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जीवन फूल और नारी का

>> Wednesday, January 27, 2010






जब - जब नारी की तुलना



फूलों से की जाती है


तब - तब ये छवि


मन में उभर आती है।


कि सच ही - नारी


फूलों की तरह कोमल है


फूलों की तरह मुस्कुराती है


लोगों में हर दिन


जीने का उत्साह जगाती है


एक मुस्कराहट से


सबके जीवन में


नया उत्साह ले आती है।






पर जब फूलों की तुलना


नारी से की जाती है


तब फूल के मन में


ये बात आती है


हम फूल मुस्कुराते हैं


हर सुबह


जीने का उत्साह जगाते हैं


पर हम नारी की तरह


कहाँ हो पाते हैं।





नारी तो अगले दिन फिर


जीने का उत्साह जगाती है


हम तो एक ही दिन में


निढाल हो मुरझा कर


टहनी से टूट बिखर जाते हैं.
 

24 comments:

अजय कुमार 1/27/2010 12:09 PM  

नारी तो अगले दिन फिर


जीने का उत्साह जगाती है


हम तो एक ही दिन में


निढाल हो मुरझा कर


टहनी से टूट बिखर जाते हैं

कमाल की लाइनें , सच्ची और शानदार रचना

महफूज़ अली 1/27/2010 12:30 PM  

बहुत ही सुंदर पंक्तियों के साथ ..... सचमुच बहुत सुंदर रचना.....

शोभना चौरे 1/27/2010 12:43 PM  

vah sangeetaji
bahut khubsurat tulna do khubsurat vishishto ki .
bahoot hi aachhi lgi .

दिगम्बर नासवा 1/27/2010 12:43 PM  

सच कहा ........ नारी बहुत जीवट है ......... सूरज की तरह ताज़गी बही रहती है उसके आचरण में .... ऊर्जा होती है पुर परिवार की ..........

संजय भास्कर 1/27/2010 12:45 PM  

बहुत ही सुन्‍दर भाव लिये हुये अनुपम प्रस्‍तुति ।

shikha varshney 1/27/2010 1:32 PM  

oyeeeeeeeeeee...kya baat keh di bhai...ab to naree hone par fakr hone laga :) to tasveer bhi gazab hai..gahan chintan di ! bahut sunder

Tarkeshwar Giri 1/27/2010 1:36 PM  

सचमुच नारी और फूल दोनों ही ईश्वर की बहुमूल्य देन है, और किसी न किसी रूप में दोनों ही पूज्यनीय है।

सुन्दर कविता के लिए धन्यवाद्।

Tarkeshwar Giri 1/27/2010 1:37 PM  

सचमुच नारी और फूल दोनों ही ईश्वर की बहुमूल्य देन है, और किसी न किसी रूप में दोनों ही पूज्यनीय है।

सुन्दर कविता के लिए धन्यवाद्।

Apanatva 1/27/2010 3:32 PM  
This comment has been removed by the author.
Apanatva 1/27/2010 3:32 PM  

wah kis andaz me phool kee vyatha bata dee aapane...

Bahut sunder rachana..........

NAREE KE KAI ROOP HAI .
KABHEE NAJUK TO KABHEE CHATTAN JAISEE ATALTA .

वन्दना 1/27/2010 4:33 PM  

waah waah........bahut hi gahanta aur sundarta ke sath aapne nari aur phool ke jeevan ko chitrit kiya hai.......badhayi

अनामिका की सदाये...... 1/27/2010 6:49 PM  

इतना आसान भी नहीं
नारी सा बनना
खुद को मार कर
अंतस को जला कर
दुसरो को ख़ुशी देती है
अपने अश्को के तेल से
हर दिन को उजाले देती है
तब जा के एक नारी
नारी रूप लेती है
कैसे बने वो सिर्फ एक फूल
अपनी कलियों को भी तो
वो ही जीवन देती है
घर भर की खुशबु
की खातिर
खुद हिना बन कर,
पिस कर तब कही
वो जिन्दगी को
महका पाती है
तब जा के एक नारी
नारी रूप लेती है

संगीता जी आपकी कविता पढ़ कर यही पंक्तिया मेरे मन में उठी जो आपके समक्ष रख दी...उमीद है पसंद करेंगी.

sangeeta swarup 1/27/2010 6:59 PM  

आप सभी का बहुत बहुत आभार. आपकी टिप्पणियां ही प्रोत्साहन देती हैं...शुक्रिया

अनामिका जी,

आपने बहुत सुन्दर पंक्तियाँ लिखीं हैं...बहुत बहुत शुक्रिया....

मैंने भी कुछ ऐसा ही कहने का दू:साहस किया था की नारी को तो हर वक्त नया रूप लेना पड़ता है....जो खुशियाँ वो देती है उसके पीछे उसके कितने दर्द होते हैं...ये दिखाई नहीं देते...विस्तृत विवेचना के लिए आभार...

निर्मला कपिला 1/27/2010 7:20 PM  

नारी की जीवटता को बहुत सुन्दर शब्दों मे ढाला है सही मे हमे तो नारी होने पर गर्व है। बधाई इस रचना के लिये

मनोज कुमार 1/27/2010 9:32 PM  

आपकी कविता पढ़ने पर ऐसा लगा कि आप बहुत सूक्ष्मता से एक अलग धरातल पर चीज़ों को देखती हैं।

Mithilesh dubey 1/27/2010 11:38 PM  

क्या बात है , लाजवाब लिखा है आपने ।

rashmi ravija 1/28/2010 12:19 AM  

बहुत ही गहरी बात कह दी आपने तो...सच है....नारी रोज नया उत्साह लेकर आती है....रोज कुम्हलाती है..और फिर नवजीवन का संचार कर देती है,सबमे ...बहुत सुन्दर

Udan Tashtari 1/28/2010 7:13 AM  

बहुत बेहतरीन रचना! अच्छा लगा पढ़कर!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 1/28/2010 9:51 AM  

आपका पोस्ट पढ़कर तो आनन्द आ गया!
इसे चर्चा मंच में भी स्थान मिला है!
http://charchamanch.blogspot.com/2010/01/blog-post_28.html

sangeeta swarup 1/28/2010 12:21 PM  

आप सबके दिए हुए प्रोत्साहन के लिए आभार...

शास्त्री जी,

आपकी शुक्रगुजार हूँ जो आपने इसे चर्चा में शामिल किया....इस बार चर्चा टिप्पणियों के साथ मन को बहुत भाई. शुक्रिया

रचना दीक्षित 1/28/2010 2:53 PM  

नारी तो अगले दिन फिर
जीने का उत्साह जगाती है
हम तो एक ही दिन में
निढाल हो मुरझा कर
टहनी से टूट बिखर जाते हैं

एक अलग और अच्छी सोच के साथ सार्थक कविता

Shefali Pande 1/28/2010 5:29 PM  

bahut umda rachna hai...sangeeta ji...badhaai

shama 1/30/2010 2:04 PM  

Pahali baar aapke blogpe aayi hun...abhi any blog dekhne hain!Jab ye itna sundar hai,to any bhi aisehee honge!

Chegvewara Raghuvanshi 4/03/2013 2:25 PM  

नारी अद्भूत उर्जा है

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