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है चेतावनी !......

>> Thursday, May 6, 2010







पुरुष ! तुम सावधान रहना ,

बस है चेतावनी कि

तुम अब ! सावधान रहना .


पूजनीय कह नारी को

महिमा- मंडित करते हो

उसके मान का हनन कर

प्रतिमा खंडित करते हो .

वन्दनीय कह कर उसके

सारे अधिकारों को छीन लिया

प्रेममयी ,वात्सल्यमयी कह

तुमने उसको दीन किया .

पर भूल गए कि नारी में



एक शक्ति - पुंज जलता है

उसकी एक नज़र से मानो

सिंहांसन भी हिलता है.


तुम जाते हो मंदिर में

देवी को अर्घ्य चढाने

उसके चरणों की धूल ले

अपने माथे तिलक सजाने

घंटे - घड़ियाल बजा कर तुम

देवी को प्रसन्न करते हो

प्रस्तर- प्रतिमा पर केवल श्रृद्धा रख

खुद को भ्रमित करते हो.

पुष्पांजलि दे कर चाहा तुमने कि

देवी प्रसन्न हो जाएँ

जीवन में सारी तुमको

सुख - समृद्धि मिल जाएँ .


घर की देवी में तुमको कभी

देवी का रूप नहीं दिखता ,

उसके लिए हृदय तुम्हारा

क्यों नहीं कभी पिघलता ?

उसकी सहनशीलता को बस

तुमने उसकी कमजोरी जाना

हर पल - हर क्षण तुमने उसको

खुद से कम तर माना..


नारी गर सीता - पार्वती बन

सहनशीलता धरती है

तो उसके अन्दर शक्ति रूप में

काली औ दुर्गा भी बसती है.

हुंकार उठी नारी तो ये

भूमंडल भी डोलेगा

नारी में है शक्ति - क्षमा

पुरुषार्थ भी ये बोलेगा.


इसीलिए -

बस सावधान रहना

अब तुम सावधान रहना .








http://chitthacharcha.blogspot.com/2010/05/blog-post_6139.html


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http://charchamanch.blogspot.com/2010/05/145.html

25 comments:

shikha varshney 5/06/2010 5:48 PM  

warning warning warning .....
वाह वाह वाह दी ! जियो...... मजा ही आ गया ...क्या तेवर हैं और क्या अंदाज सुव्हानाल्लाह...जोश सा आ गया है पड़कर मन कर रहा है लाठी बल्लम लेकर निकल पडूँ हा हा हा....
आज के डिनर कि तो शर्तिया छुट्टी हम तो नहीं बनाने वाले ही ही ही

rashmi ravija 5/06/2010 5:50 PM  

घर की देवी में तुमको कभी

देवी का रूप नहीं दिखता ,

उसके लिए हृदय तुम्हारा

क्यों नहीं कभी पिघलता ?


है कोई जबाब पुरुषों के पास??

हुंकार उठी नारी तो ये

भूमंडल भी डोलेगा

नारी में है शक्ति - क्षमा

पुरुषार्थ भी ये बोलेगा.

इस से अवगत होना बहुत जरूरी है,सबका..
बेहतरीन कविता

AlbelaKhatri.com 5/06/2010 5:59 PM  

नारी तू नारायणी..............
नर तो खर का खर
तू है आदिशक्ति माँ जो चाहे सो कर..............

पी.सी.गोदियाल 5/06/2010 6:01 PM  

पूजनीय कह नारी को

महिमा- मंडित करते हो

उसके मान का हनन कर

प्रतिमा खंडित करते हो .
Bahut Sundar !

Apanatva 5/06/2010 6:13 PM  

are wah........
kavita ka ye roope bahut man bhaya......ye hue na drud bhav........
sakaratmak se bud ye to agressive bhee rahee..........
bahut bahut pasand aaee aapkee ye kavita........

मनोज कुमार 5/06/2010 6:18 PM  

पढ़ने वाले में नैतिक ऊहापोह पैदा करे, तयशुदा प्रपत्तियां हिला दे और यह सिद्ध करे कि सत्य किसी एक व्यक्ति की जेब में पड़ा रुमाल नहीं है, ऐसी रचना कम ही मिलती हैं।
इक्कीसवीं सदी में भी सामंती रूढ़ियों वाले पुरु-प्रधान समाज में नारी के लिए आत्माभिव्यक्ति में कितनी कठिनाई हो सकती है, यह सहज अनुमेय है। फिर भी आपने कविता के माध्यम से जो आवाज उठाई है वह प्रशंसनीय है।
आपकी इस कविता में निराधार स्वप्नशीलता और हवाई उत्साह न होकर सामाजिक बेचैनियां और सामाजिक वर्चस्वों के प्रति गुस्सा, क्षोभ और असहमति का इज़हार बड़ी सशक्तता के साथ प्रकट होता है।

वन्दना 5/06/2010 6:21 PM  

गज़ब कर दिया…………………………बिल्कुल सही चेतावनी दी है……………………आज इसी रूप की जरूरत है ………………जो इन्सान भूल गया है उसे ये बात समझानी जरूरी है…………नारी पूज्या य भोग्या ही नही है वो इन सबसे बढकर है……………………नारी का अपना भी एक अस्तित्व है इन सबसे हट्कर और उसे अब वो लेना आ गया है समाज से लड्ना, अपने लिये जीना आ गया है..........बेहद उम्दा प्रस्तुति।

kshama 5/06/2010 6:29 PM  

Wah! Ye hui na baat! Is deshne naree ko devi kahkar dasee jana hai..hamesha naree purush ke saath har mushkil me khadi ho jati,purush nahi..is baat ke to hamara itihaas aur puran ,dono saakshi hain..!Nari ko devi na samajhen, insaan hi rahne den, yahi bahut hai!

M VERMA 5/06/2010 6:31 PM  

घर की देवी में तुमको कभी
देवी का रूप नहीं दिखता ,
उसके लिए हृदय तुम्हारा
क्यों नहीं कभी पिघलता ?
सार्थक प्रश्न
सुन्दर रचना

अनामिका की सदाये...... 5/06/2010 6:48 PM  

आपकी रचना एक उत्साह जगाती और पुरुषो की मक्कारियो और वर्चस्व पर आक्रोश जताती हुई एक सुद्रद कविता है.
प्यार को जिस तरह बाँध कर नहीं रखा जा सकता उसी तरह पुरुष को समझ लेना चाहिए की आज की नारी पूरे विश्वास, स्वाधीनता और पूरी जिम्मेदारी के साथ असीमता चाहती है जिस पर बंधन रूपी इंटो से कोई सीमाए नहीं बनायीं जा सकती...कोई महल नहीं खड़े किये जा सकते...
बहुत से सार्थक प्रशन उठाती हुई एक सशक्त रचना पर बधाई.

दिगम्बर नासवा 5/06/2010 7:14 PM  

गरिमा लिए रचना है ... नारी को खिलोना समझने वालों को सावधान हो जाना चाहिए ...

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 5/06/2010 7:57 PM  

बहुत सुन्दर रचना है ... वंदना जी की कविता के बाद, मुझे लग रहा था कि इसबार आप इस विषय पर कुछ ज़रूर लिखेंगे ... और मेरा अनुमान सही निकला ...
नारी शक्ति अब जाग रही है ... भारतीय समाज में कुछ परिवर्तन आना ज़रूरी है

roohshine 5/06/2010 8:34 PM  

jabardast chetawani :).....durga ka sakshaat awtaar ..

महफूज़ अली 5/06/2010 9:47 PM  

आपके इन तेवरों में मैं आपके साथ हूँ.... बहुत ही ग़ज़ब और जोशीली व सुंदर रचना (warning)....

Tej Pratap Singh 5/07/2010 1:17 AM  

नारी में है शक्ति - क्षमा
पुरुषार्थ भी ये बोलेगा.

khub kaha.....andaaj bhi sahi hai.

फ़िरदौस ख़ान 5/07/2010 11:37 AM  

अति सुन्दर अभिव्यक्ति...

यशवन्त मेहता "फ़कीरा" 5/07/2010 4:45 PM  

हुंकार उठी नारी तो ये

भूमंडल भी डोलेगा

नारी में है शक्ति - क्षमा

पुरुषार्थ भी ये बोलेगा.

अंतिम पंक्तियाँ ओजस्वी हैं........
पर ये बताएं कि क्या सिर्फ पुरुष ही जिम्मेदार हैं नारी की दुर्दशा के लिए?????
नारी भी नारी के दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं, एक कविता नारी को सताने वाली नारियो के लिए भी लिखिए......अच्छा लगेगा

Gourav Agrawal 5/07/2010 4:57 PM  

जन्मदिन की बधाई :)

रोहित 5/07/2010 7:38 PM  

behad prabhavshali rachna!
aadar-
#ROHIT

sangeeta swarup 5/07/2010 8:11 PM  

यशवंत जी,

आपने रचना को सराहा ..शुक्रिया...आपकी बात सोलह आने सही है कि केवल पुरुष ही नारी की दुर्दशा का ज़िम्मेदार नहीं है....आपकी कही हुई बात यद् रहेगी...ऐसा कुछ लिखने का प्रयास ज़रूर करुँगी...शुक्रिया

सभी पाठकों का आभार...विशेष रूप से पुरुष पाठकों का जिन्होंने इस रचना को सराहा...

मनोज कुमार 5/07/2010 10:10 PM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 08.05.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

रानी पात्रिक 5/07/2010 10:21 PM  

बहुत खूब। मैं यह मानती हूँ कि समाज में सम्मान पाने के लिए नारी को पुरूष की बराबरी करने के बजाय यह सिखाना चाहिए कि उसे नारी का सम्मान कैसे करना है वरना वह नारी के कर्तव्य से भी गयी और अन्त में न पुरूष नारी की इज्जत करता है न नारी पुरूष की। कम से कम अपने विदेश प्रवास से तो यही अनुभव हुआ है।

दीपक 'मशाल' 5/08/2010 3:51 PM  

Main to saavdhan ho gaya :)
badhiya kavita

Babli 5/09/2010 12:15 PM  

बहुत सुन्दर कविता और साथ में सुन्दर तस्वीर! बेहतरीन प्रस्तुती!

हरकीरत ' हीर' 5/09/2010 9:23 PM  

बहुत सुंदर .....!!

संगीता जी आपकी इस कविता पे खड़े होकर ताली ........!!

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