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..................................ज़रूरी था ...

>> Wednesday, March 23, 2011




आज मैंने 
सारी संवेदनाओं को 
लपेट दिया है 
कफ़न में ,
और साथ में 
रख दिया है 
मन के ताबूत में 
अपनी सारी 
ख्वाहिशों को, 
ख्यालात  को, 
खुशी को, 
जज़्बात को, 
या यूँ कहूँ कि
सारे एहसासात को 
और फिर तुमने 
अपने शब्दों के 
हथौड़े से 
ठोक डालीं थी 
उसमें कीलें .

ज़रूरी था इन सबको 
ताबूत में रखना 
क्यों कि 
मरे हुए को 
यूँ ही नहीं छोड़ा जाता ...

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घने शैवाल

>> Thursday, March 10, 2011

Lights, clouds and sea


मन के समंदर में 
न जाने कितने 
घने शैवाल  हैं 
दिखते तो नहीं 
पर ढकी है 
पूरी तलहटी 
इनके फैलाव से 
मेरे अंतर्मन का सच भी 
जैसे छिप सा  गया है 
मोती भरे सीप भी 
दिखते नहीं आज -कल 
तुम तैरना तो जानते हो 
पर गोताखोर नहीं हो 
शैवालों में उलझ 
लौट आते हो 
बार - बार साहिल पर 
काश होते गोताखोर तो 
ढूँढ ही लाते कोई मोती 
जिसे देख  मेरे मन पर 
छाई शैवाल की परत 
कुछ तो हल्की  होती .

Eelgrass At Low Tide

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नन्हा दार्शनिक

>> Thursday, March 3, 2011






भावनाओं को सहेज 
जब भी चाहती हूँ 
उन्हें शब्दों में उकेरना 
तो सुनाई दे जाती है 
नन्हे की  उआं  उआं 
छिन्न - भिन्न हो जाता है 
सारा शब्द जाल 
और मैं 
मोहपाश में बंधी 
उठा लेती हूँ उसे गोद में .



जब हो जाता है चुप वो 
तो कयास लगाती हूँ 
कि - याद आ रही थी दादी की
और यदि रोता रहता है तो 
कह देती हूँ -
गुस्सा है दादी से 


हम ऐसे ही ज़िंदगी  भर 
लगाते रहते हैं कयास 
अपने मन- माफिक 
बच्चे के साथ बतियाते हुए 
लगता है कि 
सबसे ज्यादा दार्शनिक 
एक बच्चा होता है 
अच्छी - बुरी बातों से अनभिज्ञ 
जिसको जो सोचना है सोचे 
कहीं भी एक टक देखते हुए 
कभी भी मुस्कुरा दिया ,
तो कभी मुँह बिसूर दिया 
दुनिया के छल - प्रपंच से रहित 
गर बनना है दार्शनिक तो 
एक बच्चा बन कर देखो ..

.

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उतरा चाँद मेरे आँगन

>> Wednesday, February 16, 2011

कुछ दिनों से अपने इस प्यारे ब्लॉग जगत से अनुपस्थित रही हूँ ..कुछ लोग इसका कारण जानते हैं शायद और बहुत से लोग नहीं ..जो नहीं जानते वे सोच रहे होंगे की शायद मैं  ब्लॉग जगत छोड़ कर चली गयी  ..या फिर सोच रहे होंगे कि अब कुछ बचा नहीं होगा लिखने को ... कब तक कवितायेँ ठेलेंगी.परन्तु ऐसा कुछ नहीं है आपलोगों को झेलना तो पड़ेगा ही ..हम यहीं हैं और फिलहाल कहीं जाने वाले नहीं ..हाँ कविताओं के लिए अब तो एक बहुत ही प्यारी और नन्ही सी प्रेरणा भी मिल गई है ..मैं एक नन्हें मुन्ने की दादी बन गई हूँ और उसी की सेवा टहल में व्यस्त हूँ .अब फिर से लौटने की कोशिश कर रही हूँ.. आशा है आप मेरे " बेटू  " को अपने आशीर्वचन से जरुर नवाजेंगे .और मेरी अनुपस्थिति के लिए मुझे क्षमा कर देंगे.  





फ़लक के तारों को देख 
जागती थी तमन्ना  
कोई एक सितारा 
मेरे आँगन में भी उतरे

उतर आया है पूरा चाँद 
मेरी बगिया में 
और रोशन हो गयी है 
मेरी बाड़ी उसकी चांदनी से 

चमक गया है हर पल जैसे 
मेरे धूमिल पड़े जीवन का 
मिल गया है मकसद  जैसे 
मुझे अपनी ज़िंदगी का .

मेरी ज़िंदगी की धुरी का वो 
केन्द्र  बन गया है 
मेरे घर एक नन्हा सा 
फरिश्ता  आ गया है ....




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अल्हड़ सपने

>> Friday, February 4, 2011




पाना क्या शेष रहे  जब 
मन को मन का उपहार मिले 
वीणा के झंकृत तारों से  जब 
गीत मिले और साज मिले .

आँखों में हों कितने सपने 
और मन पंछी सा  उड़ता हो 
मंद पवन के झोंके से जब 
जलतरंग सा  बजता हो .

नयी डगर पर पग रखते 
सम्मुख कई प्रश्न आ जाते हैं 
उत्तर की चाहत में बस 
पल यूँ ही व्यतीत हो जाते हैं .

सागर सी  गहराई हो  , जब 
नाम जलधि का रखा है 
डूबूँ मैं इसमें और बस 
हाथ में मोती  आ जाये .



पाना क्या शेष रहे  जब 
मन को मन का उपहार मिले 
वीणा के झंकृत तारों से  जब 
गीत मिले और साज मिले .


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