10:35 PM  

बहुत ही शानदार रचना...एक छायादार वृक्ष को कोई कुछ नहीं देता पर वो सबको एक समान छाया प्रदान करता है...
वृक्ष और इंसान की पीड़ा उजागर करती सुन्दर रचना

सुशील बाकलीवास 11/28/2010 12:10 AM  

गूढ अर्थ दर्शाती सुन्दर कविता ।
इस ब्लाग जगत में आपकी उपस्थिति भी किसी छायादार वृक्ष से कम नहीं ।
मेरे जैसे नये प्रयत्नकर्त्ता के ब्लाग पर आकर मेरा उत्साहवर्द्धन करने हेतु आपका आभार...

अशोक बजाज 11/28/2010 4:36 PM  

सुन्दर रचना !!

अर्चना तिवारी 11/28/2010 6:03 PM  

बहुत सुंदर रचना...

Kajal Kumar 11/28/2010 10:05 PM  

जीवन में छायादार होना ही इसकी संपूर्णता है.

सतीश सक्सेना 11/29/2010 12:56 PM  

सोचने को मजबूर करती इस खूबसूरत रचना के लिए बधाई !

abhi 1/24/2011 3:46 PM  

He who plants a tree
Plants a hope.
"Plant a Tree"

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 7/09/2011 1:11 PM  

भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
भीड़ कोई रिश्ता नहीं देती
भीड़ में कोई अपना नहीं लगता

बहुत ही गहरे भाव समेटे है यह कविता.

सादर

Kailash C Sharma 7/09/2011 1:55 PM  

भीड़ में कोई अपना नहीं लगता
और एकांत न होते हुए भी
अकेलापन पसर जाता है
ज़िंदगी की राह में ..

बहुत संवेदनशील प्रस्तुति..आज इंसान सच में भीड़ में भी अकेला है..बहुत सुन्दर

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 7/09/2011 6:51 PM  

भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
भीड़ कोई रिश्ता नहीं देती

अनुभूतियों से ही ऐसे सृजन सम्भव होते हैं.
कवि स्व.मुकीम भारती के शब्दों में
मैं दरख्त हूँ सूखा,हो सके तो पानी दो
आने वाले मौसम में रह गया तो फल दूंगा.

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