उम्मीद और वेदना ....
>> Thursday, July 21, 2011
अपेक्षाओं और
दायित्वों के बीच
झूलता जीवन
बन जाता है
उपेक्षा का पात्र ,
इसीलिए मैं ,
तोड़ देना चाहती हूँ
वो सारी उम्मीदें
जो किसी ने भी
कभी भी करीं थीं
मुझसे ,
क्यों कि,
मैं जानती हूँ
उम्मीद ही है
जो जन्म देती हैं
तृष्णाओं को ,
निराशा को ,
यहाँ तक कि
गहन वेदना को .
नहीं चाहती मैं
कि कोई भी
हो व्यथित
मेरे कारण
और लगाए
मुझसे कोई उम्मीद ...




