copyright. Powered by Blogger.

कृत्रिमता

>> Saturday, October 10, 2009

ज़िन्दगी है

कृत्रिम सी

और

कृत्रिम से ही

रिश्ते हैं

जानते हैं लोग

एक दूसरे को
पर

पहचानते नहीं हैं ।



इस जानने और

पहचानने के

बीच की दूरी ही

पैदा कर देती है

कृत्रिमता ।


पुराने रिश्तों में


खड़ी हो जाती है

दीवार

जब होता है शुरू

सिलसिला

पहचानने का ।


नए रिश्ते बन नहीं पाते


पुरानों के खँडहर पर

और हम

कृत्रिमता को ओढे हुए

बेमानी सी ज़िन्दगी

ढोते रहते हैं उम्र भर ।

10 comments:

जहान 10/10/2009 11:55 PM  

aap ki kavita "kritrimta" bahut hi bhavpoorn hai ye chhoti si kavita bahut bada sandesh deti hai.

रश्मि प्रभा... 10/11/2009 12:16 PM  

इस तरह बनावटी की- असल की शक्ल भी धुंधली हो गई......खुद पर भी कभी-कभी भरोसा नहीं होता...बहुत बढिया

दिगम्बर नासवा 10/11/2009 12:19 PM  

SACH LIKHA HAI AAJ RISHTON MEIN BANAAVTIPAN AATA JA RAHA HAI .... BEMAANI RISHTE HAI JO INSAAN UMR BHAR DHOTA RAHTA HAI ...

Anamika 10/12/2009 7:03 PM  

नए रिश्ते बन नहीं पाते..पुरानो के खंडहर पर और हम ...
संगीता जी ये पंक्तिया मुझे इस रचना की बहुत अच्छी लगी...दिल चाहता है की आप कभी खंडहर शब्द पर भी कुछ लिखे..क्युकी में जानती हु की आप ऐसे शब्दों पर कलम की धार कुछ तेज़ कर के चला सकती है..इंतजार रहेगा..रचना के लिए बधाई

Anamika 10/12/2009 7:04 PM  

नए रिश्ते बन नहीं पाते..पुरानो के खंडहर पर और हम ...
संगीता जी ये पंक्तिया मुझे इस रचना की बहुत अच्छी लगी...दिल चाहता है की आप कभी खंडहर शब्द पर भी कुछ लिखे..क्युकी में जानती हु की आप ऐसे शब्दों पर कलम की धार कुछ तेज़ कर के चला सकती है..इंतजार रहेगा..रचना के लिए बधाई

Mumukshh Ki Rachanain 10/12/2009 8:28 PM  

कृत्रिमता को ओढे हुए
बेमानी सी ज़िन्दगी
धोते रहते हैं उम्र भर.


सारांश बहुत ही सटीक है

बधाई .

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

महफूज़ अली 10/13/2009 2:02 PM  

jab shuru hota hai silsila pahchaanne ka.......... wah!

bahut achchi kavita.........

badhai.

raj 10/13/2009 3:43 PM  

log jante hai ik doosre ko pahchante nahi....na kar dete hai pahchanne se.....na jane kyun?naye rishte bnanne se sahm jate hai hum...

Science Bloggers Association 10/14/2009 1:15 PM  

सच कहा आपने, जिंदगी में आजकल बहुत कृत्रिमता आ गयी है।
----------
डिस्कस लगाएं, सुरक्षित कमेंट पाएँ

संजय भास्कर 10/16/2009 10:00 AM  

बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Post a Comment

आपकी टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है...

आपकी टिप्पणियां नयी उर्जा प्रदान करती हैं...

आभार ...

हमारी वाणी

www.hamarivani.com

About This Blog

आगंतुक


ip address

  © Blogger template Snowy Winter by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP