जला दिया घर अपना
>> Friday, January 8, 2010
फिर भी हमें बेवफा कहा जाने - अनजाने में .
वफ़ा है कि कहीं सरे बाज़ार नहीं बिकती
रिश्तों पर दांव खेल दिया हमें हराने में .
हैं हम घर से बेघर और सोचते हैं वो
कि सुकून मिल रहा है शायद आशियाने में .
चिंगारी लगा के वो देखते हैं तमाशा
जल गए हैं हाथ मेरे हवन कराने में .
रिश्तों की नीव को कुछ इस तरह हिलाया
कि हाथ छिल गए हैं उसे फिर से जमाने में .
मन के दरख़्त पर अब जम गयी हैं जड़ें
छाले पड़ गए हैं अब उन्हें हटाने में......














