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मैंने सीखा है !!

>> Sunday, August 8, 2010







पीड़ा से लड़ना 

मैंने सीखा है 

पीड़ा को दास 

बनाना सीखा है 

फिर मैं 

पीड़ा से कैसे 

डर जाऊं 

जब उस पर 

अधिकार जमाना 

सीखा है 


कभी कभी 

मन जब 

यूँ ही 

आहत हो जाता है 

अश्कों का सागर भी जब 

नैनों पर लहराता है 

जैसे कोई तूफां जब 

मन में थोड़ा 

गहराता है 

उस पल मैंने 

पलकों पर 

बाँध बनाना 

सीखा है ....


तरकश के सब 

शब्द तीर  जब 

मुझ तक आ कर 

टकराते हैं 

मन के हर कोने को 

जैसे घायल सा 

कर जाते हैं 

उन जख्मों से 

फिर जैसे बस 

खून टपकता रहता है 

उन ज़ख्मों पर भी मैंने 

मरहम रखना 

सीखा है ......


मन की 

गंगा भी जब 

बाढ़ लिए 

चली आती है 

खुशी से 

लहलहाते खेतों का 

विशाल विध्वंस 

कर जाती हैं 

उन खेतों पर भी मैंने 

मेंड़  बनाना  

सीखा है .....



52 comments:

kshama 8/08/2010 6:11 PM  

खुशी से


लहलहाते खेतों का


विशाल विध्वंस


कर जाती हैं


उन खेतों पर भी मैंने


मेंड़ बनाना


सीखा है .....
Yah to badee sadhana hai! Gar ye seekh liya to sab saadh liya! Kamalki abhivyakti hai yah!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 8/08/2010 6:11 PM  

तरकश के सब
शब्द तीर जब
मुझ तक आ कर
टकराते हैं
मन के हर कोने को
जैसे घायल सा
कर जाते हैं
उन जख्मों से
फिर जैसे बस
खून टपकता रहता है
उन ज़ख्मों पर भी मैंने
मरहम रखना
सीखा है ......

वाह, बेहतरीन भाव ! सोना आग में तपकर ही तो खरा होता है ...

वन्दना 8/08/2010 6:23 PM  

मन की

गंगा भी जब

बाढ़ लिए

चली आती है

खुशी से

लहलहाते खेतों का

विशाल विध्वंस

कर जाती हैं

उन खेतों पर भी मैंने

मेंड़ बनाना

सीखा है .....
सच कहा ……………।ज़िन्दगी के हर पहलू से सारी ज़िन्दगी इंसान कुछ ना कुछ सीखता ही रहता है।

वन्दना 8/08/2010 6:28 PM  

अपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
कल (9/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

S.M.HABIB 8/08/2010 6:31 PM  

"जैसे कोई तूफां जब मन में थोड़ा गहराता है उस पल मैंने पलकों पर बाँध बनाना सीखा है ...."
अद्भुत, भावभीनी रचना है संगीता जी, बधाई.

मनोज कुमार 8/08/2010 6:47 PM  

व्‍यक्ति को महावीर तभी कहा जाता है जब वह विकट परिस्थितियों का हँसी-खुशी से सामना करता है। हर टूट्फूट के बाद फिर से उठ खड़ा होता है।
अति उत्तम प्रस्तुति।

रेखा श्रीवास्तव 8/08/2010 7:17 PM  

यही तो जीवन है की अगर इसको अपना कर ही जीवन का पूरा आनंद लिया जा सकता है. जिन्दगी की हर शै का आनंद लेने का नाम ही तो अनुभव है तभी वह कटु और मधुर पता चलता है.
बहुत सुन्दर लिखा है

अनामिका की सदायें ...... 8/08/2010 7:21 PM  

आपसे मुझे भी सीखना चाहिए.

Sadhana Vaid 8/08/2010 7:31 PM  

बहुत सुन्दर संगीताजी ! आपकी साधना, आपकी लगन और आपकी प्रतिकार की अदम्य क्षमता को कोटि-कोटि प्रणाम ! यही हौसला चाहिए हर कठिनाई पर विजय पाने के लिये ! और अपनी जीत पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिये ! हमें आपसे बहुत कुछ सीखना है !

डा. अरुणा कपूर. 8/08/2010 7:52 PM  

कभी कभी


मन जब


यूँ ही


आहत हो जाता है


अश्कों का सागर भी जब


नैनों पर लहराता है


जैसे कोई तूफां जब


मन में थोड़ा


गहराता है

...कठिन परिस्थिति पर काबू पाना ही जीवन है!...सुंदर रचना!

संगीता पुरी 8/08/2010 7:58 PM  

पीड़ा से लड़ना

मैंने सीखा है

पीड़ा को दास

बनाना सीखा है

बहुत सुंदर प्रस्‍तुति !!

Arvind Mishra 8/08/2010 8:03 PM  

सकारात्मकता से ओतप्रोत

सम्वेदना के स्वर 8/08/2010 8:28 PM  

संगीता दी,
यह कविता तो किसी भी थके हारे और निराश व्यक्ति के अंदर स्फ़ूर्ति का संचार कर सकने में समर्थ है.. एक प्रेरणादायी रचना...
सलिल
पुनश्चः “अधिकार ज़माना” में से “ज” के नीचे की बिंदी निकाल दें... शब्द का अर्थ बदल जाता है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 8/08/2010 8:28 PM  

आशा का संचार करती इस शिक्षाप्रद रचना के पढ़वाने के लिए धन्यवाद!

धर्म सिंह.......;;;;......... ( इक अजनबी) 8/08/2010 8:50 PM  

bahut hi adbhut rachna hai .....
अश्कों का सागर भी जब


नैनों पर लहराता है


जैसे कोई तूफां जब


मन में थोड़ा


गहराता है

kitni saralta se aap ne kitna kuch kaha dala
thanks

rashmi ravija 8/08/2010 8:57 PM  

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति.....पलकों का बाँध और खेतों पर मेंड़ की उपमाएं बहुत ही नायाब
हैं..

Udan Tashtari 8/08/2010 10:25 PM  

उम्दा बिम्ब!! सुन्दर अभिव्यक्ति.


बधाई.

रचना दीक्षित 8/08/2010 10:41 PM  

मन की


गंगा भी जब


बाढ़ लिए


चली आती है


खुशी से


लहलहाते खेतों का


विशाल विध्वंस


कर जाती हैं


उन खेतों पर भी मैंने


मेंड़ बनाना


सीखा है .....


बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति.

बहुत सुंदर प्रस्‍तुति !!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 8/09/2010 12:15 AM  

संगीता दी,
आप जीबन में जो सीखी हैं, ऊ आपके कबिता में झलकता है... असली बात त ई है कि उसको दुनिया को बताकर आप एलान करती हैं कि जब हम तो तुम क्यों नहीं...सचमुच प्रेरनादायक रचना...

anupama's sukrity ! 8/09/2010 1:51 AM  

बहुत सुंदर रचना -
इतना सीख जाने पर जीवन जीना आसान हो जायेगा -
जीने की कला सिखाती हुई रचना -
बहुत सुंदर .

सुज्ञ 8/09/2010 2:43 AM  

आत्मविश्वास को उर्जा प्रदान करती रचना।

वाणी गीत 8/09/2010 7:10 AM  

जख्मों पर मरहम रखना सीखा है
खेतों पर मेड़ बनाना सीखा है ...

तू मेरे सब्र की इंतिहा देख
मेरी पलके अभी तक नम ना हुई ...!

प्रवीण पाण्डेय 8/09/2010 9:02 AM  

बहुत ही सुन्दर है। पीड़ा को जी लेना ही उस पर विजय पाने जैसा है।

रश्मि प्रभा... 8/09/2010 9:26 AM  

पीड़ा से कैसे

डर जाऊं

जब उस पर

अधिकार जमाना

सीखा है

...waah, ye hai sahi raaj jivan ka

खुशदीप सहगल 8/09/2010 9:29 AM  

वैष्णव जन तो उसको कहिए,
पीर पराई जाने जो...

जय हिंद...

परमजीत सिँह बाली 8/09/2010 10:37 AM  

बहुत सुन्दर रचना है बधाई स्वीकारें।

मुदिता 8/09/2010 11:09 AM  

दीदी,
उस पल मैंने

पलकों पर

बाँध बनाना

सीखा है ....

बहुत कुछ सिखा देती है ज़िंदगी हमें और हर पल सिखाती ही जा रही है...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....

shikha varshney 8/09/2010 11:30 AM  

बस यही सीख लिया ..फिर क्या गम ..यही तो जिंदगी है ..
बेहतरीन भाव ..मर्म्सपर्शी कविता दी !

निर्मला कपिला 8/09/2010 1:08 PM  

संगीता जी जिस ने ये सीख लिया उसने ही जिन्दगी को सही मायनों मे जीया है। बहुत सुन्दर प्रेरक और सार्थक रचना है बधाई।

KK Yadava 8/09/2010 1:20 PM  

बहुत सुन्दर भाव..बधाई.

Deepak Shukla 8/09/2010 7:24 PM  

Hi di..

Dard ko apna daas banana,
khushi ya gum main bhi muskaana..
Humne "di" se seekha hai..
Apni "di" se seekha hai..

Bahut vilakshan sabak.. Di..

Thnx..

Deepak..

राजभाषा हिंदी 8/09/2010 8:51 PM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

बेचैन आत्मा 8/09/2010 9:29 PM  

..उस पल मैंने

पलकों पर

बाँध बनाना

सीखा है ....

..नई उर्जा देती मार्मिक अभिव्यक्ति.

Tej Pratap Singh 8/09/2010 11:51 PM  

aacha aishaas dilati kavita

कविता रावत 8/10/2010 2:29 PM  

पीड़ा से लड़ना
मैंने सीखा है
पीड़ा को दास
बनाना सीखा है
..सकारात्मक, प्रेरक और सार्थक अभिव्यक्ति के लिए धन्यवाद!

रंजना 8/10/2010 2:45 PM  

बस वाह...वाह...और वाह !!!!

मन छूकर हिलकोर गयी आपकी यह रचना...
बहुत बहुत बहुत गहरे उतर गयी मन में...
और क्या कहूँ,समझ नहीं पा रही...

महेन्द्र मिश्र 8/10/2010 5:47 PM  

सुंदर प्रस्‍तुति ...

अरुणेश मिश्र 8/10/2010 10:19 PM  

रचना जीवन्तता का संदेश देती है ।
उत्साह युक्त .पराक्रम का बोध ।

संजय भास्कर 8/10/2010 11:54 PM  

अद्भुत, भावभीनी रचना है संगीता जी, बधाई.

विनोद कुमार पांडेय 8/11/2010 8:41 AM  

सुंदर भाव..जीवन में हर पल ऐसी घटनाएँ होती रहती है जिससे कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है और वो मन को एक ताक़त दे जाती है..बढ़िया रचना के लिए धन्यवाद संगीता जी

Sonal 8/11/2010 11:09 AM  

bahut hi sundar rachna......

Meri Nayi Kavita Padne Ke Liye Blog Par Swaagat hai aapka......

A Silent Silence : Ye Paisa..

Asha 8/11/2010 1:12 PM  

संगीता जी ,
आपके कमेंन्ट्स पढ़ कर मुझे बहुत अच्छा लगता है |आप बहुत अच्छा लिखतीं हैं |यह रचना बहुत अच्छी लगी |बधाई
आपको शायद पता न हो साधना वैद मेरी छोटी बहन है |
वह अक्सर आपकी बात करती है | जब भी मैं आपको अपने ब्लॉग पर देखती हूं मेरी ख़ुशी का पारावार नहीं रहता |
आशा

manjumishra 8/11/2010 1:50 PM  

पलकों पर
बाँध बनाना
सीखा है ...

खेतों का

विशाल विध्वंस

कर जाती हैं

उन खेतों पर भी मैंने

मेंड़ बनाना

सीखा है .....

बहुत सुन्दर रचना.. हौसला हो तो क्या कुछ नहीं हो सकता ... पलकों पर बाँध हो या विध्वंस के बाद का पुनर्निर्माण , सब संभव है

शोभना चौरे 8/11/2010 3:11 PM  

संगीता जी
बहुत ही सुन्दर कविता है
जीवन से भरी आपकी कविता
मजबूर करे जीने के लिए जीने के लिए ....
आभार

रानीविशाल 8/12/2010 11:43 AM  

Waah!! kya baat hai ...ye rachaana to prashanshaaon se bhi pare hai. uttsaah badati lajawab rachana.

JHAROKHA 8/13/2010 11:40 AM  

aapki post ne yah sabit kar diya hai ki koshish
karne walon ki kabhi haar nahi hoti.
bahut hi shandaar abhivykti.
poonam

राजकुमार सोनी 8/14/2010 12:54 PM  

जिसने मेड़ बनाना सीख लिया उसने दूसरों के लिए रास्ता बनाना सीख लिया.
नए विचार का स्वागत है
अपने लिए तो सभी जीते हैं कविता में दूसरों का ख्याल है इसलिए रचना का फलक अपने आप बड़ा हो जाता है
बधाई

दिगम्बर नासवा 8/17/2010 2:48 PM  

आशा है ... खुद पर भरोसा रखने की कामना ... उत्साह का संचार करती रचना है ... सच है जिसने दर्द से लड़ना सीख लिया उसे कभी दुख नही सताता ....

ALOK KHARE 8/26/2010 12:38 PM  

Nari man ke bahvon ko
bakhoobi darshati hui aapki
ye rachna,

behtreen Sirjan DI

Dr.Nidhi Tandon 9/10/2011 8:45 AM  

पलकों पर बाँध बनाना मुझे भी सीखना है..घडी दो घडी मैं बह जाता है,सब.
पीडा को सहने..आंसुओं को रोकने ज़ख्मों पे मरहम लगाने की शिक्षा देती...प्यारी रचना.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 9/10/2011 11:58 AM  

खुशी से

लहलहाते खेतों का

विशाल विध्वंस

कर जाती हैं

उन खेतों पर भी मैंने

मेंड़ बनाना

सीखा है .....

बेहतरीन।

सादर

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