copyright. Powered by Blogger.

वक्त

>> Thursday, December 18, 2008



मैंने -

छोड़ दिया है

ख़ुद को

वक्त के

बेरहम हाथों में ।

चाहती हूँ देखना कि

कितनी बेरहमी करता है

ये वक्त मेरे साथ?

कभी तो थकेगा

वक्त भी ?

उस समय मैं पूछूंगी

वक्त से ---

कि क्या तुम वही वक्त हो????

लेकिन मुझे मालूम है

कि इस प्रश्न का उत्तर

उसके पास नही होगा ।

क्यों --?

क्यों कि शायद

वक्त कभी नही थकता .

Read more...

विश्वास का उजास

>> Wednesday, December 17, 2008


रात कुछ गहरा सी गई है
शहर भी सारा सो सा रहा है
अचानक आता है -
कोई मंजर आंखों के सामने
ऐसा लगता है कि -
कहीं कुछ हो तो रहा है।


सडकों के सन्नाटे में ये
हादसे क्यूँ कर हो रहे हैं ?
प्रगति के साथ - साथ ये
इंसानियत के जनाजे
क्यूँ निकल रहे हैं ?


मनुजता को ही त्याग कर तुम
क्या कभी मनुज भी रह पाओगे?
जाना है कौन सी राह पर ?
क्या मंजिल को भी ढूंढ पाओगे?


भटक गए हैं जो कदम हर राह पर
उन्हें तो तुमको ही ख़ुद रोकना पड़ेगा
रूको और सोचो ज़रा देर -
सही मार्ग तुमको ही चुनना पड़ेगा।


कोई नही है यहाँ उंगली थामने वाला
क्यों कि हाथ तो तुम ख़ुद के काट चुके हो
ठहरो ! और देखो इस चौराहे से
सही राह क्या तुम पहचान चुके हो ?


गर राह सही होगी तो सच में
सोया शहर भी एक दिन जाग जायेगा
गहरी हो रात चाहे जितनी भी
मन में विश्वास का उजास फ़ैल पायेगा.



Read more...

दिल की बात

>> Sunday, December 14, 2008


दीवारों से मैंने अपना
कलाम कह दिया है ,
मैंने सुना है कि
दीवारों के कान होते हैं।
कलाम भी क्या ?
बस यूँ ही
दिल की बात है
हवाएं भी आज - कल कुछ
भीगी - भीगी सी लग रही हैं।
सोच को तो जैसे
पंख लग गए हैं
आसमान के चाँद से
कुछ गुफ्तगू हो रही है।
चाँदनी मुस्कुरा के
कह गई है कानों में
ख्यालों की दूब पर
शबनम बिखरी हुई है।
मोती जो शबनम के मैंने
समेटे अपनी झोली में
धागे में पिरो जैसे
वो एक कविता सी बन गई है।
इस कविता को भी मैं अब
किसको और क्यूँ कर सुनाऊँ
इसिलए मैंने वो सब
दीवारों से कह दिया है।
चाहा - अनचाहा सारा
जज्ब कर लेंगी वो शायद
मैंने तो यूँ कह कर बस
अपना मन हल्का कर लिया है.

Read more...

कश्मकश

>> Saturday, December 13, 2008



यूँ ही चले थे दो कदम तुम्हारे साथ

मंजिल तमाम उम्र हमें ढूँढती रह गई है।


सोचो में तुम , ख्वाहिशों में तुम , ख़्वाबों में तुम

ज़िन्दगी की हर राह जैसे उलझ सी गई है।


उलझन ही होती तो शायद सुलझा भी लेते ,

हर चाह ज़िन्दगी की मध्यम पड़ गई है ।


यूँ तो आसमान के चाँद को सबने चाहा है पाना

पर उस तक की दूरी एक हकीकत बन गई है।


सागर के साहिल पे खड़ी सोचती हूँ अक्सर

लहरों का आना - जाना ही ज़िन्दगी बन गई है।


Read more...

जा रहे हो कौन पथ पर.....??????

>> Tuesday, December 9, 2008


ज्ञान चक्षु खोल कर
विज्ञान का विस्तार कर
जा रहे हो कौन पथ पर
देखो ज़रा तुम सोच कर।

कौन राह के पथिक हो
कौन सी मंजिल है
सही डगर के बिना
मंजिल भी भटक गई है।

अस्त्र - शस्त्र निर्माण कर
स्वयं का ही संहार कर
क्या चाहते हो मानव ?
इस सृष्टि का विनाश कर ।

विज्ञान इतना बढ़ गया
विनाश की ओर चल दिया
धरा से भी ऊपर उठ
ग्रह की ओर चल दिया ।

हे मनुज ! रोको कदम
स्नेह से भर लो ये मन
लौट आओ उस पथ से
हो रहा जहाँ मनुष्यता का पतन।

Read more...

हमारी वाणी

www.hamarivani.com

About This Blog

आगंतुक


ip address

  © Blogger template Snowy Winter by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP