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हमारे मौन

>> Monday, June 18, 2012




नि: शब्द हूँ मैं 

तुम्हारे मौन को 
पालती हूँ 
पोसती हूँ 
और जब 
होता है मौन 
मुखरित तो 
हतप्रभ सी 
रह जाती हूँ ,


हमारी सोचें 
कितनी भी हों 
विरोधाभासी 
फिर भी कभी 
"हम" के वजूद से 
नहीं टकरातीं 
जब तुम्हारा "मैं "
आता है सामने 
तो मैं ---
हम बन जाती हूँ 
और जब मेरा "मैं "
दिखता है तुम्हें 
तो तुम --
हम बन जाते हो ,


यूं ही हमारे मौन 
अक्सर एक दूजे को 
नि: शब्द सा  करते हैं ।





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पुस्तक परिचय -------" मेरे गीत " / गीतकार --- सतीश सक्सेना

>> Thursday, June 14, 2012




कुछ दिन पूर्व  सतीश सक्सेना जी के सौजन्य से मुझे उनकी पुस्तक  " मेरे गीत "  मिली  और मुझे उसे गहनता से पढ़ने का अवसर भी मिल गया । सतीश जी ब्लॉग जगत की ऐसी शख्सियत हैं जो परिचय की मोहताज नहीं है ।  आज  अधिकांश  रूप से जब छंदमुक्त रचनाएँ लिखी जा रही हैं उस समय उनके लिखे भावपूर्ण गीत मन को बहुत सुकून देते हैं । उनके गीतों और भावों से परिचय तो  उनके ब्लॉग  पर होता रहा है  लेकिन पुस्तक के रूप में  उनके गीतों को  पढ़ना  एक सुखद अनुभव रहा । पुस्तक पढ़ते हुये यह तो निश्चय ही  पता चल गया कि  सतीश जी एक बहुत भावुक और कोमल हृदय के इंसान हैं । 
बचपन में ही माँ  को खो देने पर भी जो छवि माँ  की मन में अंकित  की है  उसकी एक झलक उनकी माँ को समर्पित   उनके गीतों में मिलती है --
हम जी न सकेंगे दुनियाँ में 
माँ जन्में कोख  तुम्हारी से 
जो दूध  पिलाया  बचपन में 
यह शक्ति  उसी से पायी है 
जबसे तेरा आँचल छूटा, हम हँसना  अम्मा भूल गए 
हम अब भी आँसू भरे , तुझे  टकटकी  लगाए बैठे हैं । 

या फिर  माँ की याद में एक काल्पनिक चित्रण कर रहे हैं ---

सुबह सवेरे  बड़े जतन से 
वे मुझको नहलाती  होंगी 
नज़र न लग जाये, बेटे को 
काला तिलक लगाती होंगी 
चूड़ी, कंगन और सहेली , उनको कहाँ लुभाती होगी ? 
बड़ी बड़ी  आँखों की पलकें , मुझको ही सहलाती होंगी । 

ईश्वर के प्रति भी अगाध श्रद्धा भाव रखते हुये  सारी प्रकृति  के रचयिता को याद करते हुये कह उठते हैं --

कल - कल , छल- छल जलधार 
बहे , ऊंचे शैलों की चोटी से 
आकाश चूमते वृक्ष  लदे
हैं , रंग बिरंगे  फूलों से 
हर बार रंगों की चादर से , ढक  जाने वाला कौन ?
धरा को बार बार  रंगीन बना कर जाने वाला कौन ? 

इनके गीतों में पारिवारिक भावना बहुत प्रबलता से  महसूस होती है ..... 

कितना दर्द दिया अपनों को 
जिनसे हमने चलना सीखा 
कितनी चोट लगाई  उनको 
जिनसे हमने हँसना सीखा 
स्नेहिल आँखों के आँसू , कभी नहीं जग को दिख पाये 
इस होली पर , घर में आ कर , कुछ गुलाब के फूल खिला दें । 

वृद्ध  होते पिता के मनोभावों को जिस तरह गीत में उकेरा है उससे जहां मन भीगता है वहीं प्रेरणा भी मिलती है --

सारा जीवन कटा भागते 
तुमको नर्म बिछौना लाते 
नींद तुम्हारी न खुल जाये 
पंखा झलते थे सिरहाने 
आज तुम्हारे कटु वचनों से ,मन कुछ डांवाडोल हुआ है 
अब लगता तेरे बिन मुझको , चलने का अभ्यास चाहिए । 

सामाजिक सरोकारों को भी गीतकार नहीं भूला है ।  उनके गीत की ये  पंक्तियाँ  आपसी भेद भाव भुला  देने के लिए काफी हैं ---

चल उठा कलम  कुछ ऐसा लिख 
जिससे घर का सम्मान बढ़े 
कुछ कागज काले कर ऐसे 
जिससे आपस में प्यार बढ़े 
रहमत चाचा के कदमों में , बैठे पाएँ घनश्याम अगर ,
तो रक्त पिपासु दरिंदों को , नरसिंह  बहुत मिल जाएँगे । 

एक ओर  जहां धर्म के ठेकेदारों  पर  भी  गीतकार की कलम चली है  वहीं दलित वर्ग के शोषण को भी उजागर किया है ---

बीसवीं  सदी में पले  बढ़े 
ओ धर्म के ठेकेदारों  तुम 
मंदिर के द्वारे खड़े हुये 
उन मासूमों की बात सुनो 
बचपन से  इनको गाली दे , क्या बीज डालते हो भारी 
इन फूलों को अपमानित कर क्यों लोग मानते दीवाली ? 

******************************
वंचित रखा पीढ़ियों इन्हें 
बाज़ार हाट  दुकानों से 
सब्जी , फल , दूध , अन्न अथवा 
मीठा खरीद कर खाने से 
हर जगह सामने आता था , अभिमान सवर्णों का आगे 
मिथ्या अभिमानों को लेकर  क्यों लोग मनाते दिवाली । 

सतीश जी के सभी गीत भावप्रबल हैं । इस पुस्तक में यूं तो सभी गीत  सुंदर और कोमल भावों के एहसास को सँजोये हुये हैं  लेकिन सबसे ज्यादा मुझे जिस गीत ने  प्रभावित  किया है वह है --- पिता का खत पुत्री को 
इस गीत में गीतकार हर उस पिता की भावनाओं को कह रहा है जिसकी बेटी ब्याह कर पराए घर को अपनाने जा रही है .... उस पराए घर को अपना बनाने की सीख देता यह गीत बहुत सुंदर बन पड़ा है -

मूल मंत्र सिखलाता हूँ मैं 
याद  लाडली रखना इसको 
यदि तुमको कुछ पाना हो 
देना पहले सीखो पुत्री 
कर आदर सम्मान बड़ों का , गरिमामयी तुम्ही होओगी 
पहल करोगी अगर नंदनी , घर की रानी तुम्ही रहोगी ।
*******************
कार्य  करो संकल्प उठा कर 
हो कल्याण सदा निज घर का 
स्व-अभिमानी बन कर रहना 
पर अभिमान न होने पाये 
दृढ़ विश्वास हृदय में ले कर कार्य करोगी, सफल रहोगी 
पहल करोगी अगर नंदनी .....

पुस्तक में एक - दो जगह कुछ वर्तनी अशुद्धि दिखाई दी  लेकिन सुंदर गीतों के आगे वो नगण्य  ही है .... जैसे --

पृष्ठ संख्या - 25 पर 
बरसों मन में गुस्सा बोयी 
ईर्ष्या ने, फैलाये बाज़ू 

गुस्सा शब्द पुल्लिंग होने के कारण बोयी के स्थान पर बोया  आना चाहिए था ।

कुछ टंकण अशुद्धियाँ भी दिखीं  जैसे 
पृष्ठ संख्या -56 
दवे हुये जो बरसों से थे .....
दवे  की जगह दबे  होना चाहिए था ...
इसी पृष्ठ पर --
द्रष्टिभर के स्थान पर  दृष्टिभर  सही रहता ।

एक संशोधन की आवश्यकता थी ,  शायद इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया --- पृष्ठ संख्या 49 पर जो गीत है वही पृष्ठ संख्या 59 पर भी है । बस गीत का शीर्षक अलग अलग है --- ज़ख़्मों को सहलाना क्या  / कैसे समझाऊँ मैं तुमको पीड़ा का सुख क्या होता है । 

पुस्तक की बाह्य साज सज्जा  सुंदर है ,छपाई स्पष्ट  है .... हर पृष्ठ पर सौंदर्य  बढ़ाने हेतु  किनारा ( बौर्डर ) बनाया गया है । उसे देख मुझे ऐसा लगा कि जैसे गीतों ने अपनी उन्मुक्तता  खो दी है ..... भावनाओं को जैसे बांधने का प्रयास किया गया हो ...यह मेरी अपनी सोच है ...इससे गीतों के रस और भावनाओं पर कोई असर  नहीं पड़ने वाला .... 

कुल मिला कर  आज  के परिपेक्ष्य  में "  मेरे गीत " पुस्तक नि: संदेह पाठक को भावनात्मक रूप से बांधने मे सक्षम है ।इस पुस्तक के गीत कार  सतीश सक्सेना जी को  मेरी हार्दिक शुभकामनायें । 

पुस्तक  का नाम ----    मेरे गीत 
गीतकार -----             सतीश सक्सेना 
मूल्य  -----------          199 / 
आई एस बी एन --        978-93-82009-14-6
प्रकाशन -                ज्योतिपर्व  प्रकाशन 



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रिसता मन

>> Thursday, May 31, 2012



उपालम्भों से 
आती है 
हर रिश्ते में 
खटास 
शिकवे 
नहीं रख पाते 
मन में 
मिठास 
टूट जाए 
जब 
एक बार 
विश्वास 
कैसे करे 
कोई फिर 
प्रेम की 
आस ? 
होता है 
हर बात से 
मन पर 
वज्राघात 
तो वाणी भी 
हो जाती है 
कर्कश 
और हर 
बात से 
होता है जैसे 
कुठाराघात .

प्रेम में 
विश्वास का होना 
ज़रुरी है 
विश्वास न हो तो 
बातों को 
छिपा लेना ही 
मजबूरी है .



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तथाकथित प्रेम

>> Tuesday, May 22, 2012




आसक्त हो कर 
किसी के प्रति 
अकसर सोच लेते हैं लोग 
कि वो उससे 
गहन प्रेम करते हैं 
जिन एहसास से 
खुद गुज़रते हैं 
दूसरा भी वैसा ही 
महसूस करे 
ऐसे अरमान 
उनके मन में पलते हैं , 
नहीं उतर पाता खरा 
जब वो उनकी 
उम्मीदों पर तो 
अपनी अपेक्षाओं का बोझ 
उसकी भावनाओं पर 
बड़ी निर्ममता से धरते  हैं ,

दब जाती हैं भावनाएं 
और  अपेक्षाएँ 
हो जाती हैं हावी 
प्रेम का प्रस्फुटन 
होने से पहले ही 
मुरझा जाती है कली
फिर बेवफा का 
तमगा दे कर 
कह दिया जाता है कि
पत्थर दिल 
भला कहीं पिघलते हैं ?


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ठहराव ......

>> Monday, May 7, 2012



उम्र के  
छठे  दशक  का 
प्रथम  पड़ाव -
सोच पर भी 
आ जाता है 
जैसे एक ठहराव ,
अनुभवों की पोटली 
संग बंधी रहती है 
फिर भी कभी कभी 
अनुभवों की 
बहुत कमी लगती है 
लगता है कि
जैसे सब कुछ 
बिखर रहा है 
समेटने के लिए 
अंजुरी का दायरा 
कम पड़ रहा है 
फिर मैं अंजुरी छोड़ 
बाहों को फैला देती हूँ 
सारे जहां का दर्द 
खुद में  समेट लाती हूँ 
आज भी आँखों में 
स्वप्न चले आते हैं 
मेरे मन  के व्योम  को 
विस्तृत कर जाते हैं 
भावनाओं के पाखी 
अब थक चुके हैं 
गहन विश्राम के लिए 
चल चुके हैं 
अब कोई विस्तार नहीं 
बस - पड़ाव चाहिए 
ज़िंदगी में बस 
एक ठहराव चाहिए .... 



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