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ईमानदारी से

>> Tuesday, April 12, 2011



ईमानदारी से
चाहती हूँ कहना
कि
मैं ईमानदार नहीं.
क्यों कि
जो कहती हूँ
वो करती नहीं
जो सोचती हूँ
वो होता नहीं
जो होता है
वो चाहती नहीं .
इसी ऊहापोह में
जीती चली जाती हूँ
क्षण - प्रतिक्षण
परिस्थितियों में
ढलती चली जाती हूँ.
 
जो बदल जाये
वक़्त के साथ
तो बताओ
वो कैसे
रह पायेगा ईमानदार
खुद की सोचों पर भी
बिठा  देती हूँ कभी - कभी
अनदेखा पहरेदार
और मान लेती हूँ
कि
ज़िन्दगी जी रही हूँ.
जब कि जानती हूँ
कि
पल पल मर रही हूँ.
इसीलिए 
कहती हूँ ईमानदारी से
कि
मैं ईमानदार नहीं .

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झरोखा ..

>> Tuesday, April 5, 2011




कोई भी रिश्ता बनते ही 
खड़ी हो जाती हैं 
उसके चारों ओर 
कई अदृश्य दीवारें ,

बिना दीवारों के 
रिश्तों की कोई 
अहमियत भी तो नहीं 

पर मात्र दीवारों पर 
डाल कर अपने 
नेह की चादर 
सोच लिया जाए कि 
बन गयी है छत 
और मुकम्मल हो गया 
रिश्तों का मकाँ
तो होगी शायद 
सबसे बड़ी भूल 

क्योंकि - 
हर रिश्ता 
जीने के लिए 
उसमें ज़रूरी है 
एक झरोखे का होना .


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..................................ज़रूरी था ...

>> Wednesday, March 23, 2011




आज मैंने 
सारी संवेदनाओं को 
लपेट दिया है 
कफ़न में ,
और साथ में 
रख दिया है 
मन के ताबूत में 
अपनी सारी 
ख्वाहिशों को, 
ख्यालात  को, 
खुशी को, 
जज़्बात को, 
या यूँ कहूँ कि
सारे एहसासात को 
और फिर तुमने 
अपने शब्दों के 
हथौड़े से 
ठोक डालीं थी 
उसमें कीलें .

ज़रूरी था इन सबको 
ताबूत में रखना 
क्यों कि 
मरे हुए को 
यूँ ही नहीं छोड़ा जाता ...

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घने शैवाल

>> Thursday, March 10, 2011

Lights, clouds and sea


मन के समंदर में 
न जाने कितने 
घने शैवाल  हैं 
दिखते तो नहीं 
पर ढकी है 
पूरी तलहटी 
इनके फैलाव से 
मेरे अंतर्मन का सच भी 
जैसे छिप सा  गया है 
मोती भरे सीप भी 
दिखते नहीं आज -कल 
तुम तैरना तो जानते हो 
पर गोताखोर नहीं हो 
शैवालों में उलझ 
लौट आते हो 
बार - बार साहिल पर 
काश होते गोताखोर तो 
ढूँढ ही लाते कोई मोती 
जिसे देख  मेरे मन पर 
छाई शैवाल की परत 
कुछ तो हल्की  होती .

Eelgrass At Low Tide

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नन्हा दार्शनिक

>> Thursday, March 3, 2011






भावनाओं को सहेज 
जब भी चाहती हूँ 
उन्हें शब्दों में उकेरना 
तो सुनाई दे जाती है 
नन्हे की  उआं  उआं 
छिन्न - भिन्न हो जाता है 
सारा शब्द जाल 
और मैं 
मोहपाश में बंधी 
उठा लेती हूँ उसे गोद में .



जब हो जाता है चुप वो 
तो कयास लगाती हूँ 
कि - याद आ रही थी दादी की
और यदि रोता रहता है तो 
कह देती हूँ -
गुस्सा है दादी से 


हम ऐसे ही ज़िंदगी  भर 
लगाते रहते हैं कयास 
अपने मन- माफिक 
बच्चे के साथ बतियाते हुए 
लगता है कि 
सबसे ज्यादा दार्शनिक 
एक बच्चा होता है 
अच्छी - बुरी बातों से अनभिज्ञ 
जिसको जो सोचना है सोचे 
कहीं भी एक टक देखते हुए 
कभी भी मुस्कुरा दिया ,
तो कभी मुँह बिसूर दिया 
दुनिया के छल - प्रपंच से रहित 
गर बनना है दार्शनिक तो 
एक बच्चा बन कर देखो ..

.

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हमारी वाणी

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