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पुस्तक समीक्षा .... बदलती सोच के नए अर्थ .... वंदना गुप्ता

>> Tuesday, January 20, 2015



हिंदी अकादमी दिल्ली के  सौजन्य से प्रकाशित सुश्री  वंदना गुप्ता जी का काव्य संग्रह “ बदलती सोच के नए अर्थ “ सोच को बदलने की पूर्ण क्षमता  रखता है . इस काव्य संग्रह को पढ़ते हुए कई बार ये महसूस हुआ कि आज मात्र सोच ही नहीं बदल रही है वरन उसके अर्थ भी बदल रहे हैं . वंदना  के लेखन की एक अलग ही विशेषता है . वो अपनी  रचनाओं के मध्यम से एक ही विषय पर  अपने मन में उठने वाले संशयों  को विस्तार से रखती हैं और  फिर उन संशय के उत्तर खोजती हुई अपना एक पुख्ता विचार रखती हैं और  पाठक उनकी प्रवाहमयी शैली से बंधा उनके प्रश्न उत्तर को समझता हुआ उनके विचार से सहमत  सा होता प्रतीत होता है . इस  काव्य संग्रह में काव्य सौन्दर्य से परे विचार और भाव की  महत्ता है इसीलिए  इसका नाम “बदलती सोच के नए अर्थ”  सार्थक है .
अपने इस काव्य संग्रह को वंदना जी  ने चार भागों में विभक्त  किया है ... प्रेम , स्त्री विषयक , सामजिक  और दर्शन . प्रेम एक  ऐसा विषय जिस पर न जाने कितना कुछ लिखा गया है लेकिन वंदना जी जिस प्रेम की तलाश में है वो मन की उड़ान और गहराई दोनों ही दिखाता है . वह प्रेम में देह को गौण  मानते  हुए लिखती हैं ...
जानते हो / कभी कभी ज़रूरत होती है / देह से इतर प्रेम की ... राधा कृष्ण सा /

एक अनदेखा अनजाना सा व्यक्तित्त्व जिसके माध्यम से प्रेम की पराकाष्ठा का अहसास होता है –

चलो आज तुम्हे एक बोसा दे ही दूँ ....उधार समझ कर रख लेना /कभी याद आये तो .. तुम उस पर अपने अधर  रख देना / मुहब्बत निहाल हो जाएगी . 

कुछ ऐसे विषय जिन्हें आज भी लोग वर्जित समझ लेते हैं  उस पर इन्होने अपनी बेबाक  राय देते हुए अपने विचार  रखे हैं इसी कड़ी में उनकी एक रचना है प्रेम का अंतिम लक्ष्य  क्या .... सैक्स ? अपने विचारों को पुख्ता तरीके से रखते हुए उनका कहना  है कि सैक्स  के लिए  प्रेम का होना ज़रूरी नहीं  तो दूसरी ओर जहाँ आत्मिक प्रेम होता है वहां देह का भान भी नहीं होता .

उनका प्रेम सदाबहार है .... तभी कहती हैं कि प्रेम कभी प्रौढ़ नहीं होता .

स्त्री विषयक  रचनाओं में उन्होंने सदियों से स्त्री के मन में घुटे , दबे भावों को शब्द दिए हैं . पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियाँ अब अपने वजूद की तलाश में हैं और शोषित होते होते  अघा गयी हैं .... अब विस्फोट की स्थिति  आ गयी है तो विद्रोह तो होना ही है ....
मर्दों के शहर की अघाई औरतें / जब उतारू हो जाती हैं विद्रोह पर / तो कर देती हैं तार तार / साडी लज्जा की बेड़ियों को / उतार देती हैं लिबास हया का / जो ओढ़ रखा था बरसों से  , सदियों ने / और अनावृत हो जाता है सत्य / जो घुट रहा होता है औरत की जंघा और सीने में . 

स्त्रियों  में जो प्राकृतिक शारीरिक परिवर्तन होते हैं और उसके कारण होने वाले बदलाव पर भी वंदना जी ने अपनी लेखनी चलाई है ... ऋतुस्राव से मीनोपाज़  तक का सफ़र . ... ये  ऐसे विषय हैं जिन पर शायद ही इससे पहले किसी रचनाकार का ध्यान गया हो . स्त्री विषयक रचनाओं में विद्रोह के स्वर मुखरित हुए हैं . “कागज़ ही तो काले करती हो “ में स्पष्ट रूप से इंगित कर दिया है कि ये लिखना लिखाना बेकार है जब तक कोई अर्थ ( पैसा )  नहीं मिलता . अंतिम पंक्तियों में भावनाओं को निचोड़ कर रख दिया है ...
ये वो समाज है / जहाँ अर्थ ही प्रधान है / और स्वांत: सुखाय का यहाँ कोई महत्तव  नहीं / शायद इसीलिए / हकीकत की  पथरीली ज़मीनों पर पर पड़े फफोलों  को रिसने की इजाज़त  नहीं होती ...

विद्रोह के स्वर की एक बानगी ये भी  ----
हाँ बुरी औरत हूँ मैं / मानती हूँ ../ क्यों कि जान  गयी हूँ /  अपनी तरह / अपनी शर्तों पर जीना

इनकी  कविताओं के शीर्षक से ही विद्रोह का स्वर गूंजने लगता है ... जैसे ... खोज में हूँ  अपनी प्रजाति के अस्तित्व  की , आदिम पंक्ति की एक क्रांतिकारी रुकी हुई बहस हूँ मैं ... क्यूँ कि तख्ता पलट यूँ ही नहीं हुआ करते . 

कवयित्री की लेखनी जहाँ प्रेम , समाज और स्त्री विषयक  विषयों  पर चली है वहीँ कुछ दार्शनिक भावों को भी समेटे हुए है .जीवन दर्शन के लिए मन  को मथना पड़ता  है बिलकुल उसी तरह जैसे मक्खन   निकालने के लिए दूध को .... "प्रेम , आध्यात्म और जीवन दर्शन”  में इस भाव को वंदना जी ने बखूबी वर्णित किया है .
“सम्भोग से समाधि  तक “ ने इन शब्दों के शाब्दिक अर्थ और परिभाषा को समझाते हुए ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त किया है . कुछ पंक्तियाँ देखिये ...
जीव रूपी यमुना का / ब्रह्म रूपी गंगा के साथ / सम्भोग उर्फ़  संगम होने पर / सरस्वती में लय हो जाना ही / आनंद या समाधि है . ...
कभी कभी शब्दों के तात्विक अर्थ इतने गहन होते हैं जो समझ से परे होते हैं और उन्होने उन्ही अर्थों को खूबसूरती से विवेचित किया है और ऐसा तभी संभव है जब कोई उन लम्हात से गुजरा हो या गहन चिन्तन मनन किया हो ।

कवयित्री ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी दर्शन में समा लिया है ...ईश्वर की खोज जिसे सब खोज रहे हैं मात्र एक अणु.... और एक अणु ही तो है “मैं  “ इसी की खोज में प्रयासरत है .

इस काव्य संग्रह की एक दो रचनाओं को छोड़ दें तो सभी लम्बी  कविताओं का रूप लिए हैं . और इनका लम्बा होना लाज़मी भी था क्योंकि  सभी विचार प्रधान रचनाएँ हैं . हो सकता है कि पाठक लम्बी कविताओं को पढ़ने का हौसला न रखे  पर मैं ये दावे से कह सकती हूँ कि ...   वंदना जी की प्रवाहमयी शैली और उनके तर्क वितर्क पाठकों को बांधे रहेंगे  और पाठक कविता ख़त्म करते करते उस विषय से जुदा महसूस करेगा . यह काव्य संग्रह  पाठक की भावनाओं को उद्द्वेलित  करने में पूर्णत:  सक्षम है .
वंदनाजी के ब्लॉग की  नियमित पाठिका हूँ और उनके लेखन की प्रशंसिका भी . इस काव्य संग्रह में ब्लॉग से इतर भी रचनाओं का संकलन है ... इस काव्य सग्रह के लिए मैं उनको हार्दिक बधाई देती हूँ  और कामना करती हूँ कि उनके ये स्वर यूँ ही बुलंद रहें और जो उन्होंने एक ख्वाहिश इस संग्रह में रखी है (  विद्रोह के स्वर सहयोग के स्वर में परिवर्तित हों )  पूरी हो . शुभकामनाओं के साथ ...

हिंदी चेतना पत्रिका के जनवरी से मार्च अंक में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा . 


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मन के प्रतिबिंब ( काव्य - संग्रह ) / शिखा वार्ष्णेय ........ पुस्तक परिचय

>> Wednesday, August 14, 2013


लंदनवासी शिखा वार्ष्णेय  का नाम किसी परिचय का मोहताज  नहीं   है । उनकी पुस्तक " स्मृतियों में रूस " ( संस्मरण ) काफी सराही गयी है । वो अनेक विधाओं में लेखन करती हैं । आज    " मन के प्रतिबिंब " उनका काव्य संग्रह हाथ में आने पर एक अलग ही अनुभूति का एहसास हुआ ..... ..मन के प्रतिबिंब से शिखा के मन को पढ़ा जा सकता है  जहां वो अपने मन की संवेदनाओं को समेट  काव्य रूप में प्रस्तुत करती हैं । इनकी कवितायें किसी विशेष विषय पर आधारित नहीं हैं ...हर वो विषय वस्तु जो किसी भी संवेदनशील मन को अंदर तक छू जाए इस पुस्तक में संकलित है ।

समसामयिक विषयों पर एक  प्रश्न  चिह्न लगाती कवितायें सोचने पर मजबूर कर देती हैं ...   चीखते प्रश्न --  ऐसी ही कविता है जहां उत्तर की जगह मौन है  और स्तब्धता है । व्यवस्था पर तीखे प्रश्न हैं ...

अपने किसी नागरिक की क्या / कोई जिम्मेदारी लेती है सरकार ? /क्यों एक भी मासूम को नहीं बचा पाती / दुश्मनों के खूनी शिकंजे से ? / कैसे वे मार दिए जाते हैं निर्ममता से / उनकी जेलों में ईंटों से / क्या होते है वहां पुलिस स्टेशन? / क्या बने हैं कानून और अदालतें?

बलात्कार जैसी घटनाओं से व्यथित मन आखिर पूछ ही बैठता है -- प्रलय बाकी है ? इसी संदर्भ में एक कली भी उनकी सशक्त रचना है --

खिलती है वो कली भी  /पर इस हद  तक कि  / एक एक पंखुरी झड़ कर  / गिर जाती है भू पर  / जुदा हो कर  / अपनी शाख से ....

नारी विमर्श पर शिखा अपनी रचनाओं से एक अलग ही दृष्टिकोण रखती हैं ..... हे स्त्री ,  नारी , सौदा इसी क्रम  में ऐसी कुछ रचनाएँ हैं जो मन पर अमिट छाप छोड़ती हैं ....

ज़िंदगी पर अपना उनका एक फलसफा है जो उनकी बहुत सी रचनाओं में झलकता है -

तराजू के दो पलड़ों सी हो गई है जिंदगी.
एक में संवेदनाएं है दूसरे में व्यावहारिकता॥
****************
अपनी जिंदगी की
सड़क के
किनारों पर देखो
मेरी जिंदगी के
सफ़े बिखरे हुए पड़े हैं
**********
काश जिन्दगी में भी
गूगल जैसे ऑप्शन होते
जो चेहरे देखना गवारा नहीं
उन्हें "शो नैवर" किया जा सकता
और अनावश्यक तत्वों को "ब्लॉक "

इस क्षणिका में सोशल साइट्स का प्रभाव बहुत सहजता से ज़िंदगी में उतार दिया है ...

ऐसी ही कुछ रचनाएँ हैं -- करवट लेती ज़िंदगी  , किस रूप में चहुं तुझे मैं , धुआँ  - धुआँ ज़िंदगी  , एक नज़र ज़िंदगी  , भीड़ , पर्दा धूप पे -- जो ज़िंदगी  की हकीकत से रु ब रु कराती हैं । 

ज़िंदगी पर जिस यथार्थता से शिखा की कलम चली है उतनी ही बेबाकी से प्रेम पर भी बहुत कुछ लिखा है .... वैसे भी कवि हृदय में प्रेम का एक विशिष्ट स्थान होता है और इसे शिखा ने अपने अनुभव से और भी विशिष्ट बना दिया है उनकी कुछ रचनाएँ सच ही मन को भावुक कर जाती हैं ... इस शृंखला में मुझे इनकी पुरानी कमीज़  , अब और क्या ?  , ऐ  सुनो बहुत पसंद आयीं ... पुरानी कमीज़ की जगह नयी कमीज़ आ जाती हैं लेकिन शिखा का प्रेम पुरानी कमीज़ के बिम्ब से पहले जैसा ही बना रहता है।  ऐसे ही सब कुछ अर्पण करने के बाद वह सोचती हैं कि अब और क्या अर्पण करूँ ।

रूह अर्पितजान अर्पित
जिस्म में चलती सांस अर्पित
कर दिए सारे अरमान अर्पित
अब और क्या मैं अर्पण करूँ।

सामाजिक सरोकारों से और अपनी मिट्टी से जुड़ी शिखा का मन अमृत रस जैसी कविता के माध्यम से बरस जाता है  जिसमें वर्षा को देख किसान खुश है और सोच रहा है कि इस साल बेटी के हाथ पीले कर देगा .... यतीम , उसका - मेरा  चाँद बच्चों की मासूमियत को कहती बेहतरीन रचनाएँ हैं । 
अपने ख़यालों को , खुद से अनुभव हुये अहसासों को भी उन्होंने  इस पुस्तक में शामिल किया है बर्फ के फाहे , यूं ही कभी कभी , गूंगा चाँद , ख्याली मटरगश्ती , रुकते - थमते से कदम , अपने हिस्से का आकाश ऐसी कुछ कवितायें हैं जो शिखा के मन के अंतर द्वंद्व  को बखूबी कहती हैं ।

भले ही कितना ही मन भावुक हो पर उम्मीद का साथ उनके साथ हमेशा बना रहता है - उम्मीदों  का सूरज , एक बुत मैडम तुसाद में , आज इन बाहों में , चाँद और मेरी गांठ , सीले सपने , उड़ान , उछलूं लपकूँ और छू लूँ  कुछ रचनाएँ हैं जो सकारात्मक सोच को दिखाती हैं । 

कुल मिला कर यह काव्य संग्रह हर रस को आप्लावित करता है माँ को समर्पित उनकी रचनाएँ ... मैं तेरी परछाईं हूँ  और तुझ पर क्या लिखूँ  ऐसी  रचनाएँ हैं जो मन पर गहरा प्रभाव डालती हैं साथ ही पिता के स्नेह में डूबी कवयित्री पुकार उठती है - पापा तुम लौट आओ न ... ।

मन का प्रतिबिंब पढ़ते हुये एक काल्पनिक इन्द्र धनुष प्रकट हो जाता है  जिसमें हर रंग समाया हुआ है .... आशा है इसी तरह के अनुभव हर पाठक महसूस करेगा । पुस्तक को सुरुचि पूर्ण सजाया गया है । कवर पृष्ठ शिखा कि बेटी सौम्या  द्वारा बनाया गया है जो बहुत सुंदर है और इससे यह भी पता चलता है कि उनका परिवार भी उनके कार्यों में रुचि लेता है । शिखा की कविताओं की भाषा सहज , सरल और ग्राह्य है जो हर पाठक को बहुत अपनी सी लगती है ... भले ही हिन्दी विद्व इसे उसकी कमी कहें पर जो कविता पाठकों के हृदय को छू  ले वही असल में रचनाकार का धर्म है । और यह काव्य संग्रह इस बात पर खरा उतरता है । 
मन के प्रतिबिंब के लिए मैं  शिखा को बहुत बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ ।



पुस्तक का नाम ---- मन के प्रतिबिंब 
कवयित्री  --- शिखा वार्ष्णेय
पुस्तक का मूल्य - हार्ड बाउंड 170/- और पेपर बैक 100/- रु है जो क्रमश: 10% और 20% की छूट पर उपलब्ध है. 
पृष्ट संख्या - १०४ 
पुस्तक आपको VPP द्वारा भेजी जाएगी.
Subhanjali Prakashan
28/11, Ajitganj Colony, T. P. Nagar, Kanpur-208023, 
Email : subhanjaliprakashan@gmail.com
Mobile : 09452920080

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अनुभूति .... / पुस्तक परिचय / अनुपमा त्रिपाठी

>> Monday, June 25, 2012



कुछ समय पूर्व  मुंबई प्रवास के दौरान अनुपमा त्रिपाठी जी से मिलने का मौका मिला ।उन्होने मुझे अपनी दो पुस्तकें  प्रेम सहित भेंट कीं । जिसमें से एक तो साझा काव्य संग्रह है –“ एक सांस मेरी “ जिसका  सम्पादन सुश्री  रश्मि प्रभा  और श्री  यशवंत माथुर ने किया है ...इस पुस्तक के बारे में  फिर कभी .....

आज मैं आपके समक्ष लायी हूँ अनुपमा जी  की पुस्तक अनुभूति का परिचय । अनुभूति से पहले थोड़ा सा परिचय अनुपमा जी का ... उनके ही शब्दों में --- ज़िंदगी में समय से वो सब मिला जिसकी हर स्त्री को तमन्ना रहती है.... माता- पिता की दी हुयी शिक्षा , संस्कार  और अब मेरे पति द्वारा दिया जा रहा वो सुंदर , संरक्षित जीवन जिसमें वो एक स्तम्भ की तरह हमेशा साथ रहते हैं .... दो बेटों की माँ  हूँ और अपनी घर गृहस्थी में लीन .... माँ संस्कृत की ज्ञाता थीं उन्हीं की हिन्दी साहित्य की पुस्तकें पढ़ते पढ़ते हिन्दी साहित्य का बीज हृदय में रोपित हुआ  और प्रस्फुटित हो पल्लवित हो रहा है ... “

साहित्य के अतिरिक्त इनकी रुचि गीत संगीत और नृत्य  में भी है । इन्होने शास्त्रीय संगीत और सितार की शिक्षा ली है । श्रीमती सुंदरी शेषाद्रि से भारतनाट्यम सीखा । युव वाणी : आल इंडिया रेडियो और जबलपुर आकाशवाणी से भी जुड़ी । 2010  में मलेशिया  के टेम्पल  ऑफ फाइन आर्ट्स  में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी दी .... आज भी नियमित शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम  देती रहती हैं .....
इनकी रचनाएँ पत्रिकाओं में भी स्थान पा चुकी हैं ....

अनुभूति पढ़ते हुये अनुभव हुआ कि अनुपमा जी जीवन के प्रति बहुत सकारात्मक दृष्टिकोण  रखती हैं  .....   अपनी बात में वो लिखती हैं ---

जाग गयी चेतना
अब मैं देख रही प्रभु लीला
प्रभु लीला क्या , जीवन लीला
जीवन है संघर्ष तभी तो
जीवन का ये महाभारत
युद्ध के रथ पर
मैं अर्जुन तुम सारथी मेरे
मार्ग दिखाना
मृगमरीचिका नहीं
मुझे है जल तक जाना ।

इस पुस्तक में उनकी कुल 38 कवितायें प्रकाशित हैं .... सुश्री रश्मि प्रभा जी ने अनुपमा जी की पुस्तक के लिए शुभकामनायें प्रेषित करते हुये लिखा है --- " पल पल साँसों के क्रम में हम कभी इस देहरी से उस देहरी , इस चाहत से उस चाहत गुज़रते हैं - कभी होती हैं आँखें नम, कभी एक मुस्कान पूर्णता बन जाती है । भिन्न भिन्न रास्तों  से  भिन्न भिन्न अस्तित्व । रचनाओं की बारीकी कहती है कि अनुपमा जी ने इस अस्तित्व को जीवंत किया है । "
सभी कवितायें पढ़ कर एक सुखद एहसास हुआ कि  कहीं भी कवयित्रि के मन में नैराश्य  का भाव नहीं है .... हर रचना में जीवन  में आगे बढ़ने की ललक और परिस्थितियों  से संघर्ष करने का उत्साह दिखाई देता है

मंद मंद था हवा का झोंका
हल्की सी थी तपिश रवि की
वही दिया था मन का मेरा
जलता जाता
जीवन ज्योति जलाती जाती
चलती जाती धुन में अपनी
गाती जाती बढ़ती जाती ।

कवयित्री  क्यों कि  संगीत से बेहद जुड़ी हुई हैं तो बहुत सी कविताओं में विभिन्न रागों का ज़िक्र भी आया है ... राग के नाम के साथ जिस समय के राग हैं उसी समय को भी परिलक्षित किया है ..... कहीं कहीं रचना में शब्द ही संगीत की झंकार सुनाते प्रतीत होते हैं ---

जंगल में मंगल हो कैसे
गीत सुरीला संग हो जैसे
धुन अपनी ही राग जो गाये
संग झाँझर झंकार सुनाये
सुन सुन विहग भी बीन बजाए
घिर घिर  बादल रस बरसाए
टिपिर टिपिर सुर ताल मिलाये ।

ईश्वर के प्रति गहन आस्था इनकी  रचनाओं में देखने को मिलती है ---

प्रभु मूरत बिन /चैन न आवत /सोवत खोवत / रैन गंवावत /
या ---
बंसी धुन मन मोह लयी /सुध बुध मोरी बिसर गयी /
या
प्रभु प्रदत्त / लालित्य से भरा ये रूप / बंद कली में मन ईश स्वरूप ।

कहीं कहीं कवयित्रि आत्ममंथन करती हुई दर्शनिकता का बोध भी कराती है

जीवन है तो चलना है / जग चार दिनों का मेला है / इक  रोज़ यहाँ ,इक रोज़ वहाँ / हाँ ये ही रैन बसेरा है ।
सामाजिक सरोकारों को भी नहीं भूली हैं । प्रकृति प्रदत्त रचनाओं का भी समावेश है ---- आओ धरा  को स्वर्ग बनाएँ 

कविताओं की विशेषता है कि  पढ़ते पढ़ते जैसे मन खो जाता है और रचनाएँ आत्मसात सी होती जाती हैं .... कोई कोई रचनाएँ संगीत की सी तान छेड़ देती हैं लेकिन कुछ रचनाएँ ऐसी भी हैं जिनमे गेयता का अभाव है ... लेकिन मन के भावों को समक्ष रखने में पूर्णरूप से सक्षम है । पुस्तक का आवरण  पृष्ठ सुंदर है .... छपाई स्पष्ट है .... वर्तनी अशुद्धि भी कहीं कहीं दिखाई दी .... ब्लॉग पर लिखते हुये  ऐसी अशुद्धियाँ नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं  लेकिन पुस्तक में यह खटकती हैं .... प्रकाशक क्यों कि  हमारे ब्लॉगर साथी ही हैं  इस लिए उनसे विनम्र  अनुरोध है  इस ओर थोड़ी सतर्कता बरतें ।

कुल मिला कर यह पुस्तक पठनीय और सुखद अनुभूति देने वाली है .... कवयित्री को मेरी बधाई और शुभकामनायें ।


पुस्तक का नाम अनुभूति

रचना कार --     अनुपमा त्रिपाठी

पुस्तक का मूल्य – 99 / मात्र

आई  एस बी एन – 978-81-923276-4-8

प्रकाशक ज्योतिपर्व प्रकाशन / 99, ज्ञान खंड -3 इंदिरापुरम / गाजियाबाद – 201012










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सोने का पिंजर ... अमेरिका और मैं ...

>> Tuesday, November 1, 2011

ajeet gupta

सोने का पिंजर ... अमेरिका और मैं ...
पिछले कुछ दिनों पूर्व मुझे डा० अजीत गुप्ता जी द्वारा लिखी यह पुस्तक पढने को मिली ... पुस्तक को पढते हुए लग रहा था कि सारी घटनाएँ मेरे सामने ही उपस्थित होती जा रही हैं ..यह पुस्तक उन लोगों को दिग्भ्रमित होने से बचाने  में सहायक हो सकती है जो अमेरिका के प्रति भ्रम पाले हुए हैं .निजी अनुभवों पर लिखी यह एक अनूठी  कृति है .
" अपनी बात " में कथाकार लिखती हैं कि उन्हें आठवें विश्व हिंदी सम्मलेन में भाग लेने के लिए अमेरिका जाने का सुअवसर मिला .. उनको देखने से ज्यादा देश को समझने की चाह थी ...रचनाकार के मन में बहुत सारे प्रश्न थे  कि ऐसा क्या है अमेरिका में जो बच्चे वहाँ जा कर वहीं के हो कर रह जाते हैं ..वहाँ का जीवन श्रेष्ठ मानते हैं ..माता पिता के प्रति अपने कर्तव्य को भूल जाते हैं .वो अपनी बात कहते हुए कहती हैं कि --" मैंने कई ऐसी बूढी आँखें भी देखीं हैं जो लगातार इंतज़ार करती हैं , बस इंतज़ार | मैंने ऐसा बुढ़ापा भी देखा है जो छ: माह अमेरिका और छ: माह भारत रहने पर मजबूर है . वो अपना दर्द किसी को बताते नहीं ..पर उनकी बातों से कुछ बातें बाहर निकल कर आती हैं ..


अजीत जी का मानना है कि -- अमेरिका नि: संदेह सुन्दर और विकसित देश है .. वो हमारी प्रेरणा तो बन सकता है पर घर नहीं ..
पुस्तक का प्रारंभ संवादात्मक शैली से हुआ है .. कथाकार सीधे अमेरिका से संवाद कर रही हैं ..जब वो बच्चों के आग्रह पर अमेरिका जाने के लिए तैयार हुयीं तो उनको वीजा नहीं मिला .. उस दर्द को सशक्त शब्दों में उकेरा है ...२००२ अप्रेल माह से जाने की  चाह पूरी हुई जुलाई २००७ में  जब  उनको अवसर मिला विश्व हिंदी सम्मलेन में भाग लेने का तब ही वो अमेरिका जा पायीं ..ज़मीन से जुड़े कथानकों  से यह पुस्तक और रोचक हो गयी है .. महानगर और गाँव की  पृष्ठभूमि को ले कर लिखी घटना सोचने पर बाध्य करती है ..
अमेरिका जिन बूढ़े माँ बाप को वीजा नहीं देता उसे भी सही बताते लेखिका हुए कहती हैं  -- " मेरे देश की  लाखों बूढी आँखों को तुमसे शिकायत नहीं है , बस वे तो अपने भाग्य को ही दोष देते हैं . वे नहीं जान पाते कि गरीब को धनवान ने सपने दिखाए हैं , और उन सपनों में खो गए हैं उनके लाडले पुत्र . मैं समझ नहीं पाती थी कि तुम क्यों नहीं आने देते हो बूढ़े माँ बापों को तुम्हारे देश में ? लेकिन तुम्हारी धरती पर पैर रखने के बाद जाना कि तुम सही थे .क्या करेंगे वे वहाँ जा कर ? एक ऐसे पिंजरे में कैद हो जायेंगे जिसके दरवाज़े खोलने के बाद भी उनके लिए उड़ने के लिए आकाश नहीं है ...तुम ठीक करते हो उन्हें अपनी धरती पर न आने देने में ही समझदारी है . कम से कम वे यहाँ जी तो रहे हैं वहाँ तो जीते जी मर ही जायेंगे ...
इस पुस्तक में बहुत बारीकी से कई मुद्दों को उठाया है ..जैसे सामाजिक सुरक्षा के नाम पर टैक्स वसूल करना ..बूढ़े माता पिता की  सुरक्षा करना वहाँ की  सरकार का काम है .. भारतीयों से भी यह वसूल किया जाता है पर उनके माता पिता को वहाँ बसने की  इजाज़त नहीं है ... वरना सरकार का कितना नुकसान हो जायेगा ...यहाँ माता पिता क़र्ज़ में डूबे हुए अपनी ज़िंदगी बिताते हैं ..
अमेरिका पहुँच कर होटल में कमरा लेने और भोजन के लिए क्या क्या पापड़ बेलने पड़े वो सब विस्मित करता है ..
पूरी पुस्तक  में भारत और अमेरिका को रोचक अंदाज़ में लिखा है ..अमेरिका की अच्छाइयां हैं तो भारत भी बहुत चीजों में आगे है ..
अपने अमेरिका प्रवास  के अनुभवों को बाँटते हुए यही कहने का प्रयास किया है कि हम भारतीय जिस हीन भावना का शिकार हो जाते हैं  ऐसा कुछ नहीं है अमेरिका में ... वो तो व्यापारी है ..जब तक उसे लाभ मिलेगा वो दूसरे देश के वासियों का इस्तेमाल करेगा ..
इस पुस्तक को पढ़ कर  अमेरिका के प्रति  मन में पाले भ्रम काफी हद तक कम हो सकते हैं ..रोचक शैली में लिखी यह पुस्तक मुझे बहुत पसंद आई ..
पुस्तक का नाम -- सोने का पिंजर .. अमेरिका और मैं
लेखिका --  डा० ( श्रीमती ) अजीत गुप्ता
प्रकाशक --- साहित्य चन्द्रिका प्रकाशन , जयपुर
प्रथम संस्करण -  २००९
मूल्य -- 150 / Rs.
ISBN - 978- 81 -7932-009-9

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