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कविता कहाँ है ?????????

>> Friday, April 26, 2013




आठ - नौ साल की बच्ची 
माँ की उंगली थाम 
आती है जब मेरे घर 
और उसकी माँ 
उसके हाथों में 
किताब की जगह 
पकड़ा देती है झाड़ू 
तब दिखती है मुझे कविता ।



अंधेरी रात के 
गहन सन्नाटे को 
चीरती हुई 
किसी नवजात बच्ची की 
आवाज़ टकराती है 
कानो से 
जिसे उसकी माँ 
छोड़ गयी थी 
फुटपाथ पर 
वहाँ मुझे दिखती है कविता ॰


कूड़े  के ढेर पर 
कूड़ा बीनते हुये 
छोटे छोटे  बच्चे 
लड़  पड़ते हैं 
और उलझ जाते हैं 
पौलिथीन पाने के लिए 
उसमें दिखती है कविता ।


व्याभिचार  ही व्याभिचार 
बलात्कार ही बलात्कार 
सोयी हुई व्यवस्था 
अनाचार ही अनाचार 
मरी हुई  संवेदनाएं
भाषण पर भाषण 
भूख पर राशन 
निर्लज्ज प्रशासन 
लाचार कानून 
अब मुझे  नहीं दिखती 
कहीं कोई कविता । 



67 comments:

yashoda agrawal 4/26/2013 3:46 PM  

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 27/04/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

सदा 4/26/2013 3:49 PM  

लाचार कानून
अब मुझे नहीं दिखती
कहीं कोई कविता ।
बिल्‍कुल सच कहा आपने ...
सार्थकता लिये सशक्‍त पंक्तियां
सादर

Vikesh Badola 4/26/2013 3:53 PM  

भावप्रवण।

shikha varshney 4/26/2013 3:56 PM  

सच कह रही हो. बेबसी का माहौल है. कहाँ से कविता दिखे :(
प्रभावी रचना .

vandana gupta 4/26/2013 3:57 PM  

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (27 -4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

रश्मि प्रभा... 4/26/2013 4:03 PM  

कविता खो गई है ...... सन्नाटे में अपना वजूद ढूंढ रही है

Anju (Anu) Chaudhary 4/26/2013 4:44 PM  

कवि और कविता का सीधा ताल्लुक दिल से होता है और आपने दिल की हर बात को सरल शब्दों में लिख दिया

Sadhana Vaid 4/26/2013 4:45 PM  

बिलकुल ठीक कह रही हैं आप ! मानवीयता जब इस कदर शर्मसार हो और संवेदनाएं हर पल दम तोड़ती हों तो कविता कहाँ दिखाई देगी ! बहुत ही सशक्त एवँ सार्थक रचना ! बहुत प्रभावी !

महेन्द्र श्रीवास्तव 4/26/2013 4:55 PM  

बहुत सुंदर रचना
क्या कहने

प्रवीण पाण्डेय 4/26/2013 5:28 PM  

दुखद परिस्थिति, मन ही मन कविता सहती है।

expression 4/26/2013 5:48 PM  

कविता बह गयी हैं आंसुओं में...
दब गयी है चीखों तले...............
जल गयी है दुराचार की आग में..

कहाँ है कविता???

सादर
अनु

ताऊ रामपुरिया 4/26/2013 6:31 PM  

बहुत ही सशक्त और मार्मिक.

रामराम.

संध्या शर्मा 4/26/2013 6:59 PM  

सच कहा है आपने कहीं खो गई है कविता... हर तरफ शोर है बस चीख-पुकार, अनाचार ही अनाचार...

ऋता शेखर मधु 4/26/2013 7:29 PM  

कविता की मासूमियत खो गई है...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 4/26/2013 7:59 PM  

बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!
साझा करने के लिए धन्यवाद!

Anupama Tripathi 4/26/2013 8:06 PM  

मार्मिक अभिव्यक्ति ...
रोती,सिसकती मानवता ......त्रासदी ही है कि जब से मानव है तभी से ये कुरूपता रही ही है समाज में ...किसी न किसी रूप में ....!!
मानव के इस चेहरे के प्रारब्ध से कैसे निबटा जाये ...??इसे देखकर तो वाकई लगता है ...कविता कहाँ है ...?????

Kailash Sharma 4/26/2013 8:07 PM  

निर्लज्ज प्रशासन
लाचार कानून
अब मुझे नहीं दिखती
कहीं कोई कविता ।

....बहुत सार्थक और सटीक अभिव्यक्ति...

प्रतिभा सक्सेना 4/26/2013 8:12 PM  

सचमुच संगीता जी,इतनी विषमता का विष पीते हुए कविता आखिर कब तक रह पाये!

मनोज कुमार 4/26/2013 9:17 PM  

कविता तो तब हो जब शब्दों में सर्थकता लाने वाले कवि दिखे ... कविता तो हर तरफ़ है ..।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 4/26/2013 9:29 PM  

नतमस्तक हूँ इस भावना के समक्ष!!

Dr. sandhya tiwari 4/26/2013 10:37 PM  

बहुत ही भाव पूर्ण रचना ............ऐसी वेदना में कैसे होगी कविता ..................

डॉ. मोनिका शर्मा 4/26/2013 11:22 PM  

आपकी रचनाएँ आमजीवन की वेदना को गहराई से चित्रित करती हैं .....मन में उतरते भाव

jyoti khare 4/26/2013 11:51 PM  

मन को नम करती रचना
यह कविता बालमन के भोग रहे सच को व्यक्त करती है
आपने इस पीड़ा का सजीव चित्रण किया है
अदभुत
साधुवाद

Madhuresh 4/27/2013 2:46 AM  

सच में, अंतस बस रुदन-स्थल बना बैठा है ... क्या कविता हो ऐसी परिस्थिति में ... जब समाज में व्याप्त व्यभिचार इतना भयंकर हो चुका है कि कुछ समाधान सूझ भी नहीं रहा ... कभी अपनी सभ्यता-संस्कृति पर गर्व करते थे ... आज मस्तक झुक हुआ है, शर्मसार है ...

वाणी गीत 4/27/2013 6:09 AM  

भावों की निश्छलता कहाँ बची रह पाएगी जो इन दिनों भय , संशय , आराजकता , अविश्वास के भंवर में अटकी है . ऐसे माहौल में निर्मल काव्य कहाँ संभव है !
मार्मिक एवं सटीक !

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 4/27/2013 9:26 AM  

आदरेया, अत्यंत ही मार्मिक एवम् विचारणीय रचना......

हाथ बुहारन है कहीं , कहीं पड़ी फुटपाथ
कूड़ा-करकट छानती, बिटिया कई अनाथ
बिटिया कई अनाथ,कहाँ ढूँढें हम कविता
हरदिन काली भोर,लिये आता है सविता
कलियाँ कुचलें रोज , दरिन्दे बैठे उपवन
कब तक होगी हाय,कली के हाथ बुहारन ||

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया 4/27/2013 10:06 AM  

अत्यंत मार्मिक एवम् विचारणीय प्रस्तुति!!! ,

Recent post: तुम्हारा चेहरा ,

Neelima 4/27/2013 10:12 AM  

ufff .kavita bhi kho gyi in balatkaaro atyachaaro main ..har taraf sirf aartnaad .....

Onkar 4/27/2013 10:37 AM  

बहुत सटीक रचना

Rajendra Kumar 4/27/2013 11:35 AM  

सच ही कहें हैं,दिन पर दिन बेबसी बढती जा रही है.

Bhavana Lalwani 4/27/2013 2:37 PM  

Bahut sateek likha hai aapne .. shabdon k arth ab gum ho gay ehain

venus****"ज़ोया" 4/27/2013 4:30 PM  

uffffffffffffffff..sangeetaa ji.........

main to yahaan aapko dhanywaad krne aayi thi ki..aap mere blog tak aayi aur....sraahnaa di........

pr yaahn aake afsos se bhr gyi......itne dino tak....yaahaan naa aane ke liye.........

aapki rchnaayen prte prte....kho gyi main to..

aur ye waali.........to bas..dil pe lgti he

bahut bahut shukriyaaaa...aapkaa

aur aapki..wo ik line.." bahut dino baad dikhii"............aisaa lgaa..mano bdii didi ne puchaa ho........shukriyaaaaaaaaa

Brijesh Singh 4/27/2013 7:13 PM  

बहुत ही सुन्दर रचना! मेरी बधाई स्वीकारें।
कृपया यहां पधार कर मुझे अनुग्रहीत करें-
http://voice-brijesh.blogspot.com

तुषार राज रस्तोगी 4/27/2013 7:47 PM  

निशब्द!!! बेहतरीन, उम्दा |

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
Tamashaezindagi FB Page

Maheshwari kaneri 4/27/2013 8:04 PM  

बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!..आभार

Vandana Tiwari 4/27/2013 8:28 PM  

आपकी यह अप्रतिम प्रस्तुति 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक की गई है।कृपया http://nirjhar-times.blogspot.com पर पधारकर अवलोकन करें और आपका सुझाव/प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है।
सादर

Ashok Saluja 4/27/2013 8:29 PM  

बेचैन करते मन के व्यथित प्रश्न ...
शुभकामनायें!

Nidhi Tandon 4/28/2013 7:19 AM  

विचार करने को मजबूर करती सुन्दर रचना

Abhijit Shukla 4/28/2013 7:34 AM  

Bahut hi khoobsurat abhivyakti. dhanyavaad hum sabko thoda sa aur samvedansheel banane ki koshish ke liye.

-Abhijit (Reflections)

Dr. Sarika Mukesh 4/28/2013 10:06 AM  

ह्रदय को बहुत अंदर तक हिला गई आपकी यह कविता....जीवन का सत्य, तमाम विषमताओं के संग जीने की लाचारी को दर्शाती है ये रचना...

दिगम्बर नासवा 4/28/2013 1:43 PM  

सच ही तो है ... कविता जन्म लेती है माहोल से ... बिखरी हुई संवेदना से .... वर्ना कविता बेजान शब्दों का पुलिंदा ही है ...

Suman 4/29/2013 8:51 AM  

सार्थक रचना ....

Amrita Tanmay 4/29/2013 3:40 PM  

बस आह..ये आह भी तो कविता हैं न.. !

निर्झर'नीर 5/01/2013 1:32 PM  

मरी हुई संवेदनाएं
भाषण पर भाषण
भूख पर राशन
निर्लज्ज प्रशासन
लाचार कानून
अब मुझे नहीं दिखती
कहीं कोई कविता । ......bahut din baad kavita padhne ko mili .shubhkamnayen

हरकीरत ' हीर' 5/02/2013 11:39 AM  

आठ - नौ साल की बच्ची
माँ की उंगली थाम
आती है जब मेरे घर
और उसकी माँ
उसके हाथों में
किताब की जगह
पकड़ा देती है झाड़ू

मार्मिक चित्रण ....

डॉ. जेन्नी शबनम 5/02/2013 2:44 PM  

मन को छू गई रचना, बहुत मार्मिक कविता. शुभकामनाएँ.

parul chandra 5/02/2013 5:31 PM  

बहुत ही सुन्दर रचना ।

जयकृष्ण राय तुषार 5/03/2013 1:47 PM  

बहुत ही अच्छी कविता |आभार

जयकृष्ण राय तुषार 5/03/2013 1:47 PM  

बहुत ही अच्छी कविता |आभार

जयकृष्ण राय तुषार 5/03/2013 1:47 PM  

बहुत ही अच्छी कविता |आभार

कविता रावत 5/03/2013 5:45 PM  

कविता जिंदादिल संवेदनशील इंसानों में ही रचती-बसती हैं..बहुत बढ़िया रचना

Saras 5/04/2013 10:19 AM  

कविता सिर्फ नर्म अहसासों में जीती है ....जब वही कुचल गए तो कविता कैसे जीवित रह सकती है.....कहाँ पनप सकती है

Tanuj arora 5/04/2013 8:19 PM  

बहुत सही लिखा आपने...
वर्तमान समय के इस परिवेश कहीं खो गयी है कविता..

सतीश सक्सेना 5/05/2013 4:38 PM  

कैसी कविता ...??
मंगल कामनाएं बच्चियों के लिए !!

Mukesh Kumar Sinha 5/10/2013 10:35 AM  

dard bhari marmik rachna...

andcp samachar 5/10/2013 5:41 PM  

मन को छूने वाली एक बेहतरीन रचना ..वाकई सम्बेदना मर गयी है ..और जब सम्बेदना ही नहीं तो कविता कहाँ ...मेरे ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित हैं ...

Madhukanta Shringi 5/12/2013 1:57 PM  


बलात्कार ही बलात्कार
सोयी हुई व्यवस्था
अनाचार ही अनाचार
मरी हुई संवेदनाएं
भाषण पर भाषण
भूख पर राशन
निर्लज्ज प्रशासन
लाचार कानून
अब मुझे नहीं दिखती
कहीं कोई कविता ।
Sangeeta ji,sab kuch sahi likha aapne
soyi hui vyavastha
mari hui samvednaye
nirlajj prashasan
Ye lines to har dar darvaje par likh deni chahiye
bas ek line ghalat likhi aapne
jiske liye aapko tarif bhi kafi mili अब मुझे नहीं दिखती
कहीं कोई कविता । agar aap aur hum kavitaya lekhana chhod denge to
ye dunia aur bhi buri ban jayegi.
hame bhagwan ne shabdo ki takat hi isiliye di hai ki hum in sabko jhakjhor de. hamara kartavya hai ki hum in logo ko ahsaas karaye ki unke karan jin logo ko pida pahuch rahi hai,unka bhagvan ke siva is duniya me bhi koi madadgar hai. charam pida(dard) se hi upajti hai sachhi kavita. likho aap, isse bhi jyada tikhe, tikshn shabd-bano ki varsha ka do.yahi Krishna ne Arjun se kaha tha.yahi hamara dharm hai, yahi dharm-yudh. harna nahi. in kavitao ko sahi jagah prakashit karviye.KARMANYE VADHIKARSTE, MA PHALESHU KADACHAN.

Madhukanta Shringi 5/12/2013 2:01 PM  

बलात्कार ही बलात्कार
सोयी हुई व्यवस्था
अनाचार ही अनाचार
मरी हुई संवेदनाएं
भाषण पर भाषण
भूख पर राशन
निर्लज्ज प्रशासन
लाचार कानून
अब मुझे नहीं दिखती
कहीं कोई कविता ।
Sangeeta ji,sab kuch sahi likha aapne
soyi hui vyavastha
mari hui samvednaye
nirlajj prashasan
Ye lines to har dar darvaje par likh deni chahiye
bas ek line ghalat likhi aapne
jiske liye aapko tarif bhi kafi mili अब मुझे नहीं दिखती
कहीं कोई कविता । agar aap aur hum kavita ya lekhan chhod denge to
ye dunia aur bhi buri ban jayegi.
hame bhagwan ne shabdo ki takat hi isiliye di hai ki hum in sabko jhakjhor de. hamara kartavya hai ki hum in logo ko ahsaas karaye ki unke karan jin logo ko pida pahuch rahi hai,unka bhagvan ke siva is duniya me bhi koi madadgar hai. charam pida(dard) se hi upajti hai sachhi kavita. likho aap, isse bhi jyada tikhe, tikshn shabd-bano ki varsha ka do.yahi Krishna ne Arjun se kaha tha.yahi hamara dharm hai, yahi dharm-yudh. harna nahi. in kavitao ko sahi jagah prakashit karviye.KARMANYE VADHIKARSTE, MA PHALESHU KADACHAN.
Madhukanta

देवेन्द्र पाण्डेय 5/25/2013 2:55 PM  

मार्मिक।

काश.. कविता स्वयम् अभिव्यक्त हो पाती! वकील की तरह कवियों की आवश्यकता न पड़ती उसे अपनी पीड़ा बताने के लिए। काश... समझ जाता ऊपर बैठा जज कविता की पीड़ा।

prritiy----sneh 6/02/2013 7:36 PM  

bahut hi satik kadwe sach ko ujagar karti achhi rachna

shubhkamnayen

ब्लॉग बुलेटिन 6/29/2013 12:12 PM  

ब्लॉग बुलेटिन की ५५० वीं बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन की 550 वीं पोस्ट = कमाल है न मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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