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मात्र एक डोर

>> Saturday, May 1, 2010




कल्पना की पतंग 
सोच की डोर  से बाँध
उड़ा  दी थी  मैंने
अनंत में |


पर  तुम्हारी
सोच के मांझे ने
काट दी थी
मेरी डोर
धराशायी  होते हुए
पतंग मेरी
अटक गयी थी
समाज रुपी
बिजली के तारों में                          
जहाँ वो
परम्पराओं के
थपेडों को
सहते हुए एक दिन
ध्वस्त हो जायेगी
फिर नहीं मिलेगा
उसका कोई भी 
ओर - छोर
और रह जायेगी
मेरे हाथ में
मात्र एक डोर  |






                      http://charchamanch.blogspot.com/2010/05/141.html

32 comments:

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 5/01/2010 7:01 PM  

बेहतरीन रचना है ... कितने सुन्दर भाव को आपने इतने सहज शब्दों में कह दिया ... बधाई !

Apanatva 5/01/2010 7:18 PM  

bahut sunder abhivykti......

M VERMA 5/01/2010 7:47 PM  

कल्पना की पतंग
सोच की डोर से बाँध
उड़ा दी थी मैंने
अनंत में |
----
डोर से डोर जब उलझते हैं
तो फिर कहाँ सुलझते हैं
उम्दा, बेहतरीन, खूबसूरत, भावपूर्ण, एहसासमयी ---- रचना

अनामिका की सदाये...... 5/01/2010 9:00 PM  

क्यों न उस पतंग को
उन बिजली की तारो से
सुलझा लिया जाये
चलो फिर से एक बार
नयी सोचो की डोर से
बाँध दिया जाये..

एक ऊँची उड़ान
की दूर क्षितिज
तक जाने की
चाहत में..
चलो
एक साथ मिल कर
एक बार फिर
अपनी मंजिल
को ढूंढा जाये.

जहाँ न तुम
महसूस करो
खुद को
बिंधा हुआ..
ना मै
किसी मांझे
से काटू.

एक नयी सोच, एक नयी उम्मीद के शब्द देने की बस कोशिश मात्र है...उम्मीद है आपको पसंद आये आपकी रचना का ही जवाब.
शुभकामनाये.

sangeeta swarup 5/01/2010 9:16 PM  

अनामिका ....

अब ये तो आप ही लिख सकती हैं ना..कवि मन जो है....पर मेरी सोच कि डोर काटने वाला मांझा तो अपना हुनर दिखा ही देता है ना....आपकी प्रस्तुति बहुत पसंद आई...शुक्रिया ...

सभी पाठकों का आभार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 5/01/2010 9:27 PM  

आपकी कविता के साथ-साथ आपकी सोच भी सार्थक है!

Avinash Chandra 5/01/2010 9:33 PM  

waah.......sahi kaha aapne
is soch ki udaan lambi ho

रश्मि प्रभा... 5/01/2010 9:39 PM  

परम्पराओं के अधीन दम तोड़ते ज़ज्बातों की व्यथा

rashmi ravija 5/01/2010 9:39 PM  

डोर से डोर जब उलझते हैं
तो फिर कहाँ सुलझते हैं
बहुत ही गहरी बात कह दी.,इन पंक्तियों में...बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति

देवेश प्रताप 5/01/2010 9:51 PM  

लाजवाब प्रस्तुती ......

महफूज़ अली 5/02/2010 12:09 AM  

ड़ोर को बहुत ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया है आपने...

स्वप्निल कुमार 'आतिश' 5/02/2010 2:26 AM  

kya solid solid bhari bharkam upmayen hain is nazm me mumma...khatarnaak roop se dhansu hai nazm to ... :)aur ek dum sahi bhi hain .. :)

वाणी गीत 5/02/2010 5:46 AM  

कल्पना की पतंग उड़ान भरती उन्मुक्त गगन में ...
तुम्हारी सोच के मांझे ने की लाख कोशिशें ...
धराशायी होने से पहले मैं जोड़ दूंगी कई कल्पनों को ...
सोच की विभिन्न चर्खियों से ...
कहाँ तक काटोगे डोर ....

क्या कहती है आप ...??

योगेन्द्र मौदगिल 5/02/2010 7:34 AM  

वाह सुंदर भावाभिव्यक्ति साधुवाद

Shri"helping nature" 5/02/2010 9:50 AM  

shandar.................
kya kahun aapki tarif kaise krun.
its nice..............

sangeeta swarup 5/02/2010 9:58 AM  

वाणी जी ,

अब क्या कहूँ?

आपकी भावनाओं ने हौसला दिया... शुक्रिया

काश कि,
सोच की
चर्खियां होतीं
जिसमें
मांझे के साथ
डोर भी लिपट
गयी होती...


आपने अपनी टिप्पणी से एक नयी सोच दी है....बहुत अच्छा लगा.शुक्रिया

सभी पाठकों का आभार

Shekhar Kumawat 5/02/2010 10:02 AM  

bahut khub


badhai is ke liye aap ko

वन्दना 5/02/2010 2:59 PM  

बहुत बढिया भावाव्यक्ति। आपकी रचना चर्चा मंच मे शामिल कर ली गयी है।

Shekhar Suman 5/02/2010 3:10 PM  

maaf kijiyega aaj kal thoda busy rehta hoon to niymit roop se nahi aa pata aapke blog par.....
bahut hi behtareen rachna hai yeh aapki..
hamesha ki hi tarah khubsurat bhaw...
regards
http://i555.blogspot.com/

JHAROKHA 5/02/2010 5:43 PM  

Adaraneey Sangeeta ji,
Bahut sundar bhavnaon kee behatareena prastuti---achchhee lagee apkee kavitaa.
Poonam

Neeru 5/02/2010 6:28 PM  

bahut achhi kavita hai Mumma...apni sochon aur sapnon ko lekar chalte hue ek hriday par doosre ki soch ke haavi hone ki gaatha hai.....yun satahi tau par padhein to koi baat nahin magar rachna ki gehrayi mein jaayen to jaane kya kya khaayl ubhar ke aatein hain..:)

Badhiyaan rachna mumma...badhaayi...........:)

बेचैन आत्मा 5/03/2010 12:27 AM  

सोंच की डोर है तो फिर क्या घबराना..! कल्पना की नई पतंग उड़ायेंगे..
अपने सोंच के मांझे में और धार लायेंगे..
ऐसा भी तो सोंचा जा सकता है..?

Udan Tashtari 5/03/2010 5:32 AM  

बहुत उम्दा सोच लिए बेहतरीन रचना.

Shayar Ashok 5/03/2010 12:38 PM  

बहुत खुबसूरत रचना ...
बेहतरीन प्रस्तुति ......

रचना दीक्षित 5/03/2010 1:46 PM  

समाज रुपी
बिजली के तारों में
जहाँ वो
परम्पराओं के
थपेडों को
सहते हुए एक दिन
ध्वस्त हो जायेगी
फिर नहीं मिलेगा
उसका कोई भी
ओर - छोर
और रह जायेगी
मेरे हाथ में
मात्र एक डोर |

उफ्फ्फ !!!! लाजवाब ,कमाल है !!!!!!!!!!!!!!बहुत खुबसूरत रचना ...

Babli 5/03/2010 1:56 PM  

बहुत सुन्दर भाव के साथ लाजवाब रचना! बधाई!

shikha varshney 5/03/2010 6:24 PM  

हमारी कल्पनाओं की पतंग का यही हाल क्यों होता है दी ? शुकर है डोर तो हाथ मैं रह गई आपके यहाँ तो डोर तक फिसल जाती है...गहरे भाव वाली सुन्दर कविता है मन खुश हो गया आते ही.

निर्झर'नीर 5/04/2010 2:18 PM  

और रह जायेगी
मेरे हाथ में
मात्र एक डोर .............

aapki soch ka javab nahi ...laajavab

रोहित 5/04/2010 5:06 PM  

behad khubsurat rachna...maa'm!

ज्योति सिंह 5/06/2010 3:21 PM  

पर तुम्हारी
सोच के मांझे ने
काट दी थी
मेरी डोर
धराशायी होते हुए
पतंग मेरी
अटक गयी थी
समाज रुपी
behtrin rachna hai ye aapki ,ati sundar

दिगम्बर नासवा 5/06/2010 7:15 PM  

बेहतरीन बिंब के मध्यम से अपनी सोच को, ज़ज्बात को लिखा है आपने ... गहरी अभिव्यक्ति है ...

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