मुखौटा
>> Saturday, December 19, 2009
मैंने नहीं चाहा कि
कोई मेरे दिल के नासूरों को
रिसते हुए देखे ,
और ये भी नहीं चाहा कभी कि
कोई मेरे मन के छालों पर
फाहे रक्खे ।
पर फिर भी दिल
दुखता तो है
दर्द होता तो है ।
लोग कहते हैं कि
दर्द हद से गुज़र जाये तो
ग़ज़ल होती है
सच ही है ये
क्यों कि
मेरी लेखनी भी
कागज़ से लिपट रोती है
नहीं चाहा कभी किसी को
मेरे दर्द का अहसास हो पाए
इसीलिए आ जाती हूँ
सबके बीच
हंसी का मुखौटा लगाये .









