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खनकते सिक्के

>> Thursday, November 8, 2012




नारी और पुरुष को 
एक  ही सिक्के के 
दो पहलू  माना है 
पुरुष को हैड और 
स्त्री को टेल  जाना है 

पुरुष के दंभ ने 
कब नारी का मौन 
स्वीकारा  है 
उसके अहं के आगे 
नारी का अहं हारा है ।

पुरुष ने 
हर रिश्ते को 
अपने ही तराजू पर 
तोला  है , 
जबकि 
नारी ने हर रिश्ता 
मिश्री सा घोला है । 

पुरुष  अपने चारों ओर 
एक वृत बना 
घूमता रहता है 
उसके अंदर ,
नारी धुरी बन 
एक बूंद को भी 
बना देती है समंदर । 

सच ही  
नारी और पुरुष 
एक ही सिक्के के 
दो पहलू लगते हैं 
जो सिक्के की तरह ही 
पीठ जोड़े 
अपने अपने 
आसमां में खनकते  हैं । 


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झील सी होती हैं स्त्रियाँ

>> Tuesday, October 23, 2012

वाणी गीत    की दो रचनाएँ पढ़ीं थीं झीलें हैं कि गाती मुसकुराती स्त्रियाँ   और झील होना भी एक त्रासदी है ... और यह झील मन को बहुत भायी ....... झील का ही उपमान ले कर एक रचना यहाँ भी पढ़िये ....


झील सी 
होती हैं स्त्रियाँ 
लबालब  भरी हुई 
संवेदनाओं से 
चारों ओर के किनारों से 
बंधक सी बनी हुई 
सिहरन तो होती है 
भावनाओं की लहरों में
जब मंद समीर 
करता है स्पर्श 
पर नहीं आता कोई 
ज्वार - भाटा
हर तूफान को 
समां  लेती हैं 
अपनी ही गहराई में 
झील सी होती हैं स्त्रियाँ  

किनारे तोड़  
बहना नहीं जानतीं 
स्थिर सी गति से 
उतरती जाती हैं 
अपने आप में
ऊपर से शांत 
अंदर से उदद्वेलित 
झील सी होती हैं स्त्रियाँ । 

झील का विस्तार 
नहीं दिखा पाता 
गहराई उसकी 
इसीलिए 
नहीं उतर पाता 
हर कोई इसमें 
कुशल तैराक ही 
तैर सकता है 
गहन , शांत , 
गंभीर झील में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ । 






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अधूरा उपवन

>> Wednesday, October 10, 2012




मन के आँगन में
तुमने अपनी ही 
परिभाषाओं के 
खींच दिये हैं 
कंटीले तार
और फिर 
करते हो इंतज़ार 
कि , 
भर जाये आँगन 
फूलों से .

हाँ , होती है 
हरियाली 
पनपती है 
वल्लरी 
पत्ते भी सघन 
होते हैं 
पर फूल 
नहीं खिलते हैं । 

क्या तुमको 
ऐसा नहीं लगता कि
मन का उपवन 
अधूरा  रह जाता है 
और खुशियों का आकाश 
हाथ नहीं आता है । 



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अनोखी शब्दावली

>> Friday, September 21, 2012


शब्दों का अकूत भंडार 
न जाने कहाँ तिरोहित हो गया 
नन्हें से अक्षत के शब्दों पर 
मेरा मन तो मोहित हो गया । 

बस  को केवल " ब "  बोलता 
साथ बोलता कूल 
कहना चाहता है  जैसे 
बस से जाएगा स्कूल । 

मार्केट  जाने को गर कह दो 
पाकेट - पाकेट कह शोर मचाता 
झट दौड़ कर कमरे से फिर 
अपनी  सैंडिल  ले आता . 

घोड़ा  को वो घोआ  कहता 
भालू  को कहता है भाऊ 
भिण्डी  को कहता है बिन्दी
आलू को कहता वो आऊ । 

बाबा की तो माला जपता 
हर पल कहता बाबा - बाबा 
खिल खिल कर जब हँसता है 
तो दिखता जैसे काशी -  काबा । 

जूस  को कहता है जूउउ 
पानी को कहता है पायी 
दादी नहीं कहा जाता  है 
कहता काक्की  आई । 

छुक - छुक को वो तुक- तुक कहता 
बॉल  को कहता है बो 
शब्दों के पहले अक्षर से ही 
बस काम चला लेता है वो । 

भूल गयी हूँ कविता लिखना 
बस उसकी भाषा सुनती हूँ 
एक अक्षर की शब्दावली को 
मन ही मन मैं गुनती हूँ । 


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होड़.......

>> Thursday, September 13, 2012




पैसे की चमक ने 
चौंधिया दी हैं 
सबकी आँखें 
और हो गए हैं 
लोंग अंधे 
अंधे - आँख से नहीं 
दिमाग से 
पैसे की अथाह चाह ही 
राहें खोलती है 
भ्रष्टाचार  की 
काले बाज़ार की 
अपराध की 
पर क्या 
एक पल भी उनका 
बीतता है सुकूं से 
जो पैसे को 
भगवान बनाये बैठे हैं ? 

जितना कमाते हैं 
उससे ज्यादा पाने की 
लालसा में 
भूल गए हैं 
परिवार के प्रति दायित्व 
इसी लिए नहीं रहा 
संस्कारों में स्थायित्व 
दौड रहे हैं सब 
एक ही दिशा में  बस 
राहें  कोई भी हों 
कैसी भी हों 
मंजिल तक पहुंचना चाहिए 
किसी भी रास्ते बस 
पैसा आना चाहिए 

हो रहें हैं 
खत्म सारे रिश्ते 
भावनाएं मर चुकी हैं 
दिखावे की होड़ में 
संवेदनाएं ढह चुकी हैं 
भूल चुके हैं हम 
नीतिपरक कथ्यों को 
जो मन के द्वार खोलता है 
आज बस सबके  सिर 
पैसा चढ कर बोलता है 
जानते हैं  सब कि
नश्वर  है यह जहाँ 
जाते हुए सब कुछ 
रह जाएगा यहाँ 

फिर भी बाँध कर 
पट्टी अपनी आँखों पर 
भाग रहे हैं 
बस भाग रहे हैं 
सो रहे हैं मन से 
पर कहते हैं कि 
हम जाग रह हैं 
जब नींद खुलेगी तब 
मन बहुत पछतायेगा 
व्यर्थ हुआ सारा जीवन 
हाथ नहीं कुछ आएगा ...


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