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भरमाये हैं .....

>> Wednesday, August 31, 2011




बावफा हो कर भी हम बेवफा कहलाये हैं 
अपनो ने ही सीने में नश्तर चुभाये हैं |

चाहा  तो नहीं था कि यकीं करें उनकी बातों पर 
पर फिर भी उनके वादे पर हमने धोखे खाए हैं |

सियासत चीज़ है बुरी उस पर क्या यकीं कीजै 
उनके किये  वादे बस मन को लुभाए हैं |

अँधेरे में बैठे हैं हम दर औ दीवार को थामें 
दामन नहीं है हाथ में , बस उनके साये हैं |

खामोशी से भी अब  क्यों कुछ करें इज़हार 
जुबां से कहे लफ़्ज़ों से कई बार भरमाये हैं ..



संगीता स्वरुप 


व्ही० एन० श्रीवास्तव जी द्वारा शब्दों में कुछ परिवर्तन के साथ गाई गयी यह गज़ल ...


66 comments:

प्रवीण पाण्डेय 8/31/2011 11:39 AM  

अपने ही गिराते हैं नशेमन पे बिजलियाँ।

रविकर 8/31/2011 11:49 AM  

बहुत सुन्दर --
प्रस्तुति |
बधाई ||

आपका अख्तर खान अकेला 8/31/2011 11:53 AM  

drd bhre sach kaa bhtrin chitran.akhtar khan akela kota

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 8/31/2011 12:02 PM  

बेहद उम्दा गज़ल लिखी है.बेहतरीन.शानदार.

बावफा ,बेवफा पर किसी शायर का शेर याद आ गया-
हम बावफा थे इसलिये काबिल नहीं थे,
तुमको किसी बेवफा की तलाश थी.

अशोक सलूजा 8/31/2011 12:06 PM  

हमें कब था ,उनके वादों पर ऐतबार,
पर ऐतबार किया ,और बार-बार किया| "अज्ञात"

शुभकामनायें!

Anju (Anu) Chaudhary 8/31/2011 12:06 PM  

खामोशी से भी अब क्यों कुछ करें इज़हार
जुबां से कहे लफ़्ज़ों से कई बार भरमाये हैं ..



waah...bahut khub

vandan gupta 8/31/2011 12:18 PM  

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
अवगत कराइयेगा ।

http://tetalaa.blogspot.com/

Dr.NISHA MAHARANA 8/31/2011 12:22 PM  

bhut acha.madam aapke anusar dashboard pr jati hoon pr word varification nhi aata.hidi me comment likhne ke liye kya krna prta hai?actual me mujhe jiyada jankari nhi hai.

Unknown 8/31/2011 12:28 PM  

अँधेरे में बैठे हैं हम दर औ दीवार को थामें
दामन नहीं है हाथ में , बस उनके साये हैं


बहुत खूब संगीता जी , बेहतरीन शब्द संजोये है. आपकी काव्य यात्रा के नए सोपान पढ़कर अभिभूत हूँ बधाई

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 8/31/2011 12:59 PM  

आद संगीता दी,
व्वाह!
कम्माल की, सुन्दर ग़ज़ल कही है अपने...

ईद, तीज और श्री गणेश चतुर्थी की सादर बधाईयाँ...

ashish 8/31/2011 1:03 PM  

हम तो पढ़ के यूँ ही गुनगुनाये है , "हमरा बलमा बेईमान हमे समझाने आये है "

Er. सत्यम शिवम 8/31/2011 1:39 PM  

बहुत ही सुंदर....लाजवाब।

Dr Varsha Singh 8/31/2011 1:42 PM  

उम्दा शेर कहे हैं आपने, बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल है !
बहुत खूब !...... हरेक शेर लाज़वाब...
संगीता जी, गीत और ग़ज़ल दोनों विधाओं में आप सिद्धहस्त हैं.आपको मेरी हार्दिक बधाई।

Sadhana Vaid 8/31/2011 1:43 PM  

बहुत भावपूर्ण भीगी-भीगी सी गज़ल कही है संगीता जी ! वाह वाह क्या बात है ! हर शेर मन को लुभा गया ! शुभकामनायें !

प्रतिभा सक्सेना 8/31/2011 1:44 PM  

सियासत चीज़ है बुरी उस पर क्या यकीं कीजै
उनके किये वादे बस मन को लुभाए हैं .
- बहुत सही फ़र्माया है !

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 8/31/2011 2:16 PM  

सुन्दर प्रस्तुति...दिल को छू गई...ईद मुबारक़

प्रतिभा सक्सेना 8/31/2011 2:19 PM  

सियासत चीज़ है बुरी उस पर क्या यकीं कीजै
उनके किये वादे बस मन को लुभाए हैं .
- बिलकुल दुरुस्त फ़र्माया है !

Maheshwari kaneri 8/31/2011 3:24 PM  

खामोशी से भी अब क्यों कुछ करें इज़हार
जुबां से कहे लफ़्ज़ों से कई बार भरमाये हैं ..
बहुत सुन्दर ,भावपूर्ण अभिव्यक्ति....आभार

रजनीश तिवारी 8/31/2011 3:45 PM  

बहुत शानदार गज़ल...शुभकामनाएँ

Anupama Tripathi 8/31/2011 4:12 PM  

जीवन का कटु सत्य ...
सीधे दिल पर उतर गयी पंक्तियाँ...
बहुत सुंदर ..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 8/31/2011 4:41 PM  

मोहब्बत, सियासत, वफ़ा, बेवफाई,
सभी रंग हैं इस गज़ल में समाए!
संगीता दी! इस बार ये रंग भी पसंद आया!!

Anita 8/31/2011 4:45 PM  

खामोशी से भी अब क्यों कुछ करें इज़हार जुबां से कहे लफ़्ज़ों से कई बार भरमाये हैं ..

बहुत खूब शेर कहे हैं आपने, आपकी उर्दू भी बहुत अच्छी है... बधाई!

रश्मि प्रभा... 8/31/2011 5:20 PM  

खामोशी से भी अब क्यों कुछ करें इज़हार
जुबां से कहे लफ़्ज़ों से कई बार भरमाये हैं ..
ab bas bhi karo, ab kuch nahi kahna ... bahut badhiyaa

Dr.R.Ramkumar 8/31/2011 5:53 PM  

बेहतर रचना ...

मनोज कुमार 8/31/2011 6:55 PM  

खामोशी से भी अब क्यों कुछ करें इज़हार
जुबां से कहे लफ़्ज़ों से कई बार भरमाये हैं ..

कई बार कई बातें ज़ुबान बंद रखने से ही स्पष्ट होती हैं और सामने वाले को सुनाई देती है।
आप ग़ज़ल भी लिखती हैं, यह देख कर मन हर्षित हुआ।

रेखा श्रीवास्तव 8/31/2011 7:21 PM  

खामोशी से भी अब क्यों कुछ करें इज़हार
जुबां से कहे लफ़्ज़ों से कई बार भरमाये हैं ..


आपकी कलम जब चलती है तो फिर बाँध लेती हैं. बहुत सुंदर ग़ज़ल रची है. आभार !

Rachana 8/31/2011 7:32 PM  

खामोशी से भी अब क्यों कुछ करें इज़हार
जुबां से कहे लफ़्ज़ों से कई बार भरमाये हैं .
sunder bhavon uttammprastuti
rachana

udaya veer singh 8/31/2011 9:36 PM  

अँधेरे में बैठे हैं हम दर औ दीवार को थामें
दामन नहीं है हाथ में , बस उनके साये हैं |
मार्मिक संवेदनशील ग़ज़ल ,बहुत सुंदर समीचीन ..........शुक्रिया जी /

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद 8/31/2011 9:52 PM  

बहुत बढिया। हम तो अपनों से ही भरमाए हैं :)

Vandana Ramasingh 9/01/2011 6:54 AM  

खामोशी से भी अब क्यों कुछ करें इज़हार
जुबां से कहे लफ़्ज़ों से कई बार भरमाये हैं .

बहुत सुन्दर गज़ल

जयकृष्ण राय तुषार 9/01/2011 7:23 AM  

बहुत खूब बधाई और शुभकामनाएं

वाणी गीत 9/01/2011 8:03 AM  

जो शब्दों से भरमाये गये , खामोशियाँ का ऐतबार क्या करें ...

Kunwar Kusumesh 9/01/2011 8:38 AM  

इन शेरों में ज़बरदस्त सम्प्रेषण है,संगीता जी.
पढ़ते पढ़ते किसी का एक प्यारा-सा शेर याद आ गया:-
हम बावफा थे इसलिए नज़रों से गिर गए,
शायद उन्हें तलाश किसी बेवफ़ा की थी.

Satish Saxena 9/01/2011 9:04 AM  

दुश्मनों से प्यार होता जाएगा
दोस्तों को आजमाते जाइए !

अधिक कष्ट वे ही देते हैं जो अपने होते हैं ! दर्द भी इसी लिए अधिक होता है !
शुभकामनायें !

कविता रावत 9/01/2011 2:25 PM  

बहुत बढिया प्रस्तुति ..
गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें!

रूप 9/01/2011 2:27 PM  

चाहा तो नहीं था कि यकीं करें उनकी बातों पर
पर फिर भी उनके वादे पर हमने धोखे खाए हैं |
Bhai wah.. sundar rachna !

Kailash Sharma 9/01/2011 3:16 PM  

अँधेरे में बैठे हैं हम दर औ दीवार को थामें
दामन नहीं है हाथ में , बस उनके साये हैं |

...बहुत खूब ! लाज़वाब गज़ल..

sushmaa kumarri 9/01/2011 9:02 PM  

खामोशी से भी अब क्यों कुछ करें इज़हार
जुबां से कहे लफ़्ज़ों से कई बार भरमाये हैं ..सुन्दर पंक्तिया....

vidhya 9/01/2011 11:45 PM  

बहुत सुन्दर --
प्रस्तुति |
बधाई |

Dr (Miss) Sharad Singh 9/01/2011 11:58 PM  

बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !
हार्दिक शुभकामनायें !
एवं साधुवाद !

डॉ. मोनिका शर्मा 9/02/2011 4:48 AM  

अँधेरे में बैठे हैं हम दर औ दीवार को थामें
दामन नहीं है हाथ में , बस उनके साये हैं |

बहुत सुन्दर...

हरकीरत ' हीर' 9/02/2011 8:36 AM  

क्या बात है संगीता जी ...
बहु खूब .....!!

www.navincchaturvedi.blogspot.com 9/02/2011 8:52 AM  

बावफा हो कर भी हम बेवफा कहलाये हैं
अपनो ने ही सीने में नश्तर चुभाये हैं |

यही तो खास बात होती है अपनों की

virendra sharma 9/02/2011 1:05 PM  

खूबसूरत अशआर आपके -

अँधेरे में बैठे हैं हम दर औ दीवार को थामें
दामन नहीं है हाथ में , बस उनके साये हैं |बधाई !

shikha varshney 9/02/2011 2:19 PM  

ओह हो शेर ओ शायरी भी ..क्या बात है..बहुत खूब.

Anupama Tripathi 9/02/2011 8:19 PM  

आपकी किसी पोस्ट की चर्चा शनिवार ३-०९-११ को नयी-पुरानी हलचल पर है ...कृपया आयें और अपने विचार दें......

Anonymous,  9/02/2011 11:25 PM  

एकदम सच कहा संगीता जी आपने... सियासत बहुत बुरी चीज है... आप चाहे जो भी गुणा-भाग, जोड़-घटाना कर लें... नतीजा सिफ़र का सिफ़र :-)

monali 9/03/2011 12:21 AM  

Jin par zada bharosa ho.. wo hi itna dard de pate hain..ajnabiyo ko kahaan pata hota h hamari kamzoriyo ka..

सदा 9/03/2011 2:40 PM  

वाह ... यह तो बहुत ही बढि़या ... ।

अनामिका की सदायें ...... 9/03/2011 5:14 PM  

शब्दों का प्रयोग असरदार है. खूबसूरत, उम्दा गजल बनी है.

बधाई.

Sushil Bakliwal 9/03/2011 10:38 PM  

सुन्दर प्रस्तुति.

महेन्‍द्र वर्मा 9/04/2011 11:43 AM  

चाहा तो नहीं था कि यकीं करें उनकी बातों पर
पर फिर भी उनके वादे पर हमने धोखे खाए हैं ।

सुंदर अभिव्यक्ति, अच्छी ग़ज़ल।

Vaanbhatt 9/04/2011 5:23 PM  

ख़ूबसूरत ग़ज़ल...

shephali 9/04/2011 7:28 PM  

bahut sundar gazal hai di

Suman 9/05/2011 11:18 AM  

ख़ामोशी से भी अब क्यों कुछ करे इजहार
जुबां से कहे लफ्जों से कई बार भरमाये है !
वाह क्या बात है सुंदर .....

रचना दीक्षित 9/05/2011 1:21 PM  

खामोशी से भी अब क्यों कुछ करें इज़हार
जुबां से कहे लफ़्ज़ों से कई बार भरमाये हैं ..

संगीता दी, ये तो लाजवाब लगी

ZEAL 9/06/2011 10:27 AM  

.

अँधेरे में बैठे हैं हम दर औ दीवार को थामें
दामन नहीं है हाथ में , बस उनके साये हैं |

Very touching couplets Sangeeta ji .

.

दिगम्बर नासवा 9/07/2011 2:06 PM  

अँधेरे में बैठे हैं हम दर औ दीवार को थामें
दामन नहीं है हाथ में , बस उनके साये हैं |

बेहतरीन शेर है .. कभी कभी साये भी मन को भरमा जाते हैं ...

Shayar Ashok : Assistant manager (Central Bank) 9/12/2011 10:56 PM  

नमस्कार ,
वैसे तो पूरी गज़ल कमाल की है
पर ये शेर तो जैसे दिल को बहुत कुछ कह गया

सियासत चीज़ है बुरी उस पर क्या यकीं कीजै
उनके किये वादे बस मन को लुभाए हैं |
उम्दा !!!

Bhola-Krishna 9/15/2011 3:07 AM  

संगीता जी , राम राम
सचमुच एक प्रेरणा दायक रचना !पढते ही भोलाजी में छुपे बैठे ८२ वर्षीय 'स्वर सयोजक" ने आंतरिक प्रेरणा वश इस गजल की धुन भी बना ली!गजल को "गेय" बनाने में कुछ संशोधन भी करने पडे !इस अनाधिकार चेष्टा के लिए क्षमा प्रार्थी हैं भोला जी ! यदि अनुमति मिले तो 'महाबीर बिनवौ हनुमाना', में इसका संशोधित संस्करण गा कर सुनायें!
धन्यवाद और आभार

अनुपमा पाठक 10/14/2011 7:33 PM  

सुन्दर प्रस्तुति!

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