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तुम्हारा दम्भ

>> Sunday, March 7, 2021

 


ओ पुरुष,

नियंत्रक बने हर वक़्त 
चलाते हो अपनी 
और चाहते हो कि 
बस स्त्री केवल सुने 
कर देते हो उसे चुप 
कह कर कि 
तुम औरत हो 
औरत बन कर रहो
नहीं ज़रूरत है 
किसी भी सलाह की ।
और , स्त्री - 
रह जाती है 
मन मसोस कर 
हो जाती है मूक 
नहीं होता महत्त्व 
उसके होने या 
न होने का 
खुद से उलझती 
खुद से बतियाती 
करती रहती है 
रोज़मर्रा के काम 
मन में घुमड़ता रहता है 
कहीं न कहीं उसका 
अपना अपमान 

निकलती है बाहर 
घर के ही काम से 
या फिर 
मिल बैठती हैं 
कहीं कुछ महिलाएँ
खुद के मन की 
निकालने भड़ास 
सोचती हैं कुछ बतियाएँ 
एक दूसरे से 
मन की कह जाएँ
और इसी लिए 
जहाँ भी मिलती हैं 
दो या कुछ स्त्रियाँ 
हो जाती हैं मजबूर 
कुछ कह कर 
कुछ हँस कर 
करती हैं अवसाद दूर ।

और तुम ,
इस पर भी 
मज़ाक उड़ाते हो 
उनके गल्प पर 
चुटकुले बनाते हो 
और अपने दम्भ को
पोसते हुए
हो जाते हो मगन 
यही सोचते हुए कि
कितना सही हो तुम ! 



35 comments:

Virendra Singh 3/07/2021 10:48 AM  

महिला दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। सार्थक और समयोचित सृजन के लिए आपको ढेरों बधाइयाँ।

उषा किरण 3/07/2021 11:32 AM  

वाह...हर महिला के मन की बात लिख दी...अद्भुत रचना👌👌

रश्मि प्रभा... 3/07/2021 11:37 AM  

तुम चाहते हो, वह न निकाले अपना मन की बेचैनी, बस सबकुछ अपना कर्तव्य मान ले और तुम अपनी समझाइश पर दम्भ भरो

MANOJ KAYAL 3/07/2021 12:30 PM  

बहुत सुन्दर सृजन।

yashoda Agrawal 3/07/2021 12:41 PM  

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 07 मार्च 2021 को साझा की गई है........."सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Jigyasa Singh 3/07/2021 1:56 PM  

स्त्री मन के चिंतन के उपरांत उसकी वेदना को समझने का सामर्थ्य काश आपकी तरह हर किसी में होता ..बहुत ही महीन नस पकड़ आपने ये रचना रच दी..बहुत सुंदर ..आपको हार्दिक शुभकामनाएं..आप ऐसे ही लिखती रहे और हमारी मार्गदर्शक बनी रहें..ईश्वर से यही प्रार्थना है ..सादर..

shikha varshney 3/07/2021 2:58 PM  

स्त्री को स्वर मिला ही नहीं जैसे। बारीक पंक्तियां रच दीं हैं आपने।

डॉ. मोनिका शर्मा 3/07/2021 3:28 PM  

वाह ..विचारणीय भाव

Sweta sinha 3/07/2021 4:18 PM  

स्त्रियों के अस्तित्व के प्रश्न के अनेक विषयों में यह भी एक विचारणीय विषय है दी।
------
स्त्री और पुरुष में असमानता के बोध का मूल का आर्थिक आत्मनिर्भरता तो है ही परंतु स्त्रियों की अति भावुकता सबसे सशक्त कारण समझ आता है जिसकी वजह से स्त्रियों को छला जाता है और बेवकूफ समझा जाता है।

सादर।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 3/07/2021 4:36 PM  

महिला दिवस के अवसर पर सोचने को विवश करती सुन्दर रचना।

girish pankaj 3/07/2021 5:20 PM  

बहुत सुंदर रचना।

कविता रावत 3/07/2021 5:46 PM  

मूर्ख होते हैं ऐसे लोग जो औरत को अपने से कम समझते हैं

सार्थक चिंतनशील रचना

Onkar 3/07/2021 5:54 PM  

बहुत सुन्दर

Jyoti Dehliwal 3/07/2021 8:26 PM  

बहुत ही विचारणीय लेख,संगीता दी।

Ravindra Singh Yadav 3/07/2021 9:33 PM  

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार ( 08 -03 -2021 ) को 'आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है' (चर्चा अंक- 3999) पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है।

हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

#रवीन्द्र_सिंह_यादव

रेणु 3/07/2021 10:47 PM  

पुरुषों को खूब खरी खरी आदरणीय दीदी |ये लगभग हर लड़की या औरत का सच है | कितने पूर्वाग्रहों , दबाव और चिंताओं में जीती है एक औरत पुरुष ये कभी जान नहीं पाते | उसकी निश्छलता का मज़ाक उड़ाकर वे अपनी संवेदनहीनता का प्रदर्शन करते हैं | सादर आभार के साथ महिला दिवस की बधाई और शुभकामनाएं|

Manju Mishra 3/08/2021 12:46 AM  

ये दम्भ ही तो सारी मुसीबतों की जड़ है संगीता जी । बहुत प्रभावशाली रचना

ज्योति सिंह 3/08/2021 7:55 AM  

बहुत ही सुंदर ढंग से कह दी मन की बात को आपकी इस रचना ने महिला दिवस की आपको ढेरों बधाई हो, सादर नमन, शुभ प्रभात, बेहतरीन रचना संगीता जी

Kamini Sinha 3/08/2021 12:05 PM  

स्त्री के भावुकता को उसकी कमजोरी मान पुरुष दंभ भरते हैं। नारी के अंर्तमन की दशा को शब्दों में पिरो दिया हैं आपने।
हम सभी की आवाज बनने के लिए दिल से शुक्रिया आपका

आपको भी महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

Alaknanda Singh 3/08/2021 4:24 PM  

विश्व महिला दिवस एक खूबसूरत और आत्मच‍िंतन कराती कव‍िता.. ''औरत बन कर रहो
नहीं ज़रूरत है
किसी भी सलाह की..'' वाह

अरुण चन्द्र रॉय 3/08/2021 10:16 PM  

बहुत अच्छी कविता। पुरुष प्रवृत्ति पर गहरा कटाक्ष है कविता में।।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 3/09/2021 10:27 AM  

आप सभी पाठक वृन्द का हार्दिक आभार .

Anita 3/09/2021 11:05 AM  

परिवर्तन की राह बनाता सार्थक लेखन

Jyoti khare 3/09/2021 10:03 PM  

स्त्री की मनोदशा का सटीक विश्लेषण
सुंदर रचना
शुभकामनाएं

जितेन्द्र माथुर 3/10/2021 9:22 AM  

आपने जो कहा है, ठीक कहा है संगीता जी । मानसिकता परिवर्तित होनी ही चाहिए पुरुष वर्ग की स्त्रियों के प्रति । यही अभीष्ट है, यही वांछित है ।

जयकृष्ण राय तुषार 3/11/2021 4:22 PM  

बहुत ही बेजोड़ और अच्छी कविता आपको सादर प्रणाम

Sawai Singh Rajpurohit 3/11/2021 6:51 PM  

बहुत सुंदर भाव 🙏 भोलेबाबा की कृपादृष्टि आपपर सदा बनी रहे।🙏 महाशिवरात्रि पर्व की आपको परिवार सहित शुभकामनाएं

Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल 3/12/2021 7:26 AM  

अंतर व्यथा को उजागर करती बेहद सुन्दर सृजन, हालांकि महिलाओं में बहुत कुछ आत्मविश्वास बढ़ा है और पुरुष प्रधान समाज ने उसे स्वीकारा भी है, फिर भी बहुत कुछ बदलना अब भी बाक़ी है - - साधुवाद सह।

उषा किरण 3/12/2021 7:51 AM  

बहुत सुन्दर रचना👌

Meena Bhardwaj 3/12/2021 10:29 AM  

स्त्रियों की मनोदशा पर सटीक सृजन ।

संजय भास्‍कर 3/12/2021 6:43 PM  

लाजवाब पंक्तियाँ !सुन्दर भावों से सजी शानदार कविता! बधाई!

Amrita Tanmay 3/23/2021 9:23 PM  

सशक्त सृजन के लिए हार्दिक आभार ।

Bharti Das 4/02/2021 6:20 PM  

बहुत ही सुन्दर लाजबाव रचना

Bharti Das 4/02/2021 6:22 PM  
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