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कश्मकश

>> Saturday, December 13, 2008



यूँ ही चले थे दो कदम तुम्हारे साथ

मंजिल तमाम उम्र हमें ढूँढती रह गई है।


सोचो में तुम , ख्वाहिशों में तुम , ख़्वाबों में तुम

ज़िन्दगी की हर राह जैसे उलझ सी गई है।


उलझन ही होती तो शायद सुलझा भी लेते ,

हर चाह ज़िन्दगी की मध्यम पड़ गई है ।


यूँ तो आसमान के चाँद को सबने चाहा है पाना

पर उस तक की दूरी एक हकीकत बन गई है।


सागर के साहिल पे खड़ी सोचती हूँ अक्सर

लहरों का आना - जाना ही ज़िन्दगी बन गई है।


1 comments:

taanya 12/15/2008 4:18 PM  

sangeeta ji as usual once again a nice poem..
सोचो में तुम , ख्वाहिशों में तुम , ख़्वाबों में तुम
ज़िन्दगी की हर राह जैसे उलझ सी गई है।

bt jb sb jageh vo he to fir zindgi kyu ulajh si gayi?????


यूँ तो आसमान के चाँद को सबने चाहा है पाना
पर उस तक की दूरी एक हकीकत बन गई है।

ye sher mujhe sabse jyada pasand aaya...
ek steek sachaayi...ki us tak ki duri..ek hakiqat ban gayi he...

सागर के साहिल पे खड़ी सोचती हूँ अक्सर
लहरों का आना - जाना ही ज़िन्दगी बन गई है।

sahi kehti hai aap shayed...lehro ka aana-janna hi zindgi ban gayi hai..

nice sharing...aage b intzaar rahega..

shubhkaamnaao ke saath izazet

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