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उत्सव

>> Friday, October 9, 2009


तुमसे ये कहना तो

बेमानी है

कि

राह तकते तकते

मेरी आँखें पथरा गयी हैं।

इनकी तपिश से

मेरे घर के

सामने की सड़क भी

कुछ पिघल सी गयी है

मौसम कुछ

बदल सा गया है ।

हवाएं शुष्क

हो चली है

और चल रही है

ठंडी बयार

पर मन में आँधियाँ हैं

और उठ रहा है

गुबार ।

साँसों के धधकने से

जैसे धुआं सा उठ रहा है ।

पर सच मानो

तुमसे कोई शिकवा नहीं है ।

आज मैं तर्पक

बन गयी हूँ

और कर दिया है

तर्पण मैंने

अपने रिश्ते का ।

आज उसी रिश्ते का

श्राद्ध है

इस उत्सव में

तुम ज़रूर आना..

23 comments:

अनिल कान्त : 10/09/2009 11:50 AM  

वाह !!
क्या तारीफ करूँ आपकी ...

रश्मि प्रभा... 10/09/2009 1:46 PM  

रिश्ते का तर्पण........हाँ यह पल भी आता है.....मेरे मंत्र आपके साथ हैं

दिगम्बर नासवा 10/09/2009 2:53 PM  

RISHTON K TARPAN कर के जीना आसान नहीं .......... पर दर्द BHARE RISTON का और किया भी क्या जाये ....... लाजवाब अभिव्यक्ति

JHAROKHA 10/09/2009 4:49 PM  

आदरणीया संगीता जी,
बहुत ही भावुक कर देने वाली कविता ---
पूनम

नीरज गोस्वामी 10/09/2009 5:46 PM  

वाह...अद्भुत रचना...बहुत बहुत बधाई इसके लिए आपको...

नीरज

Amit K Sagar 10/09/2009 8:01 PM  

चिटठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं, और भी अच्छा लिखें, लेखन के द्वारा बहुत कुछ सार्थक करें, मेरी शुभकामनाएं.
---

---
हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]

Anamika 10/09/2009 8:01 PM  

सड़क का पिघलना नया प्रयोग अच्छा लगा, लेकिन हवाए शुष्क और ठंडी बयार का साथ एक दुसरे के विरोधाभासी है..लेकिन कलम की सोच कुछ भी सोच सकती है, रचना ने अंत तक पढने वाले को बंधा हुआ है जो रचना की सफलता है...
रिश्तो को तर्पण कर खुद तर्पक बन जाना और उसके बाद उस अवस्था को उत्सव कह श्राद्ध कर निमंत्रण देना एक दिल को गहराइयों तक बींध जाने वाली बात..जितनी आसानी से कह दी गयी उतना ही मुश्किल काम..
दिल से दाद कबूल करे..
दिल को छू गयी आपकी ये रचना..और बहुत कुछ सोचने पर भी..

ललित शर्मा 10/09/2009 8:08 PM  

ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं, लेखन कार्य के लिए बधाई
यहाँ भी आयें आपका स्वागत है,
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Nirmla Kapila 10/09/2009 8:31 PM  

सच मे अद्भुत रचना है रिश्ते का श्राद्ध? ितनी मार्मिक अभिव्यक्ति ? क्या खूब कहा है शुभकामनायें

श्यामल सुमन 10/09/2009 8:46 PM  

अच्छे भाव की रचना।

रिश्तों का तर्पण कर देना साहस का है काम।
और निमंत्रण उसे भेजना सीधा काम तमाम।।

सादर
श्यामल सुमन
www.manoramsuman.blogspot.com

shyam1950 10/09/2009 10:21 PM  

bahut sundar rachna. heera. par johri ki nigahey kuchh aur mamuli si trash ki apeksha karti hain.

विपिन बिहारी गोयल 10/10/2009 2:08 AM  

श्राद्ध इतनी शिद्दत से किया है तो क्यों नहीं आयेंगे

पवन *चंदन* 10/10/2009 7:24 AM  

लेकिन तर्पण्‍ा काल तो बीत गया
फिर भी कर दीजिए
http://chokhat.blogspot.com/

sweet_dream 10/10/2009 12:01 PM  

बहुत सुन्दर रचना मन अशांत हो गया पढ़ के आगे भी ऐसी रचना लिखते रहे आपका ब्लॉग बहुत सुन्दर है

संजय भास्कर 10/10/2009 12:36 PM  

आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं, और भी अच्छा लिखें, लेखन के द्वारा बहुत कुछ सार्थक करें, मेरी शुभकामनाएं.

नारदमुनि 10/10/2009 12:47 PM  

मनभावन. नारायण,नारायण

महफूज़ अली 10/10/2009 1:04 PM  

uffffff!!!!!!!!! ab kya kahoon? kya likha hai aapne............... itni sunder aur dardbhari kavita......... hai......... jisko aapne bahut bhaavpoorna andaaz mein likha hai..........

GATHAREE 10/10/2009 6:21 PM  

स्वागत एवं शुभकामनायें

MUFLIS 10/10/2009 6:58 PM  

mn ke aise gehre ehsasaat ko
lafzoN ka libaas de paana
sach meiN bahut mushkil kaam hai
lekin...apne apni iss
nayaab nazm ke zariye
dard ko ek zaban hi de daali hai
lajawaab rachnaa

abhivaadan
---MUFLIS---

Dr. shyam gupta 10/12/2009 2:28 PM  

hawaaen shushk aur thandee bayaar---virodhee bhaaav, kaavy men dhyaan rakhanaa chaahiye.

sangeeta 10/12/2009 2:55 PM  

आप सबने मेरा उथाह बढाया इसके लिए आभार .

अनामिका जी और श्याम भाई जी ,

आपने जिस विरोधाभास की बात की है तो मैं
अपनी तरफ से कुछ कहना चाहूंगी कि
जब हवाएं ठंडी होती हैं यानि कि सर्दी का मौसम शुरू होता है तो शुष्कता प्रतीत होती है..इसका अनुभव आपको अवश्य प्रतीत हुआ होगा.
वैसे आगे से मैं कोशिश करुँगी कि इस तरह की शिकायत का अवसर न दूँ ..शुक्रिया

sanjaygrover 10/21/2009 4:48 PM  

हुज़ूर आपका भी एहतिराम करता चलूं......
इधर से गुज़रा था, सोचा सलाम करता चलूं..
www.samwaadghar.blogspot.com

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