लो बरखा बहार आई
>> Monday, July 11, 2011
अम्बुद से झर झर कर
अम्बु बूँद आती है
धरती की ज्वाला को
शीतल कर जाती है
चहुँ ओर धरा पर
तब हरीतिमा छायी
लो देखो देखो अब
बरखा बहार आई
अम्बु बूँद आती है
धरती की ज्वाला को
शीतल कर जाती है
चहुँ ओर धरा पर
तब हरीतिमा छायी
लो देखो देखो अब
बरखा बहार आई
पात पात सब
धुले धुले से हैं
कलरव करते पंछी
उन्मुक्त हुए से हैं
प्रकृति भी अब
भीग भीग मुस्काई
लो देखो देखो
बरखा बहार आई .
थे जो सूखे ताल-तलैया
अब जल से प्लावित हैं
बाल वृन्द भी देखो
अपनी नावों के नाविक हैं
कितनी ही कागज़ की नावें
पोखर में हैं तैराई
लो देखो देखो
बरखा बहार आई .
रिम झिम रिम झिम सी फुहार
बिरहन की आँखों ने बरसाई
तीव्र वेदना की लकीर
उसके चेहरे पर खिंच आई
प्रिय मिलन की आशा में
उसकी आँखें भी मुस्काईं
लो देखो देखो अब
बरखा बहार आई ..




