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पिघलता पत्थर

>> Wednesday, July 27, 2011




अमावस सी ज़िंदगी में 
अचानक ही 
छिटक गयी चाँदनी 
एक बादल की ओट से 
निकलते हुए 
चाँद ने कहा 
क्यूँ मायूस हो ? 
मैं हूँ न ..
और यह कह 
मुस्कुरा दिया 
मैं खो गयी 
उस मुस्कान में 
उसकी स्निग्ध शीतलता ने 
जैसे दग्ध मन पर 
रख दिए 
बर्फ  के फाहे 
और 
पिघलता रहा 
बूँद बूँद 
जो हृदय 
पत्थर हो चला था ...


77 comments:

वन्दना 7/27/2011 4:38 PM  

वाह! मनोभावों का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है सच इंसान इससे ज्यादा और क्या चाहता है।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद 7/27/2011 4:38 PM  

प्रेम की शीतल चांदनी में मायुसी का पाषाण पिघल ही जाता है। अच्छी कविता के लिए बधाई॥

रश्मि प्रभा... 7/27/2011 4:39 PM  

chaand ne kaha- main hun n , kitni bheeni raushni

Sadhana Vaid 7/27/2011 5:07 PM  

बेहद शीतल, स्निग्ध और नर्म से अहसास हैं कविता में संगीता जी ! काश आश्वासन की सौगात थमाता ऐसा मनभावन चाँद सबके जीवन में आ जाये ! बहुत प्यारी रचना ! आभार !

रेखा श्रीवास्तव 7/27/2011 5:12 PM  

बहुत सुंदर अहसासों को शब्द दिए हैं, काश ! ऐसे ही चंद सभी उदास से चेहरे और मानों को अपने शीतलता से रुई के फाहे में लपेट कर बर्फ सा अहसास देकर शांत कर सके तो फिर कितने जीवन ऐसे ही ख़ुशी से भरजाएँ.

कविता रावत 7/27/2011 5:46 PM  

और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था .
....ek pyara saath jo mil gaya pighalta kyun nahi...
..bahut badiya prastuti..

S.M.HABIB 7/27/2011 5:51 PM  

वाह दी.... कितनी सहज और सुन्दर अभिव्यक्ति है....
सादर....

मनोज कुमार 7/27/2011 6:10 PM  

मुस्कान में वह ताक़त है जो पत्थर हृदय में भी प्यार का भाव भर दे।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 7/27/2011 6:18 PM  

वाह संगीता दी क्या कहना !!!
मन के मधुर भावों को सहज प्रवाह देती ...कोमल-कोमल सुन्दर रचना

kshama 7/27/2011 6:44 PM  

Kitna sundar ehsaas!

Rakesh Kumar 7/27/2011 6:45 PM  

अति सुन्दर भावाभिव्यक्ति.
कोमल अहसास कराती हुई.
आभार.

prerna argal 7/27/2011 6:55 PM  

चाँद ने कहा क्यूँ मायूस हो ? मैं हूँ न .. और यह कह मुस्कुरा दिया मैं खो गयी उस मुस्कान में उसकी स्निग्ध शीतलता ने जैसे दग्ध मन पर रख दिए बर्फ के फाहे और पिघलता रहा बूँद बूँद जो हृदय पत्थर हो चला था .../बहुत सुंदर भाव लिए ,बहुत मन को शीतलता प्रदान करती हुई बेमिसाल रचना/ संगीताजी बधाई आपको /

ashish 7/27/2011 7:32 PM  

दग्ध ह्रदय को बर्फ के फाहे का एहसास . मरुस्थल में ओएसिस मिल जाने जैसा अनुभव .

Maheshwari kaneri 7/27/2011 7:34 PM  

.सुंदर अहसासों को शब्द देकर कितनी सहज और सुन्दर रचना रच डाली है.....

सम्वेदना के स्वर 7/27/2011 8:06 PM  

एक आत्मीय मुस्कराहट और एक प्रेम पगा स्पर्श किसी भी पाषाण-ह्रदय को पिघला देता है!!
संगीता दी! बहुत अच्छी लगी यह कविता!!

Navin C. Chaturvedi 7/27/2011 9:03 PM  

दग्ध मन पर बर्फ के फाहे

क्या बात है दीदी, कमाल कर रही हैं आप|

Dorothy 7/27/2011 9:19 PM  

बेहद खूबसूरती से पिरोई दिल को छू जाने वाली रचना. आभार.
सादर,
डोरोथी.

रजनीश तिवारी 7/27/2011 9:46 PM  

बहुत ही सुंदर भाव ...बहुत अच्छी कविता

Roshi 7/27/2011 10:53 PM  

yehi to pyar hai jo pathar ko bhi pighla deta hai

संतोष कुमार 7/27/2011 11:35 PM  

Bahut hi sunder kavita.
Bahut bahut badhai.

अनामिका की सदायें ...... 7/27/2011 11:36 PM  

कोमल एह्सासों से गुंथी सुन्दर, निर्मल, प्यारी रचना.

सुज्ञ 7/27/2011 11:47 PM  

मनोयोग से भावनाओं की प्रस्तुति

अनुपमा त्रिपाठी... 7/28/2011 12:37 AM  

boond-boond snigdhta ...pahunch rahi hai ham tak bhi ....
badhai apko ....

Er. सत्यम शिवम 7/28/2011 12:41 AM  

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति और साथ में चित्र भी...।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी 7/28/2011 12:46 AM  

भावपूर्ण अभिव्यक्ति और सुन्दर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई

इस्मत ज़ैदी 7/28/2011 12:46 AM  

चाँद ने कहा क्यूँ मायूस हो ? मैं हूँ न

बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति
बेहद नाज़ुक सा एहसास

डॉ॰ मोनिका शर्मा 7/28/2011 3:09 AM  

बहुत सुंदर ...मनोभावों की कमाल की अभिव्यक्ति है... बधाई

sushma 'आहुति' 7/28/2011 8:40 AM  

बेहतरीन रचना...

कुश्वंश 7/28/2011 8:42 AM  

वाह .. कितनी सरलता से कह दी बात .. झकझोरने वाली बधाई

प्रवीण पाण्डेय 7/28/2011 9:20 AM  

बर्फ और हृदय के पिघलने की रोचक अभिव्यक्ति।

Mithilesh dubey 7/28/2011 10:38 AM  

सुन्दर अभिव्यक्ति

Dolly 7/28/2011 1:29 PM  

कोमल-कोमल सुन्दर अभिव्यक्ति..........

सदा 7/28/2011 1:51 PM  

वाह ...बहुत ही नाजुक से अहसास ...बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

shashipurwar 7/28/2011 2:50 PM  

bahu sundar ,ek pyara eahsas ........ pighalta raha boond boond.....!
chand ki shital kiran or barf ki pighlan......... ati sundar .
DIL KE KARIB

shashipurwar 7/28/2011 2:51 PM  

bahu sundar ,ek pyara eahsas ........ pighalta raha boond boond.....!
chand ki shital kiran or barf ki pighlan......... ati sundar .
DIL KE KARIB

shashipurwar 7/28/2011 2:51 PM  

bahu sundar ,ek pyara eahsas ........ pighalta raha boond boond.....!
chand ki shital kiran or barf ki pighlan......... ati sundar .
DIL KE KARIB

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 7/28/2011 4:59 PM  

जैसे दग्ध मन पर
रख दिए
बर्फ के फाहे
और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था ...


बहुत सुंदर !

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 7/28/2011 7:07 PM  

बहुत भावपूर्ण और सकारात्मक अहसास पेश करती रचना.

Vaanbhatt 7/28/2011 9:06 PM  

हर दिल को बर्फ के फाहे की ज़रूरत है...
सख्त दिखता है, अन्दर पिघलता है...

रविकर 7/28/2011 9:38 PM  

महा-स्वयंवर रचनाओं का, सजा है चर्चा-मंच |
नेह-निमंत्रण प्रियवर आओ, कर लेखों को टंच ||

http://charchamanch.blogspot.com/

Dr.J.P.Tiwari 7/29/2011 7:29 AM  

पत्थर का पिघलाना आसन नहीं, पत्थरों में संवेदना जगाना आसन नहीं. लेकिन जिसने अपने त्याग, तपस्या और समर्पण से जागृत कर लिया पाषाण को, तो वह फिर बन जाता है संवेदनाओं, चैतन्यता का आगार. बहता है शिआजीत बन के... ढलते उसके अश्रुधारा को कितनों के पहचाना है, कितनों ने जाना है? फिर चाहे जो नाम और रूप दें उसका. वह फिर भी छोटा पड़ेगा, हमेशा छोटा पड़ेगा.उसके लिए. वह भी चेतना की मूर्ती है, संवेदनाओं का आगार है. बात केवल समझने-समझाने की है. जागने और जगाने की है. आपका बहुत- बाहुत आभार...

Babli 7/29/2011 10:14 AM  

अद्भुत सुन्दर रचना! मन के भावों को बड़े खूबसूरती से व्यक्त किया है आपने! मुस्कुराहट में वो जादू है जो बर्फ को भी पिघला दे! कोमल और मीठे एहसास के साथ लाजवाब प्रस्तुती!

Kunwar Kusumesh 7/29/2011 11:07 AM  

बेहद सुंदर अभिव्यक्ति .

Khare A 7/29/2011 11:57 AM  

और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था ...

kitni sheetalta hai aapki is hirdyae-sparshi anubhuti me!

simply beautiful ! badhai sweikare

vidhya 7/29/2011 1:32 PM  

बहुत ही सुंदर भाव .

Anita 7/29/2011 1:47 PM  

चाँद ने हृदय को पिघला दिया इसीलिए सदियों से विरहाकुल मन चाँद के द्वारा प्रीतम को संदेशा भिजवाता रहा है... भावपूर्ण रचना के लिये बधाई!

mridula pradhan 7/29/2011 6:33 PM  

और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था ...
kitna sunder likhi hain aap......

Minakshi Pant 7/30/2011 12:05 AM  

बहुत खूबसूरत रचना दी :)

ज्योति सिंह 7/30/2011 2:36 AM  

hame aur kya chahiye rahat ke siva ,sundar ,apni kami poori kare do shabdo se intjaar hai .

vandana 7/30/2011 6:51 AM  

उसकी स्निग्ध शीतलता ने
जैसे दग्ध मन पर
रख दिए
बर्फ के फाहे
और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था ...
बहुत खूबसूरत नरम अहसासों से पूर्ण रचना

shashipurwar 7/30/2011 11:34 AM  

BAHUT SUNDAR ........ MAAN KE BHAVO KA ADBUDH CHITRN.

Gopal Mishra 7/30/2011 11:38 AM  

bahut hi sundar rachna. Dhanyawad

Dr (Miss) Sharad Singh 7/30/2011 1:13 PM  

और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था ...

बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !

mahendra verma 7/31/2011 7:57 AM  

उसकी स्निग्ध शीतलता ने
जैसे दग्ध मन पर
रख दिए
बर्फ के फाहे
और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था

भावों का शब्दों में बढ़िया रूपांतरण।

Dr Varsha Singh 7/31/2011 12:59 PM  

मैं खो गयी
उस मुस्कान में
उसकी स्निग्ध शीतलता ने
जैसे दग्ध मन पर रख दिए बर्फ के फाहे और पिघलता रहा बूँद बूँद
जो हृदय पत्थर हो चला था


वाह..क्या खूब लिखा है आपने।
बहुत सशक्त प्रस्तुति।

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri 7/31/2011 3:16 PM  

उसकी स्निग्ध शीतलता ने
जैसे दग्ध मन पर
रख दिए
बर्फ के फाहे
और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था ...
प्रेम की शास्वत कोमलता जड़ को चेतन रूप प्रदान करती है ..बहुत ही गहन भाव समेटे अत्युत्तम काब्यांजलि ..
सदा जय हो आपकी !!!

Suresh Kumar 7/31/2011 4:13 PM  

और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था ...

Ati-uttam rachanaa...aabhaar..

मेरा साहित्य 7/31/2011 7:36 PM  

और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था .
ati sunder panktiya
komal man si pavitr hai ye kavita bahut khoob
rachana

Udan Tashtari 7/31/2011 7:45 PM  

दग्ध मन पर बर्फ के फाहे


-सुन्दर!!!

anu 7/31/2011 8:23 PM  

खूबसूरत अभिव्यक्ति .....एहसास दिल के

anu 7/31/2011 8:23 PM  

खूबसूरत अभिव्यक्ति .....एहसास दिल के

prerna argal 7/31/2011 10:05 PM  

आपकी पोस्ट की चर्चा सोमवार १/०८/११ को हिंदी ब्लॉगर वीकली {२} के मंच पर की गई है /आप आयें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएँ / हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। कल सोमवार को
ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।

Dr.Bhawna 8/01/2011 7:41 AM  

Anipam abhivayakti..

Rajesh Kumari 8/01/2011 1:06 PM  

bahut laajabab prastuti.

संजय भास्कर 8/01/2011 5:25 PM  

आदरणीय संगीता स्वरुप जी
नमस्कार !
.....भावपूर्ण अभिव्यक्ति और सुन्दर प्रस्तुति..

anita agarwal 8/01/2011 7:31 PM  

और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था ...

wah kitni khubsurat lines hain...
nayi hoon blog ki duniya mei.kabhi mere blog per bhi kadam rakhiye, itezar rahega..

वाणी गीत 8/02/2011 3:16 PM  

पिघलता गया ह्रदय जो पत्थर हो चूका था ...
शीतल प्रेम , चांदनी की उष्णता और मायूसी का पिघलना ...
सभी भावनाओं का मानवीकरण कर दिया आपने तो !

ZEAL 8/03/2011 10:10 AM  

मैं खो गयी
उस मुस्कान में
उसकी स्निग्ध शीतलता ने
जैसे दग्ध मन पर
रख दिए
बर्फ के फाहे ....

Very impressive expression !

.

Varun 8/03/2011 8:29 PM  

[ ...और
पिघलता रहा
बूँद बूँद ...]

In addition to the beautiful expression, I think the beauty also comes from the use of continuous tense. A simple past tense would not have been that powerful.

๑♥!!अक्षय-मन!!♥๑, 8/04/2011 6:11 PM  

अपने भाव को स्पष्ट करना इसे ह कहते हैं कितनी गहनता कितनी स्थिरता है आपकी रचना में वाह पढकर बहुत ही अच्छा लगा बहुत ही अच्छा लिखती हैं आप.. मेरे ब्लॉग पर भी आइयेगा मुझे ख़ुशी होगी .
अक्षय-मन

Prarthana gupta 8/04/2011 9:46 PM  

aapki abhiwaykti dil choo leti hai....

Minakshi Pant 8/05/2011 8:07 AM  

बहुत खूबसूरत रचना अपने भावों को प्रकृति की आकृति से बयाँ करती हुई |
बहुत सुन्दर |

संगीता पुरी 8/05/2011 9:14 AM  

और
पिघलता रहा
बूँद बूँद
जो हृदय
पत्थर हो चला था ...

बहुत खूब !!

"पलाश" 8/05/2011 8:31 PM  

वाकई प्रेम की शक्ति भी अदभुद है , कोमल होकर भी पत्थर से दिल को भी पिघला देता है .....

shikha varshney 9/02/2011 2:30 PM  

:):) ये दिल कभी पत्थर नहीं होगा.

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