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पत्थर हो गयी हूँ ......

>> Sunday, August 29, 2010



ख़्वाबों  की दुनियाँ में 
आज 
एक तूफ़ान आया था 
खुली आँखों से 
एक भयानक 
ख्वाब आया था 
मन  था मेरा 
ऐसी नाव पर सवार 
जिसमें न नाविक था 
और न थी  पतवार 
फंस गयी थी  नाव 
मेरी बीच मंझधार 
मैं चिल्ला रही थी 
बार - बार .
बचाओ  मुझे बचाओ ...

पर नहीं हुआ किसी को 
मेरी बात पर यकीन 
और डूब गयी 
नाव मेरी 
ऐसी नदी में 
जो थी जलहीन ...

बिना  पानी के आज 
मैं खो गयी हूँ 
पत्थर तो नहीं थी 
पर आज हो गयी हूँ ...






62 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 8/29/2010 3:18 PM  

वाह ---!
बहुत ही सुन्दर भाव के साथ आपने रचनाकारी की है!
--
चित्र भी बहुत सुन्दर है!
बिल्कुल रचना के अनुरूप!

महेन्द्र मिश्र 8/29/2010 3:35 PM  

बहुत बढ़िया भावपूर्ण रचना .... आभार

वन्दना 8/29/2010 3:40 PM  

बेह्द खूबसूरत दिल मे उतर जाने वाली रचना……………सुन्दर भाव संयोजन्।

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति के प्रति मेरे भावों का समन्वय
कल (30/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

ali 8/29/2010 3:59 PM  

चिंतनपरक अभिव्यक्ति !

प्रवीण पाण्डेय 8/29/2010 4:24 PM  

बहुत ही भावुक प्रस्तुति।

Akhtar Khan Akela 8/29/2010 4:59 PM  

bhn ji bhut khub dil ki vythaa ko khubsurt alfaazon men byaan kiyaa he preshaani ki ghdi ka chitrn jivnt he. akhtar khan akela kota rajsthan

डा. अरुणा कपूर. 8/29/2010 5:31 PM  

bahut khoob Sangitaji!...aap ka khwaab aaj lagbhag har kisi ka khwaab hai!...asuraksha ki bhaavana har kisi ke man mein ghar kiye hue hai!...sundar rachna, badhaai!

rashmi ravija 8/29/2010 5:36 PM  

बहुत ही भावुक रचना...दिल में गहरे उतर जानेवाली

S.M.HABIB 8/29/2010 5:58 PM  

वाह, संगीता जी, सुन्दर रचना के लिए बधाई.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 8/29/2010 6:15 PM  

संगीता दी,
आज आपका कबिता पर बस मौन रहकर नत होने का मन करता हैं!!
सलिल

अनामिका की सदायें ...... 8/29/2010 6:34 PM  

दर्द से भीगी अभिव्यक्ति दिल में निशाँ छोडती सी.

Babli 8/29/2010 7:05 PM  

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने ! आपकी लेखनी के बारे में जितना भी कहा जाए कम है! आपकी लेखनी को सलाम!

JHAROKHA 8/29/2010 7:16 PM  

बिना पानी के आज
मैं खो गयी हूँ
पत्थर तो नहीं थी
पर आज हो गयी हूँ ...
बहुत सुन्दर और गहरे भावों को आपने बहुत ही सहजता के साथ शब्दों में पिरोया है---हार्दिक शुभकामनायें।

राजकुमार सोनी 8/29/2010 7:36 PM  

आपका टेम्पलेट बहुत ही शानदार लग रहा है
एकदम नया लुक है
एक बार फिर बेहतर रचना लिखने के लिए बधाई


ललित भाई ने भी जो परिश्रम किया है उसके लिए मैं उन्हें अभी जाकर साधुवाद देता हूं.

Sadhana Vaid 8/29/2010 7:45 PM  

बिना पानी के आज
मैं खो गयी हूँ
पत्थर तो नहीं थी
पर आज हो गयी हूँ .
बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति ! कविता की तरह ही असरदार दोनों तस्वीरें ! आपकी रचना ने तो दिल ही जीत लिया !कितना अच्छा लिखती हैं आप ! बहुत बहुत साधुवाद आपको !

मनोज कुमार 8/29/2010 8:01 PM  
This comment has been removed by the author.
मनोज कुमार 8/29/2010 9:03 PM  

सपने जब टूटते हैं तो इंसान जड़वत्‌ हो जाता है। उसकी भावनाएं समय के क्रूर थपेड़ों की चोट से पत्थर की तरह हो जाती हैं। कुछ इन्ही भावनाओं को समेटे आपकी यह रचना अभिव्यक्ति दे रही है।
कई बार ऐसा होता है कि हमारा अस्तित्‍व अपने अतीत, वर्तमान और भविष्‍य से जूझता हुआ खुद को ढूंढता रहता है। स्मृतियों और वर्तमान के अनुभव एक-दूसरे के सामने आ खड़े होते हैं। ऐसे में यह समझना कठिन हो जाता है कि हम जीवन जी रहे हैं या जीवन हमें जिए जा रहा है। या हमारी तरल संवेदना पत्थर-सी हो गई है।

डॉ. मोनिका शर्मा 8/29/2010 10:31 PM  

बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति ! आपका नया टेम्पलेट बहुत सुन्दर है!
मुझे तो मोर बहुत ही अच्छे लगते हैं।

Divya 8/29/2010 11:18 PM  

.
संगीता जी,
पता नहीं क्यूँ ये कविता मुझे खुद पर उपयुक्त लग रही है, शायद हर स्त्री की यही नियति है। काश मैं भी पत्थर हो जाऊं या फिर डूब जाऊं।
.

Udan Tashtari 8/30/2010 5:39 AM  

बिना पानी के आज
मैं खो गयी हूँ
पत्थर तो नहीं थी
पर आज हो गयी हूँ ..

-बहुत उम्दा!

kshama 8/30/2010 5:42 AM  

Itni samvedansheel rachnakar kabhi patthar ho sakti hai?

Abhishek Agrawal 8/30/2010 7:13 AM  

जीवन की जटिलताएं ...............अच्छी रचना है.......

अजय कुमार 8/30/2010 7:34 AM  

कविता के भाव को चित्र ने बखूबी उभारा ।

बेचैन आत्मा 8/30/2010 7:38 AM  

इस कविता का दार्शनिक अंदाज बेरतरीन है।

अशोक बजाज 8/30/2010 7:39 AM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Avinash Chandra 8/30/2010 7:45 AM  

इतना सारा अंतर blog template में???
अच्छा है... :)

कविता पर...आज कुछ नहीं, मौन प्रशंसा. :) :)

राजभाषा हिंदी 8/30/2010 8:17 AM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। बहुत अच्छी कविता।

हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।
संग्रहणीय प्रस्तुति!

Kajal Kumar 8/30/2010 8:28 AM  

एक सुंदर कविता.

महफूज़ अली 8/30/2010 9:41 AM  

बहुत सुंदर पंक्तियाँ......... अंतिम पंक्तियों ने तो दिल को छू लिया....

रश्मि प्रभा... 8/30/2010 10:30 AM  

बिना पानी के आज
मैं खो गयी हूँ
पत्थर तो नहीं थी
पर आज हो गयी हूँ ...
nihshabd

राजेश उत्‍साही 8/30/2010 12:01 PM  

शायद किसी राम का इंतजार करना होगा।

shaffkat 8/30/2010 12:32 PM  

बहुत सुंदर लिखा है और शलेन्द्र साब के गीत की एक लाइन याद आ रही है -डूब गए बीच भंवर में करके सोलह पार.आप ने लिखा है
और डूब गयी
नाव मेरी
ऐसी नदी में
जो थी जलहीन
सच में अहसास की शिद्दत से लिखी गई रचना है.एक शेर ज़हन में आ रहा है -डूबते हुए हाथ साहिल को पुकार कर रह गए /हाय वोह तिनका भी ना था जिसे सफीना जाना
आपने तो इससे आगे ही बात लिख दी .बहुत खूब मोहतरमा

दिगम्बर नासवा 8/30/2010 2:14 PM  

दिल के जज़्बातों को ज़ुबान दी है आपने ... कुछ ख्वाब ऐसे ही होते हैं ... जीवन रुक जाता है जिन्हे देख कर ...

Akshita (Pakhi) 8/30/2010 3:01 PM  

बहुत सुन्दर कविता लिखी आपने ...बधाई.

sada 8/30/2010 3:38 PM  

बिना पानी के आज
मैं खो गयी हूँ
पत्थर तो नहीं थी
पर आज हो गयी हूँ ..।

बहुत खूब, आपके इन पंक्तियों ने तो भावमय कर दिया, बहुत ही अनुपम प्रस्‍तुति ।

शोभना चौरे 8/30/2010 6:42 PM  

संगीता जी
कमाल कर दिया आपने तो बहुत गहरे अंतर्मन तक जाती है इस कविता की आखिरी पंक्तिया |

hem pandey 8/30/2010 8:48 PM  

बिना पानी के आज
मैं खो गयी हूँ
पत्थर तो नहीं थी
पर आज हो गयी हूँ ...

-सुन्दर

सुरेश यादव 8/30/2010 10:26 PM  

संगीता जी ,इस संवेदना में कासी हुई रचना के लिए आप को हार्दिक बधाई.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 8/30/2010 11:15 PM  

बिना पानी के आज...मैं खो गयी हूँ
पत्थर तो नहीं थी...पर आज हो गयी हूँ ...

रचना और चित्रों का प्रभावशाली संगम...
अपना एक शेर सुनाएं!
कुदरत से तो मिला था मुझे आईना मगर
इस दिल को हादसात ने पत्थर बना दिया.

प्रतिभा सक्सेना 8/31/2010 4:37 AM  

सबसे पहले तो आपका टेम्पलेट देखती ही रह गई !
और इस कविता के विषय में क्या कहूँ -बस मौन रह कर अनुभव कर रही हूँ उस अनुभूति को ग्रहण कर रही हूँ .-
और डूब गयी
नाव मेरी
ऐसी नदी में
जो थी जलहीन ...
बहुत गहन !
-

संगीता स्वरुप ( गीत ) 8/31/2010 7:53 AM  

Rekha Srivastava to me

संगीता,
कमेन्ट बॉक्स नहीं खुल रहा है, इस लिए नीचे वाला कमेन्ट में डाल देना.
-रेखा

सूखी नदी में पत्थर ही हुआ करते हैं, लेकिन एक गीतकार पत्थर नहीं हुआ करते. उनके शब्दों से पत्थर भी पिघल कर शीशा बन जाते हैं.

बहुत सुन्दर रचना.

रानीविशाल 8/31/2010 9:22 AM  

बिना पानी के आज
मैं खो गयी हूँ
पत्थर तो नहीं थी
पर आज हो गयी हूँ ..
Bahut gahara prabhav chodati hai dil par yah rachan Di.....Aabhar.

shikha varshney 8/31/2010 1:03 PM  

are itna sundar tamplet aur ye rachna bhi ....ab itni saree tareef ke liye shabd nahi hain mere pass.
bas Love u ittaaaa saraaa

रचना दीक्षित 8/31/2010 2:21 PM  

और डूब गयी
नाव मेरी
ऐसी नदी में
जो थी जलहीन ...
बहुत गहन दिल मे उतर जाने वाली रचना
बहुत ही अनुपम प्रस्‍तुति ।

anupama's sukrity ! 8/31/2010 3:54 PM  

बहुत सुंदर भाव --
कई बार वाकई लगता है जैसे
वक़्त के साथ सहिष्णुता कुछ कम सी होती क्यों जा रही है -
सुंदर कविता के लिए बधाई .

rohitler 8/31/2010 9:56 PM  

ज़बरदस्त रचना... बहुत आभार...

धर्म सिंह........;;;;;.. (इक अजनबी) 8/31/2010 10:57 PM  

दी नमस्ते
आशा करता हूँ आप अछि होंगी
समय अभाव के कारन आज कल थोडा मुस्किल हो रहा है किन्तु कोई बात नहीं
यही जीवन है.....
बहुत ही प्यारी रचना है दी !
और ये पंक्तियाँ तो....
**

बिना पानी के आज
मैं खो गयी हूँ
पत्थर तो नहीं थी
पर आज हो गयी हूँ ...
***
मन को छु गयी ...
और हम्म
आप का ब्लॉग बहुत सुन्दर लग रहा है ....(":")

CS Devendra K Sharma 9/01/2010 2:48 PM  

bahut hi behtareen!!!!!!!!

gaane ki ek line yaad aa rhi hai.....'maanjhi jab naw duboye use kaun bachaye..."

CS Devendra K Sharma 9/01/2010 2:52 PM  

"pattharon ne bhi naaw ko dubte dekha tha shayad...tabhi paani nahi thaharta ab wahaan"...!!!

Akshita (Pakhi) 9/02/2010 10:12 AM  

बहुत सुन्दर रचना...श्री कृष्ण-जन्माष्टमी पर ढेर सारी बधाइयाँ !!

________________________
'पाखी की दुनिया' में आज आज माख्नन चोर श्री कृष्ण आयेंगें...

anjana 9/02/2010 4:12 PM  

सुन्दर रचना


श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये

Asha 9/02/2010 6:32 PM  

बहुत सुंदर भाव लिए कविता |बधाई |जन्माष्टमी पर आपको सपरिवार शुभ कामनाओं के साथ |
आशा

harminder singh 9/02/2010 10:18 PM  

सुन्दर रचना

"बिना पानी के आज
मैं खो गयी हूँ
पत्थर तो नहीं थी
पर आज हो गयी हूँ ..."

रचना के अंदर आपने कितने भाव एक साथ पिरो दिये।

गहराई को नाप कर चलती हैं आप।


आभार।

हरमिन्दर सिंह

विनोद कुमार पांडेय 9/03/2010 7:58 AM  

सुंदर अभिव्यक्ति.....भावपूर्ण रचना के लिए बधाई संगीता जी

मुकेश कुमार तिवारी 9/03/2010 11:32 AM  

संगीता जी,

जड़ होते हुये भावों ने चेतना का संचार कर दिया.... बहुत ही सुन्दर भाव ।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

nilesh mathur 9/03/2010 1:19 PM  

वाह! क्या बात है, तारीफ़ के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं!

nilesh mathur 9/03/2010 1:20 PM  

वाह! क्या बात है, तारीफ़ के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं!

Dr.Ajmal Khan 9/03/2010 1:48 PM  

बिना पानी के आज
मैं खो गयी हूँ
पत्थर तो नहीं थी
पर आज हो गयी हूँ .

सुंदर अभिव्यक्ति......

निर्झर'नीर 9/08/2010 10:47 AM  

पत्थर तो नहीं थी
पर आज हो गयी हूँ ...
अब आप ही बताइए ..इस ख्याल की कैसे तारीफ़ करूँ
ऊपर जो भी कहा गया है उस सब को मिला दूँ तो मेरे मन के भाव समझो .
बंधाई इस खूबसूरत ख्याल के लिए

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