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त्राटक

>> Saturday, April 26, 2025

 


 
सूरज की आंख में आँख डाल 

जब करती हूँ मंत्रोच्चार 



ॐ मित्राय नमः 



ॐ रवये नमः 



ॐ सूर्याय नमः…



देवत्व से भरता है मन 



मुंद जाते हैं स्वतः नयन



सहसा ललाट पर देखती हूँ 



गहरा सा कटा फटा 



लम्बा तिलकनुमा एक ख़ंजर 



अजीब सा लगता है वह मंज़र 



जैसे स्थापित हो  वहाँ 



महादेव का त्रिनेत्र 



धीरे धीरे वो प्रगाढ़ रंगत



ढल जाती है हल्की रंगत  में 



और  आकार भी हो जाता है  गोल 



कोशिश करने पर भी



नहीं खुल पातीं मुँदी पलकें



बस बदलते रहते हैं रंग और आकार 



हल्के हरे से हल्के नीले 



और फिर सौम्य श्वेत से पलट



कुछ ही पल में



छा जाता है सामने 



सुनहरा प्रकाश 



महसूस होता है मानो



आँखों पर पड़े सारे पर्दे स्वयं लोप हो गए 



और मेरे बन्द नेत्र भी स्वयं ही खुल गए 



लेकिन एक गज़ब  नज़ारा होता है 



चहुँओर गुलाबी रंग छाया होता है 



राग का रंग देख सोच रही हूँ  



ये कोई ईश्वरीय इशारा तो नहीं ?



आँख खुलते ही लौट आती हूँ वापिस 



सांसारिक प्रपंच में 



अध्यात्म से भोगवाद में…



सोच रही हूँ बैठी अब 



वक़्त है माया-मोह के त्याग का 



जीवन से अलगाव का 



मन की स्थिरता और ध्यान हेतु



कल फिर सूरज की 



आँख में आँख डाल निहारूँगी 



मन की कलुषता बुहारूँगी…!!







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भ्रम ....

>> Saturday, March 1, 2025

 



रेतीली आंखों में 


जज़्ब हो जाती है 


सारी नमी , जो 


अश्कों के धारे से 


बनती  है  ।


धुंधलाती हैं आँखे 


और लगता है यूँ कि 


हवा ने ओढ़ी है 


शायद कोहरे की चादर ,


ऐसे में मुझे 


न जाने क्यों 


बेसबब याद आती है बारिश , 


जिसमें घुल जाती हैं 


अश्क की बूंदे 


जिन्हें लोग अक्सर 


बारिश में भीगी 


खुशी समझते हैं। 






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गुमशुदा ज़िन्दगी

>> Thursday, May 16, 2024


 ज़िन्दगी 

कुछ तो बता 
अपना पता .....

एक ही तो मंज़िल है 
सारे जीवों की 
और वो हो जाती है प्राप्त 
जब वरण कर लेते हैं 
मृत्यु  को , 
क्यों कि असल 
मंज़िल मौत ही तो है ।

इस मंज़िल तक पहुँचने की राहें 
अलग अलग भर हैं ।
ज़िन्दगी भर 
न जाने क्यों 
हर पल 
जद्दोजहद करते हुए 
सही - गलत का आंकलन करते हुए 
ज़िन्दगी के जोड़ - घटाव में 
कर्तव्यों का गुणा -  भाग करते हुए 
एक दूसरे से 
समीकरण बैठाते हुए 
कब ज़िन्दगी रीत जाती है , 
अहसास नहीं होता ।

उम्र के ढलान पर 
जब ठहरती है ज़िन्दगी , तो 
मुड़ कर एक बार जरूर सोचती है 
कि , उस मोड़ से शुरू करें 
फिर ये ज़िन्दगी ।

लेकिन इस छोर पर खड़े 
केवल ख्वाहिश कर सकते है ,
शुरू नहीं । 

जब भी पीछे देखा है 
तो ,
अक्सर रास्ते नहीं दिखते 
दिखते हैं तो बस 
मील के पत्थर 
जो अहसास कराते हैं 
कि - 
चले तो बहुत लेकिन क्या , 
चल पाए सही और सीधी राह पर ? 
कहीं फिसल तो नहीं गए 
किसी चिकनी राह पर ? 
गिर कर संभले या फिर 
गिरते ही चले गए किसी राह पर ?  

यूँ तो ये आंकलन करना भी  
मात्र प्रपंच ही  तो है , 
क्यों कि - 
कहा जाता है कि 
हम तो निमित्त मात्र हैं । 
सब कुछ पूर्व निश्चित है 
हम तो अभिनय के पात्र हैं ।

तो फिर 
पूछूँ भी क्या तुझसे ज़िन्दगी ?
वैसे  यदि तू चाहे तो ,
बता अपना पता ज़िन्दगी ।


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चंदा मामा पास के ........

>> Thursday, August 24, 2023

 


भारतीय समयानुसार 
छः बज कर चार मिनट का 
कर रहे थे इन्तज़ार ,
दिल धड़क रहे थे ज़ार ज़ार 
अभी भी नहीं गयी है 
आदत  बचपन की 
जब भी आना होता था 
किसी का भी परिणाम 
फिंगर क्रॉस कर 
निकालते थे समय तमाम ।
 कुछ इसी तरह बिताया 
उन अंतिम क्षणों को 
हर पल ज़ेहन में था ईश्वर
जब चन्द्रयान  3 
उतर हा था चन्द्रमा पर ।

अंतिम क्षण ---- 
और विक्रम जा बैठा 
सीधा , तना हुआ 
चाँद की धरती पर 
लहरा गया तिरंगा 
फरर फर फर 
इतनी खुशी कि 
आँखें भीग गयीं थीं 
नतमस्तक हो गया था मन 
तमाम उन वैज्ञानिकों के प्रति 
जो दिन - रात थे प्रयास रत 
समर्पित था उनका तन -मन । 
इसरो- तुम्हारे प्रति 
 तुम्हारे वैज्ञानिकों के प्रति 
स्वीकार करो हमारा नमन ।

अभी खुशी के आँसू 
पोंछे भी न थे कि 
मुझे दिख गयी 
चाँद की सूरत ।
कुछ अजीब सी दृष्टि से 
देख रहा था चंद्र यान को 
खुश तो कतई नहीं था 
शायद ऊपर से देख रहा था 
पूरे हिंदुस्तान को । 

दुस्साहस कर मैंने 
पूछ लिया - 
क्यों मामा , खुश नहीं दिख रहे हो
सारा हिंदुस्तान खुशी से नाच रहा है
और तुम मुँह बिसूर रहे हो ।
अभी तो यान ही आया है 
कल भारत के बच्चे 
अपने ननिहाल आएँगे 
तब भी आप ऐसा ही मुँह बनाएँगे ? 

अपने दुःख को छुपाते हुए 
हल्का सा मुस्कुराते हुए 
बोला था चाँद -
अभी तक दूर से 
मैं कितना चमकता था , 
बच्चे मेरे नाम की लोरियाँ सुन 
माँ के आँचल में सो जाते थे 
मेरी सुंदरता के गीत गाते हुए 
न जाने कितने ही कवि द्वारा
आकाश  पाताल एक किये जाते थे 
युवतियाँ चंद्रमा सा सुंदर दिखने के लिए 
न जाने क्या क्या युक्ति किया करती थीं 
स्त्रियाँ न जाने किस किस रूप में 
मेरी  पूजा किया करतीं थीं ।
सब कुछ आ कर इस चंद्र यान  ने 
कर दिया है छिन्न भिन्न 
इसी लिए बस हो रहा है 
मेरा मन खिन्न । 

मैंने कहा कि मामा 
मत हो खिन्न 
हम भारतीय हैं सबसे भिन्न 
भले ही आ पहुँचे हैं तुम तक 
फिर भी जो होता आया है 
वही होता रहेगा 
हर माँ के होठों पर 
चंदा मामा दूर के ही रहेगा ।
शायर और कवि आज भी 
अपनी शायरी में उपमा तुम्हारी ही देंगे 
और हम  भी बहुत प्यार से 
करवा चौथ का अर्घ्य  देंगे । 
यह सुन चाँद खिलखिला गया 
और उसने चंद्र यान 3 को 
अपने गले लगा लिया । 





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हम चाँद पर ......

 


 



देखी थी मैंने एक वेब सीरीज़ 

मॉम .....
मिशन ओवर मार्स 

 पल पल 
वैज्ञानिकों की क्रियाएँ
और उनके आस - पास
 घटती घटनाएँ
माना कि वो मात्र थी 
एक कहानी 
सब कुछ था 
डायरेक्टर के हाथ में 
फिर भी 
हर क्षण जूझते हुए 
वैज्ञानिकों को कार्य के साथ 
जब जूझना पड़ रहा था 
 राजनीति से भी 
तो मन बहुत भर गया था 
दुख से ।
क्या राष्ट्र को भी 
लगा देते हैं दाँव पर 
हमारे नेता ? 
 
आज साक्षी हैं हम 
चंद्रयान 3 की सफलता के 
जबकि पिछली बार 
मिली थी असफलता 
फिर भी 
इस मिशन को पूरा करने में 
वैज्ञानिकों के सपनों को करने पूरा
आभार उन सबका 
जिन्होंने हर सम्भव 
की  है मदद ।

राष्ट्र को ऊँचाई पर 
ले गए हो इसरो के वैज्ञानिकों  
आभार तुम्हारा । 

आभार उन सबका 
जो इस दृश्य के बने 
साक्षी आज एक साथ । 

जय इसरो , जय हिंद ।





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पुस्तक परिचय -- पाँव के पंख ( शिखा वार्ष्णेय )

>> Tuesday, May 23, 2023



शिखा वार्ष्णेय द्वारा लिखी पुस्तक " पाँव के पंख " मिलते ही सबसे पहले  उसकी फोटो खींच कर शिखा को भेजी कि तुम्हारे पाँव के पंख मेरे पास पहुँच चुके हैं । और उसके बाद  मेरी पहली प्रतिक्रिया थी किताब को सूँघना । न जाने क्यों मुझे हर किताब की एक अलग खुशबू  महसूस होती है । वैसे भी आज कल लोग ब्लॉग पर , फेसबुक पर या अलग अलग वेबसाइट पर काफी पढ़ लेते हैं , लेकिन फिर भी जो बात हाथ में पुस्तक ले कर पढ़ने में है वो  कम्प्यूटर या फोन में पढ़ने में नहीं ।  

शिखा के पाँव के पंख  उसे यात्राएँ कराते हैं और वहाँ की समस्त जानकारी जुटा कर सारा वृतांत वो हम पाठकों तक इस तरह से पहुँचाती है  जैसे हम अभी उस जगह जाने  का विचार कर रहे हों । 

पुस्तक की भूमिका  में  लिखा है कि - " अगर आप वाकई किसी यात्रा का आनंद  लेना चाहते हैं  तो उस स्थान के हृदय में  पहुँच कर देखिए ,स्ट्रीट फूड खाइये  बीच शहर में डेरा जमाइए और स्थानीय लोगों से जी भर कर बात कीजिये  । " अब भूमिका ही इतनी रोमांचक है तो बाकी सब स्थानों के विषय में लिखा हुआ कितना रोमांचक होगा इसका  अंदाज़ा  आप स्वयं ही लगा लीजिये । 

शिखा की लिखी "स्मृतियों में रूस" हो या "देशी चश्में से लंदन डायरी"  हो और या फिर ये पुस्तक  "पाँव के पंख" हो --- यात्रा वृतांत होते हुए भी मुझे तो  हमेशा पढ़ते हुए किस्से कहानी से ही लगे। और उससे भी खास बात ये कि जैसे लेखिका सामने बैठ कर ही अपनी किसी यात्रा का वर्णन  कर रही हो ।

यूरोप के अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए हर जगह की विशेषताओं को जानना , वहाँ की भाषा , संस्कृति ,रहन - सहन , खान- पान  के विषय में जानकारी जुटाना , वहाँ  की भौगोलिक परिस्थिति के बारे में और  वहाँ की   ऐतिहासिक इमारतों के  बारे में  और उनके इतिहास की भी जानकारी  सरल और रोचक ढंग से देना शिखा के लेखन की विशेषता है ।  मुझे तो हर स्थान  के विषय में पढ़ते हुए  ऐसा लगता रहा कि लेखिका  गाइड बनी हाथ में एक छड़ी लिए हुए (छड़ी द्वारा) स्थानों को इंगित करते हुए सब जगह का वर्णन करती चल रही है और मैं सम्मोहित सी उसके द्वारा वर्णित किये को आत्मसात करती उसके पीछे चल रही हूँ । 
यूरोप के अनेक शहरों के विषय में इस पुस्तक में जानकारी दी है । पहले ही चैप्टर को पढ़ते हुए वेनिस से प्यार हो जाएगा । पानी का शहर सच कितना रोमांच से भरपूर होगा । वहाँ के गंडोले की सैर और नाविक से गीत गाने का अनुरोध बहुत भावनात्मक रूप से लिखा है । 
यूरोप के कई स्थानों की यात्राओं को  इस पुस्तक में सहेजा है । ये यात्राएँ  लेखिका द्वारा अलग अलग समय  पर की गई हैं । किस जगह क्या परेशानी आ सकती है ,हर जगह को देखने और समझने के लिए क्या क्या जानना आवश्यक है , सारी ही बातों का ज़िक्र इस पुस्तक में मिलता है । किस जगह शाकाहारी भोजन उपलब्ध होता है और कहाँ केवल मांसाहारी ही उपलब्ध होगा ,  किस शहर का क्या विशेष खाद्य है इसका जिक्र भी शिखा करना नहीं भूली है । यहाँ तक कि उस खाद्य या पेय की रेसिपी भी लिख डाली है । 
इस पुस्तक की भाषा शैली की बात करूँ तो शिखा का लिखने का  अपना विशेष अंदाज़ है , मुहावरों का प्रयोग बात को दमदार बना देता है । घटनाओं को पढ़ते हुए बरबस मुस्कुराहट आ जाती है । इस पुस्तक में शिखा द्वारा की गई यात्राओं के रोचक किस्से हैं । 
संक्षेप में कहूँ तो जो लोग यूरोप की यात्रा पर जा रहे हों उनके लिए ये पुस्तक बेहतरीन  जानकारी देने में सक्षम है  , और जो लोग इन जगहों को न देख पाने की स्थिति में हैं वो इस पुस्तक के माध्यम से इतनी सारी जगहों के बारे में अच्छी जानकारी रख सकते हैं । पुस्तक के अंत में कई स्थानों के चित्र भी दिए हैं । जानकारी के लिए उपयुक्त हैं लेकिन रंगीन होते तो अधिक अच्छा रहता । 

पुस्तक अमेज़ॉन पर उपलब्ध है ।





पाँव के पंख   -- -  शिखा वार्ष्णेय 
प्रकाशक       ----  शिवना प्रकाशन 
ISBN          ----  978 -81 - 19018 - 41- 31
मूल्य             ----  175 ₹ 

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खिलखिलाता बसंत --

>> Thursday, January 26, 2023



सरस्वती आगमन का  दिन ही 

चुन लिया था मैंने
बासंती जीवन के लिए .
पर  बसंत !  
तुम तो न आये ।

ऐसा नहीं कि 
मौसम नहीं बदले 
ऐसा भी नहीं कि 
फूल नहीं खिले 
वक़्त बदला 
ऋतु बदली 
पर बसन्त !
तुम तो न आये । 

सजाए थे ख्वाब रंगीन 
इन सूनी आँखों में 
भरे थे रंग अगिनत 
अपने ही खयालों में 
कुछ हुए पूरे 
कुछ रहे अधूरे 
पर बसन्त !
तुम तो न आये ।

बसन्त तुम आओ 
या फिर न आओ 
जब भी खिली होगी सरसों 
नज़रें दूर तलक जाएंगी 
और तुम मुझे हमेशा 
पाओगे अपने इन्तज़ार में ,
बस बसन्त ! 
एक बार तुम आओ । 


अचानक
ज़रा सी आहट हुई
खोला जो दरीचा
सामने बसन्त खड़ा था 
बोला - लो मैं आ गया 
मेरी आँखों में 
पढ़ कर शिकायत 
उसने कहा 
मैं तो कब से 
थपथपा रहा था दरवाजा 
हर बार ही 
निराश हो लौट जाता था 
तुमने जो ढक रखा था 
खुद को मौन की बर्फ से 
मैं भी तो प्रतीक्षा में था कि
कब ये बर्फ पिघले 
और 
मैं कर सकूँ खत्म
तुम्हारे चिर इन्तज़ार को ।
और मैं - 
किंकर्तव्य विमूढ़ सी 
कर रही थी स्वागत 
खिलखिलाते बसन्त का । 






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कुछ कम तो न था ...

>> Tuesday, January 10, 2023

 


जो नहीं  मिला ज़िन्दगी में, उसका कुछ ग़म तो न था । 
पर मिला जितना भी ज़िन्दगी में, वो भी कुछ कम तो न था 

 पानी की चाहत में  हम, जो घूमे  सहरा - सहरा 
दिखा सराब  तो हममें भी सब्र कुछ कम तो न था ।

बह गया आँख से पानी, रिस गए दिल के छाले 
यूँ  शिद्दत से छुपाए थे, मेरा ज़र्फ़ कुछ कम तो न था । 

वज़ूद में मेरे  न जाने अब, क्या क्या घुल गया है 
 यूँ तो ख्वाहिशों का रंग भी ज़र्द कुछ कम तो न था ।

तपिश थी आंखों में और सुलग रहा था  सीना मेरा 
अरमानों का कोयला भी" गीत " ,सर्द  कुछ  कम तो न था ।






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पुस्तक परिचय -- दर्द का चन्दन ( उषा किरण )

>> Sunday, January 1, 2023

 


डॉ० उषा किरण का उपन्यास " दर्द का चंदन " जब मेरे हाथ में आया तो इसकी साज - सज्जा देखते ही बनती थी । खूबसूरत  आवरण जिसे उषा किरण जी द्वारा ही चित्रित किया गया है, मन को मोह लेता है । पृष्ठों की गुणवत्ता उत्कृष्ट  है और छपाई भी सुंदर है । वर्तनी भी तकरीबन शुद्ध  है ।
यह उपन्यास अपने अनुज की स्मृति में उनको  समर्पित किया गया है । डॉ०उषा किरण  ने अपने वक्तव्य में इस उपन्यास के लिए लिखा है कि - 
ये हौसलों की कथा है 
निराशा पर ,आशा की 
हताशा पर आस्था की 
पराजय पर विजय की कथा है । 

दर्द  का चंदन  -  एक  ऐसा कथानक  जो एक कैंसर के मरीज़ के जीवन की हकीकत को बहुत नजदीक से देखते हुए बारीकी से बुना गया  है ।
भाई का कैंसर से जूझना चलचित्र की तरह दिखाई देता है । उस समय की मानसिक यंत्रणा झकझोर देती है ।हर समय होने वाली मनः स्थिति को शब्द चित्र में उकेर दिया है । 
 इस  उपन्यास  की नायिका ईश्वरीय शक्ति में बहुत आस्था रखती है   और दैवीय शक्तियों को भी मानतीं है । स्वप्न में बार बार पिता को देखना और इसको अपनी खराब तबियत से रिलेट करना जैसे पिता से गहराई से जुड़े रहने की भावना है । यूँ तो आज लोग काफी जागरूक हैं कैंसर के प्रति लेकिन जिस तरह से नायिका ने अपनी बीमारी के प्रति सजगता दिखाई वो बिरला ही कोई कर पाता है अन्यथा डॉक्टर के कह देने पर कि सब रिपोर्ट सही है ,निश्चिंत ही हो जाते हैं । यहाँ पर लेखिका यह संदेश दे रही हैं कि जब तक आप संतुष्ट न हों तब तक निश्चिंत न हों । इलाज से पहले ईश्वर के साथ संवाद  नायिका के  मन की दृढ़ता को दर्शाता है । 
       लेखिका ने इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया है कि कोई भी चाहे कितना ही धैर्यवान और दृढ़ इच्छा शक्ति वाला क्यों न हो उसे परिवार के हर सदस्य का साथ और मजबूत बना देता है । इस उपन्यास का कथानक  इतनी सकारात्मकता लिए हुए है कि इलाज के दौरान हुई तकलीफें कम होती महसूस होती रहीं। । इस के माध्यम से लेखिका ने , कैंसर पेशेंट के साथ लोग किस तरह का व्यवहार करते हैं और कैसा करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए सभी पर प्रकाश डाला है ।  किस तरह इस की नायिका विजेता बन कर उभरी है ,प्रेरणा लेने लायक है ।
उपन्यास का हर भाग  एक छोटी सी कविता से प्रारंभ कर लेखिका ने इसको और भी भावपूर्ण बना दिया है । मन के ही किसी कोने में आपके बुद्ध हैं तो कहीं कबीर और आपने उनको इतना आत्मसात कर लिया है कि आप दूसरों की बड़ी से बड़ी गलतियों को क्षमा कर पाती हैं   ।  कभी कभी किसी की बद्दुआएँ भी दुआएँ बन जाती हैं । कैसे कोई किसी की मृत्यु की कामना कर लेता है , जाना तो सबको  है फिर ऐसी भावना क्यों ? रेल की यात्रा  में सहयात्रियों का सहयोग और स्नेह अभिभूत कर गया  । याद आ गईं ऐसी ही 40 -50 साल पहले की यात्राएँ जिनमें सामान में एक खाने की टोकरी ज़रूर हुआ करती थी और साथ में सुराही भी ।
इस  की नायिका ने  बीमारी से ज़द्दोज़हद करते हुए आखिर भरपूर खुशी की लम्हें  अपने नाम किये और अपनी जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाया ।असल जिंदगी में भी हौसला रखने वालों की कहानी सुखद होती है  ।  लेखिका के पास शब्दों की जादूगरी का हुनर है । 
अंत में बस इतना ही कहूँगी कि किसी के लिए भी आपबीती लिखना इतना सरल नहीं है । उस दर्द से दोबारा गुज़रने की क्रिया है । लेकिन डॉ० उषा किरण का मानना है  कि दर्द से गुज़र जाना ही बी पॉज़िटिव होना है । 
आखिरकार दर्द  अब  चंदन बन महक ही गया । 
आशा है इस उपन्यास की सुगंध दूर तक फैलेगी ।

यह उपन्यास हिंदी बुक सेंटर द्वारा प्रकाशित किया गया है । सुंदर छपाई और पृष्ठों की गुणवत्ता के लिए प्रकाशक बधाई के पात्र हैं ।

 शुभकामनाओं के साथ ..

 संगीता स्वरूप ।






उपन्यास -  दर्द का चन्दन 

लेखिका - डॉ ०  उषा किरण 

ISBN - 978-93- 95310 - 00 - 0 

मूल्य -  225 /

प्रकाशक - हिंदी बुक सेंटर ,  4/ 5  - बी , आसफ अली रोड 
नयी दिल्ली -  110002 



पुस्तक मँगाने का लिंक --

https://www.flipkart.com/dard-ka-chandan/p/itm7661794969ebb?pid=RBKGHCPNBQKRZBZP&lid=LSTRBKGHCPNBQKRZBZPZJA3KH&marketplace=FLIPKART&q=dard+ka+chandan+book&store=bks&pageUID=1672341052700

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रे ! मन

>> Thursday, December 22, 2022

 


रे मन ! 

तू है क्यों एकाकी ! 
ये भव -सागर  मोह - माया  
अब तलक तुझे 
समझ न आया ? 
मोह की गठरी तूने 
क्यों काँधे पर उठा ली ? 
रे मन ! तू है क्यों एकाकी ?  

ये रिश्ते - नाते सब 
बंधन हैं सामाजिक
 मन के बन्ध नहीं दीखते 
क्यों भटके मन बैरागी 
भ्रम में जीना छोड़ रे मन 
बन जा तू सन्यासी 
रे मन ! चल तू एकाकी ! 

कौन यहाँ किसका साथी है 
जान न पाया कोई 
कर्म बंधन से बंधे हुए सब 
कैसे पाएँ आज़ादी ? 
नित बंधन ही काट- काट 
मन होगा  आह्लादी।
रे मन !  चल तू एकाकी !  

क्यों बाँधा मन को तूने है 
और पीड़ा को पाया 
मेरा - तेरा कुछ नहीं जग में 
सब भ्रम की है छाया ।
इस छाया को हटा नैनों से ,
बन जा तू वीतरागी ,
रे मन ! अब तो चल एकाकी ! . 







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आज़ादी के 75 वर्ष

>> Sunday, August 14, 2022

 


आज़ादी के  पिचहत्तर  वर्ष 

दिखता चेहरे पर सबके हर्ष 
नाम दिया  अमृत  महोत्सव 
मना रहे हम  राष्ट्र उत्सव ।

एक उत्साह है ,एक जुनून है 
घर घर पहुँचे तिरंगा अपना 
हर घर में बस खुशहाली हो 
बस इतना ही तो है एक सपना ।

देश की समृद्धि के लिए 
कुछ तो तुम भी त्याग करो 
खून बहाया वीरों ने अपना 
उनको भी तो याद करो । 

आज़ादी के  दीवानों ने 
जान की बाज़ी लगाई थी 
युवा चेतना ने जैसे 
ली एक अंगड़ाई थी ।

आज उन्हीं वीरों को तुम 
आतंकी तक  कह देते हो 
ऐसा सुन कर भला कैसे 
तुम ठंडे ठंडे रह लेते हो ?  

आज महोत्सव की पूर्व सांझ पर 
बस इतना ही तो कहना है ,
अधिकार निहित कर्तव्यों में 
बस उस पर ही तो चलना है ।

*************************

आज उन्हीं वीरों को तुम 
आतंकी तक कह देते हो .....
इस बात की पुष्टि के लिए श्री हरिओम पंवार जी को सुनिए ----









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पुस्तक समीक्षा -- " खिलते प्रसून " ( भारती दास )

>> Thursday, July 7, 2022

 


सुश्री   भारती दास  ने  अपना  काव्य - संग्रह " खिलते प्रसून "  भेंट स्वरूप मुझे भेजा है ।  हालाँकि इनके रचना संसार से मैं अधिक परिचित नहीं थी  लेकिन इस पुस्तक को पढ़ते हुए  मैंने जाना  कि  कवयित्री  भारती दास  का सृजन  अधिकांश रूप से    प्रकृति , परमेश्वर , उत्सवों  और  ऋतुओं  पर किया गया  है  ।


इनकी रचनाओं में प्रकृति  चित्रण मुख्य रूप से उभर कर आता है ।इनकी कविताएँ पढ़ते हुए प्रतीत होता है कि इन्होंने विषय के साथ पूरा न्याय किया है  ।  मन के भावों को गढ़ने में सौंदर्य की  कहीं कोई कमी नहीं दिखती  । 

इनके पूरे संग्रह में प्रेम , इश्क़ , या विरह  जैसे विषय पर  रचनाएँ न के बराबर  हैं । इस काव्य - संग्रह में कुल 50 कविताओं का समावेश है ।
इस संग्रह की पहली कविता  में कुछ प्रेम का होना मुखरित हो रहा है । लगता है नायक के आने से  नायिका के मन के भाव कहने का प्रयास किया है - ..... था सूना मन का आँगन / उपहार प्यार का भर लाये /  चिर बसंत फिर घर आये ।

ऐसे ही श्रृंगार रस  ,करुण रस वीभत्स रस  से भरी हैं इनकी सभी वो कविताएँ जो  ऋतुओं से संबंधित हैं । कुछ उदाहरण देखिये ---
ग्रीष्म ऋतु ---
ज्योति प्रलय साकार खड़ा है / जलता पशु बेजान पड़ा है / दीन विकल रोदन ध्वनि गाये /  कहो जेठ तुम कब आये ।
शरद ऋतु --
बीत गयी पावस की रातें / सजल सघन जल की बरसातें /  दृश्य मनोरम  मुग्ध नयन हैं / शरद सुंदरी अभिनंदन है । 
बसंत ऋतु ---
विभा बसंत की छाई भू पर / कण कण में मद प्यार भरा है /  आलिंगन में भरने को आतुर /  गगन भी बाहें पसार खड़ा है ।
वर्षा ऋतु में बाढ़ का वीभत्स रूप भी दिखाया गया है ----
आतप वेदना दृश्य डरावना / वीभत्स भयानक भू का कोना / बहती है कातर सी नयना / कहर बाढ़ ने  छीना हँसना । 
कुछ रचनाओं में  ईश्वर को इंगित करते हुए धन्यवाद प्रेषित किया गया है ---
मैं कृतज्ञ हूँ हे परमेश्वर / धन्यवाद करती हूँ ईश्वर / अंधकार पथ में बिखरे थे / छंद आनंद के खिलेंगे फिर से ।
 दीपावली ,हिंदी दिवस आदि विषय पर भी कविताएँ  इस संग्रह में शामिल हैं ।
नारी के विषय में जो इनके विचार है वो " मैं धीर सुता मैं नारी हूँ  " में  प्रकट होते हैं ।
मैं धीर सुता मैं  नारी हूँ / सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं /  हर रूपों में जूझती रहती / राग विविध झंकार हूँ मैं ।

कुछ विचारोत्तेजक रचनाएँ है तो कुछ अपने देश के भूभागों का चित्रण किया है जैसे हिमालय , कश्मीर आदि स्थल ।
" काल के जाल" कविता में   समय को भी दार्शनिक रूप से समझाने का प्रयास  किया  है ।
कुल मिला कर सभी रचनाएँ  भाव प्रधान होने के साथ साथ सशक्त भी हैं ।

पुस्तक का कागज़ और छपाई उत्तम है , इसका आवरण पृष्ठ भी आकर्षक है । जिसके लिए प्रकाशक बधाई के पात्र हैं । कहीं कहीं वर्तनी की अशुद्धि दिखती है, जिसे संपादित किया जा सकता था । अधिकांश रूप से अनुनासिका ( चंद्र बिंदु ) के स्थान पर अनुस्वार ( बिंदु ) का प्रयोग हुआ है । ऐसे ही  कहीं कहीं  शब्दों के लिंग में भेद नहीं कर पायीं हैं जैसे ....पृष्ठ 52 पर बस्ती डूबते .... बस्ती स्त्रीलिंग शब्द है  लेकिन यहाँ पुल्लिंग के रूप में लिखा गया है।

कवयित्री ने जो अपना परिचय दिया है उसके वाक्य विन्यास  में  भी  सुधार की आवश्यकता है ।
"  खिलते  प्रसून " कवयित्री का प्रथम काव्य संग्रह है ,जो  अधिकांश रूप से हर कसौटी पर खरा उतरता है । यह एक संग्रह योग्य पुस्तक है ।इसके लिए कवयित्री बधाई की पात्र हैं । इनकी लेखन यात्रा अनवरत जारी रहे ,इसके लिए शुभकामनाएँ देती हूँ । 

विशेष --  आलोचना को सकारात्मक लें जिससे  आगामी पुस्तकों में ये कमियाँ दृष्टिगोचर नहीं होंगी । 



पुस्तक का नाम ---- काव्य प्रसून 

प्रकाशक   ---- सहित्यपिडिया पब्लिशिंग / नोएडा /201301
 
मूल्य   ----  179₹

ISBN  ----- 978 - 93 - 91470 - 04 - 3 


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हु - तू - तू .......

>> Thursday, May 26, 2022

 


हु तू तू -  हु तू तू 

करते हुए

खेलते रहते हम 

ज़िन्दगी के मैदान में 

 हर वक़्त कबड्डी । 

हाँलांकि  , 

कबड्डी के खेल में 

होती हैं दो टीम 

और हर टीम में 

खिलाड़ी की संख्या 

होती है बराबर ।

लेकिन 

ज़िन्दगी के मैदान में 

होती तो हैं दो ही टीम ,

लेकिन 

तुम्हारीअपनी टीम में 

होता है एक खिलाड़ी 

और  वो 

तुम स्वयं हो । 

दूसरी टीम में 

वो सब जो 

जुड़े होते हैं 

किसी भी रूप में 

तुम्हारी  ज़िन्दगी से ,
 
खुद को 

बचाये रखने की 

ज़द्दोज़हद 

अक्सर बुलवाती रहती है 

कबड्डी , कबड्डी , कबड्डी । 

क्यों कि 

ज़िन्दगी की हु तू तू में 

तुमको जिंदा करने के लिए 

कोई साथी नहीं है । 

लड़नी है 

खुद ही खुद के लिए 

सारी लड़ाइयाँ । 

और इस खेल में 

हार की 

कोई गुंजाइश  नहीं ।





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स्वयं का आकलन

>> Monday, May 9, 2022



 7 मई  2022, अपने जन्मदिन पर स्वयं का आकलन 




मैं समन्दर 
सब कुछ मेरे अंदर । 
मन की लहरें 
आती हैं और 
जग के साहिल से 
टकराती हैं 
भिगो कर साहिल को 
थोड़ा नम कर जाती हैं । 
मैं समंदर 
सब कुछ मेरे अंदर । 
कोई लहर 
उदासी की तो,
कोई  प्रफुल्लता  लिए 
आती है 
किनारे से टकरा कर 
उच्छवास लिए 
मुझमें ही 
मिल जाती है 
मैं समन्दर 
सब कुछ मेरे अंदर ।
मन मेरा 
एक कुशल 
गोताखोर की तरह 
लगाता रहता है 
मुझमें ही गोता 
ढूँढने को 
कुछ सीपियाँ 
कि मिल जाएँ 
कुछ नायब मोती 
हाथ आती भी हैं 
कुछ सीपियाँ 
लेकिन फिसल जाती हैं 
और फिर मन 
लगा लेता है गोता ।
मैं समंदर 
सब कुछ मेरे अंदर । 
मेरी लहरों में 
सब कुछ समाता है , 
जो जैसा देता है 
वैसा ही वापस पाता है 
 मैं समंदर 
सब कुछ मेरे अंदर । 



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