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मुखौटा

>> Saturday, December 19, 2009



मैंने नहीं चाहा कि



कोई मेरे दिल के नासूरों को



रिसते हुए देखे ,



और ये भी नहीं चाहा कभी कि



कोई मेरे मन के छालों पर



फाहे रक्खे ।



पर फिर भी दिल



दुखता तो है



दर्द होता तो है ।




लोग कहते हैं कि



दर्द हद से गुज़र जाये तो



ग़ज़ल होती है



सच ही है ये



क्यों कि



मेरी लेखनी भी



कागज़ से लिपट रोती है



नहीं चाहा कभी किसी को



मेरे दर्द का अहसास हो पाए



इसीलिए आ जाती हूँ



सबके बीच



हंसी का मुखौटा लगाये .

22 comments:

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) 12/19/2009 11:51 AM  

सुंदर पंक्तियों के साथ बहुत सुंदर कविता....


इसीलिए आ जाती हूँ

सबके बीच

हंसी का मुखौटा लगाये .


सच में ..... हमें कई बार दर्द को छुपाना ही पड़ता है....

masoomshayer 12/19/2009 12:03 PM  

bahut bahut achhaa hai

www.SAMWAAD.com 12/19/2009 12:07 PM  

कोई भी मुखौटा कितने शातिराना अंदाज में क्यों न लगाया जाए, एक न एक दिन वह उतर ही जाता है।

------------------
जिसपर हमको है नाज़, उसका जन्मदिवस है आज।
कोमा में पडी़ बलात्कार पीडिता को चाहिए मृत्यु का अधिकार।

36solutions 12/19/2009 12:28 PM  

बहुत सुन्‍दर कविता. दिल में भीतर तक पैठती हुई. धन्‍यवाद.

संजय भास्‍कर 12/19/2009 12:37 PM  

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

सदा 12/19/2009 12:40 PM  

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

रश्मि प्रभा... 12/19/2009 1:05 PM  

नहीं रोता दर्द सिर्फ कागजों के संग
जाने कितनी आँखों से टपकता है.......

वाणी गीत 12/19/2009 1:56 PM  

दर्द का मुखौटा लगाने से बेहतर है हंसी का मुखौटा पहन लिया जाए ....!!

vandan gupta 12/19/2009 4:32 PM  

मेरी लेखनी भी

कागज़ से लिपट रोती है
नहीं चाहा कभी किसी को

मेरे दर्द का अहसास हो पाए

इसीलिए आ जाती हूँ

सबके बीच

हंसी का मुखौटा लगाये .

kya baat kahi aur sach kahi hai.............bahut khoob.

संगीता स्वरुप ( गीत ) 12/19/2009 4:45 PM  

निर्मला कपिला said...
संगीता जी क्या लाजवाब लिखा है मेरी लेखनी भी कागज़ से लोपट कर रोती है। बिलकुल सही कहा। बहुत से दुख इन्सान जो अपनों से नहीं कह पाता वो कागज़ों से कह लेता है। मेरी ये पँक्तियाँ आपके नाम
ये तमाम रिश्ते मेरे लिये गुमनाम बन गये
कागज़ के चन्द टुकडे मेरे दिल के राज़दां बन गये
शुभकामनायें

संगीता स्वरुप ( गीत ) 12/19/2009 4:50 PM  

निर्मला जी.

आपकी इस रचना पर दी गयी टिपण्णी मैंने यहाँ पोस्ट कर दी है...
असल में इस रचना का मुझे printout निकलना था इसलिए अपने दूसरे ब्लॉग में पोस्ट की थी.
मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुयी की आपने मुझे वहाँ भी पढ़ा. बहुत बहुत शुक्रिया .

बाकी तीन साथियों की टिप्पणियां भी यहाँ पोस्ट कर रही हूँ...उनका भी आभार .
आप सबकी टिप्पणियां मेरी लेखनी की ताकत है.
शुक्रिया

संगीता स्वरुप ( गीत ) 12/19/2009 4:51 PM  

क्रिएटिव मंच said...
waaah ...bahut khoob
khubsurat bhaav
behtareen kavita
aabhaar

Unknown 12/19/2009 4:51 PM  

kya bhav hain. kya kahan hai aur kya soch hai, umda, badhai.

संगीता स्वरुप ( गीत ) 12/19/2009 4:51 PM  

dweepanter said...
बहुत सुंदर रचना
pls visit...
www.dweepanter.blogspot.com

12 December 2009 18:16

संगीता स्वरुप ( गीत ) 12/19/2009 4:51 PM  

Devendra said...
अच्छे भाव
सुंदर कविता

15 December 2009 08:48

M VERMA 12/19/2009 5:11 PM  

नहीं चाहा कभी किसी को
मेरे दर्द का अहसास हो पाए
इसीलिए आ जाती हूँ
सबके बीच
हंसी का मुखौटा लगाये
हंसी के मुखौटे दर्द को छुपा नही पायेंगे. गज़ल बनकर फिर भी नज़र आ ही जायेगी.
बहुत सुन्दर

Sulabh Jaiswal "सुलभ" 12/19/2009 8:05 PM  

आप लाख मुखौटे लगाएं
दर्द तो दर्द है
आँखों से छलक ही जाता है.

एक भावपूर्ण रचना है.

- सुलभ

Apanatva 12/19/2009 9:23 PM  

bahut sunder.
bhut accha likhatee hai aap.

अनामिका की सदायें ...... 12/20/2009 12:09 AM  

मैंने नहीं चाहा कि
कोई मेरे दिल के नासूरों को
रिसते हुए देखे ,
yahi to mushkil hai.log doorbeen liye baithe hai aur kuchh log to haath dho kar peechhe pad jate hai na...jabardasti even nasoor footne ka waqt,din aur halaat bhi poochhte hai...ch.ch.ch..i hate dt gyes...(ha.ha.ha.)
और ये भी नहीं चाहा कभी कि
कोई मेरे मन के छालों पर
फाहे रक्खे ।
aap jaisi majbooti kash ham jaiso ko bhi mil paaye. hey bhagwaaaaaaaaannnn kithe ho tusi sun lo jara .....

पर फिर भी दिल
दुखता तो है
दर्द होता तो है ।
लोग कहते हैं कि
दर्द हद से गुज़र जाये तो
ग़ज़ल होती है
सच ही है ये
क्यों कि
मेरी लेखनी भी
कागज़ से लिपट रोती है
par kagaz bhi to log search kar kar k padh lete hai na....????

नहीं चाहा कभी किसी को
मेरे दर्द का अहसास हो पाए
इसीलिए आ जाती हूँ
सबके बीच
हंसी का मुखौटा लगाये .
ha.ha.ha...is baat par ek geet ki line yaad aa gayi..
duniya badi jalim hai dil tod ke hasti hai...
ab isme me ek line mila du..
duniya badi jalim hai mukhoto k neeche bhi jhaankti hai....

ha.ha.ha...nice post...
badhayi.....galti maaf.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 12/20/2009 1:54 AM  

संगीता जी,
'पर फिर भी
दिल दुखता तो है...
भावनाओं को सटीक शब्दों में पिरोया है आपने
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

दिगम्बर नासवा 12/20/2009 4:38 PM  

सच ही है ये
क्यों कि
मेरी लेखनी भी
कागज़ से लिपट रोती है ...

सच है .. तभी तो आँसू स्याही बन कर बह जाते हैं काग़ज़ पर, बिखर जाते हैं शब्द बन कर .......... दर्द के मर्म को उडेल दिया है आपने ...........

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