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एक सिहरन उम्मीद की

>> Tuesday, June 14, 2011


ज़िंदगी  की  राहें 
और उम्मीद का दामन 
चलते रहते हैं 
साथ - साथ, 
तार - तार 
होने लगती हैं 
जब उम्मीदें 
तब भी 
नहीं छोडते 
उनका साथ ,
निराशा भरे कदम 
ठिठकते तो हैं 
पर रुकते नहीं ,
घिसटते हुए ही सही 
पर चलते रहते हैं 
अनवरत  अपनी 
मंजिल की ओर .
ज़िंदगी के 
न जाने कितने 
ताल- तलैया 
खेत - खलिहान 
नदी - झील 
पार करते हुए
कदम आज 
पहुँच गए हैं 
तपते रेगिस्तान में ,
संघर्ष करते हुए 
हो जायेंगे पार ,
या फिर 
पा जायेंगे कोई 
नखलिस्तान ,
बस इसके लिए 
एक सिहरन उम्मीद की 
काफी है ....




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सूखी रेत पर अब कोई तहरीर लिखी नहीं जाती है

>> Saturday, June 4, 2011




मन की बात मन में ही दबी सी जाती है 
बात लबों  तक आकर भी निकाली  नहीं  जाती है 

आज हो गया है  , दिल मेरा पत्थर 
अब तो फूलों की महक भी सही नहीं जाती है .

मझधार में कर रही हूँ मैं कोशिश तैरने की 
पर लहरों से अब लड़ाई लड़ी नहीं जाती है .

दग्ध हो गया है मन तेरी तपिश भरी बातों से 
फिर भी तेरी ये चुप्पी मुझसे सही नहीं जाती है 

मौन को कुरेदा तो न जाने कितना गुबार उठेगा 
आँखों में अपनी नमी भी अब झेली नहीं जाती है 


सूख गया है समंदर भी जिसे कभी अश्कों ने भरा था 
सूखी रेत पर अब कोई तहरीर लिखी नहीं जाती है 


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याज्ञसेनी

>> Friday, May 27, 2011





याज्ञसेनी ! 
कई बार मन करता है कि 
तुमसे कुछ अन्तरंग बात करूँ 
कुछ प्रश्न पूछूं 
और आश्वस्त हो जाऊं 
अपनी सोच पर 

द्रुपद द्वारा किये गए यज्ञ से 
हुआ था जन्म तुम्हारा 
और रंग था तुम्हारा काला 
फिर भी कहलायीं अनुपम सुंदरी 
सच ही होगा 
क्यों कि 
मैंने भी सुना है ब्लैक ब्यूटी की
बात ही कुछ और है .

अच्छा बताओ 
जब जीत कर लाये थे 
धनञ्जय तुम्हें  स्वयंवर से 
तो कुंती के आदेश पर 
तुम बंट गयीं थीं 
पाँचों  पांडवों में ,
जब कि तुम 
कर सकतीं थीं विरोध 
तुम्हारे तो सखा भी थे कृष्ण 
जो उबार लेते थे 
हर संकट से तुम्हें ,
या फिर माँ कुंती भी तो 
अपने आदेश को 
ले सकतीं थीं वापस ,
या फिर उन्होंने पढ़ ली थी 
पुत्रों की आँखों में 
तुम्हारे प्रति मोह की भाषा 
और भाईयों को 
एक जुट रखने के लिए 
लगा गयीं थीं चुप ,
या फिर 
तुमने भी हर पांडव में 
देख लिए थे 
अलग अलग गुण 
जिनको तुमने चाहा था कि
सारे गुण तुम्हारे पति में हों , 

कैसे कर पायीं तुम 
हर पति के साथ न्याय ?
क्या कभी 
एक के साथ रहते हुए 
ख्याल नहीं आया दूसरे का ? 
यदि आया तो फिर कैसे 
मन वचन से तुम रहीं पतिव्रता ? 
युधिष्ठिर जानते थे 
तुम्हारे मन की बात 
शायद इसी लिए
वानप्रस्थ जाते हुए जब 
सबसे पहले त्यागा 
तुमने इहलोक 
तो बोले थे धर्मराज -
सब भाइयों से परे 
अर्जुन के प्रति आसक्ति ही 
कारण है सबसे पहले 
तुम्हारे अंत का .

हांलाकि मिला था तुमको 
चिर कुमारी  रहने का वरदान 
फिर भी पल पल 
बंटती रहीं तुम टुकड़ों में 
कैसे सहा ये बंटने का दर्द ? 

हे कृष्णा ! 
भले ही तुमने 
बिता दिया सारा जीवन 
पांडवों के साथ 
कष्टों को भोगते हुए 
पर आज भी लोंग 
जब तुम्हारा नाम लेते हैं 
तो बस यही याद आता है 
कि - तुम ही हो वह 
जो बनी कारण 
महाभारत का . 

सुना है आज भी 
कुरुक्षेत्र की मिट्टी 
लहू के रंग से लाल है |



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झुर्रियों की भाषा

>> Tuesday, May 17, 2011




वक्त के साथ 
पड़ गयीं हैं 
झुर्रियाँ 
मेरे चेहरे पर भी 
हर झुर्री में जैसे 
एक तहरीर 
लिखी है ,
ज़िंदगी का  इतिहास 
इन लकीरों में 
दिखता है 

पर इतिहास जैसा विषय 
कम ही लोग 
पसंद करते हैं पढ़ना 
इसीलिए 
गलतियों से 
सबक सीख नहीं पाते 
और अपने 
अनुभव से ही 
लिखना चाहते हैं 
नयी इबारत 
सच तो यह है 
कि 
हर एक का होता है 
एक अलग इतिहास 
एक एक लकीर में 
समाई होती हैं 
जैसे 
समंदर की लहरें 
जिनकी गिनती 
नहीं की जा सकती 
वैसे ही 
झुर्रियों  की भाषा 
पढ़ी नहीं जाती ...


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तथागत ..

>> Thursday, May 5, 2011


सिद्धार्थ -
कौन से ज्ञान की खोज
में
किया था तुमने पलायन
जीवन से ?
सुना है कि  तुम
नहीं देख पाए रोगी
काया को
या फिर
वृद्ध होते शरीर को
और मृत्यु ने तो
हिला ही दिया था तुमको भीतर तक
थे इतने संवेदनशील
तो कहाँ लुप्त हो गयीं थीं
तुम्हारी सारी संवेदनाएं
जब पुत्र और पत्नि को
छोड़ गए थे सोता हुआ
और अपने कर्तव्य से विमुख हो
चल पड़े थे दर - बदर भटकने .
क्या तुम्हे हुयी कभी ग्लानि
बिना बताये जाने की ?

बोधि सत्व के नीचे
अचानक ही तुम्हें
हो गया  ज्ञान प्राप्त
और तुम बन गए बुद्ध ..
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक --
तुमने कहा कि
प्राणी मात्र से प्रेम करो
प्राणी मात्र की  सेवा करो
प्राणी मात्र को कष्ट मत दो
पता है तुमको कि तुमने
दिया है कितना कष्ट
यशोधरा और राहुल को
हे तथागत -
आज तक नहीं समझ पायी
मैं तुम्हारे ज्ञान का सार
कर्तव्यों से च्युत हुए बिना
क्या नहीं हो सकता था
तुम्हारे ज्ञान का प्रसार ?

तब भी बनते तुम्हारे
अनुयायी
गर तुम ज़रा
सुनते यशोधरा का
मन
भावनाओं से परे
सिखा दिया तुमने तो बस --
बुद्धं शरणम्  गच्छामि
धर्मंम्  शरणम्  गच्छामि
संघम्  शरणम्  गच्छामि |

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